कह-मुकरियाँ

15-06-2026

कह-मुकरियाँ

डॉ. सुशील कुमार शर्मा (अंक: 299, जून द्वितीय, 2026 में प्रकाशित)


मुझको देता शीतल छाया। 
देख उसे मन बहुत लुभाया। 
वर्षा देने में वह दक्ष। 
क्या सखि साजन? ना सखि ‘वृक्ष’॥
 
उसकी छटा श्याम सुखकारी। 
सावन में उसकी बलिहारी। 
धरा को जो कर देता मादल। 
क्या सखि साजन? ना सखि बादल॥
 
मुझको हरदम राह दिखाता। 
तम के भीतर दीप जलाता। 
वह मेरे जीवन का रक्षक। 
क्या सखि साजन? ना सखि शिक्षक॥
 
उसकी सूरत अति मनभावन। 
वह लगता तुलसी सा पावन। 
वह मेरी गोदी में लेटा। 
क्या सखि साजन? ना सखि बेटा॥
 
मंद-मंद मुस्काता रहता। 
शीतल रश्मि बहाता रहता। 
उसके आगे फीके इंद्र। 
क्या सखि साजन? ना सखि चन्द्र। 
 
वह मेरा साथी है सच्चा। 
मन उसका जैसे हो बच्चा। 
भोली सूरत उच्च चरित्र 
क्या सखि साजन? ना सखि मित्र। 
 
उसकी महिमा बड़ी निराली। 
भर दे जीवन में हरियाली। 
महक उठे जिससे मेरा तन। 
क्या सखि साजन? ना सखि उपवन॥
 
मेरे मन का वही सहारा। 
दुख में बन जाता रखवारा। 
दुखों को करता है वह राई 
क्या सखि साजन? ना सखि भाई॥
 
उसकी धुन में सपने बुनती। 
मन की गोपी उसको सुनती
तान सुने कान्हा का अंशी। 
क्या सखि साजन? ना सखि वंशी॥
 
मुझको सबसे अधिक दुलारा। 
उसने जीवन ख़ूब सँवारा। 
रोम-रोम उपजे उत्कर्ष
क्या सखि साजन? ना सखि ‘हर्ष’॥

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