पचास पार का स्त्री मन

15-06-2026

पचास पार का स्त्री मन

डॉ. सुशील कुमार शर्मा (अंक: 299, जून द्वितीय, 2026 में प्रकाशित)

 

पचास पार की औरतें
अचानक बूढ़ी नहीं होतीं, 
वे धीरे -धीरे
घर के भीतर
अदृश्य कर दी जाती हैं। 
उनके बालों में उतरती सफ़ेदी
उम्र से अधिक
उपेक्षाओं की धूल होती है। 
वे अब भी
सुबह सबसे पहले उठती हैं, 
रसोई की आँच में
दिन पकाती हैं, 
सबकी पसंद याद रखती हैं, 
दवाइयों के समय से लेकर
बच्चों की आदतों तक
सब कुछ सँभालती हैं
पर अब
कोई उनसे नहीं पूछता
“तुम कैसी हो?” 
बच्चे बड़े हो जाते हैं, 
अपने-अपने आकाश चुन लेते हैं। 
उनकी दुनिया में
माँ
धीरे-धीरे
एक आवश्यक वस्तु भर रह जाती है। 
फोन पर बातें होती हैं, 
पर उनमें
वह आत्मीयता नहीं होती
जो कभी
बुख़ार में सिर सहलाते समय
माँ की हथेली में हुआ करती थी। 
 
पति भी
अब उन्हें
पहले की तरह नहीं देखते। 
उनकी आँखों में
अब आकर्षण नहीं, 
केवल आदत बची रहती है। 
वर्षों साथ रहने के बाद
दो लोग
कई बार
एक ही घर में रहते हुए भी
एक दूसरे तक नहीं पहुँच पाते। 
वह स्त्री
जिसने
अपने यौवन का हर रंग
परिवार के नाम कर दिया, 
अब
आईने के सामने खड़ी होकर
अपने ही चेहरे में
किसी खोई हुई लड़की को ढूँढ़ती है। 
उसके भीतर
अब भी
स्पर्श की एक प्यास बची रहती है, 
किसी के
धीरे से उसका हाथ पकड़ लेने की इच्छा, 
किसी के
उसकी थकान पढ़ लेने की आकांक्षा। 
पर इस उम्र में
स्त्रियों की इच्छाओं पर
समाज चुप्पी का पर्दा डाल देता है। 
मानो
पचास के बाद
उनका मन
मन नहीं रहता, 
उनकी देह
देह नहीं रहती। 
वे मुस्कुराती हैं, 
मेहमानों के सामने
सामान्य बनी रहती हैं, 
पर रात को
तकिए पर सिर रखते ही
उनके भीतर
एक लंबा सन्नाटा उतर आता है। 
 
वे सोचती हैं
क्या सचमुच
जीवन इतना ही था? 
क्या उनका जन्म
केवल
दूसरों के लिए जीने के लिए हुआ था? 
उनकी अलमारियों में
आज भी
कुछ अधूरे सपने तह करके रखे हैं
कहीं घूम आने की इच्छा, 
कुछ सीखने की आकांक्षा, 
थोड़ा सा अपने लिए जी लेने का स्वप्न। 
पर वर्षों की ज़िम्मेदारियों ने
उन्हें इतना बाँध दिया
कि वे
अपनी इच्छाओं को भी
स्वार्थ समझने लगीं। 
 
पचास पार की औरतें
बहुत कम रोती हैं, 
क्योंकि आँसू भी
अब भीतर ही सूख जाते हैं। 
वे जान चुकी होती हैं
कि हर पीड़ा
कह देने से हल नहीं होती। 
उनकी सबसे बड़ी त्रासदी
अकेलापन नहीं, 
बल्कि यह है
कि वे
अपनों के बीच रहकर भी
अकेली हो जाती हैं। 
 
वे
धीरे-धीरे
घर की दीवारों जैसी हो जाती हैं
सभी के लिए आवश्यक, 
पर किसी की दृष्टि में नहीं। 
फिर भी
वे टूटती नहीं। 
हर सुबह
फिर उठती हैं, 
तुलसी में जल डालती हैं, 
रसोई सँभालती हैं, 
सबके लौटने की प्रतीक्षा करती हैं। 
उनके भीतर
एक अद्भुत सहनशीलता होती है, 
जो उन्हें
जीवन से हारने नहीं देती। 
 
पचास पार की औरतें
दरअसल
घर की सबसे शांत नदी होती हैं
जो
बहुत कुछ बहा ले जाती हैं
पर शोर नहीं करतीं। 
और शायद
एक दिन
जब वे सचमुच नहीं रहेंगी, 
तब घर को समझ आएगा
कि वह स्त्री
सिर्फ़ एक व्यक्ति नहीं थी
वह उस घर की धड़कन थी, 
जिसके मौन हो जाने से
पूरा जीवन
सूना पड़ जाता है। 

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