अंतर्द्वंद्व में जीवन

01-06-2026

अंतर्द्वंद्व में जीवन

डॉ. सुशील कुमार शर्मा (अंक: 298, जून प्रथम, 2026 में प्रकाशित)

 

मनुष्य
आजकल बाहर से कम
भीतर से अधिक टूटता है। 
उसके चेहरे पर
मुस्कानों की एक औपचारिक परत है, 
किन्तु भीतर
अनगिनत असफलताओं, 
अपेक्षाओं, 
अकेलेपन
और अधूरी इच्छाओं का
एक अथाह अंधकार पलता है। 
वह
भीड़ में चलता है
पर भीतर
एक सुनसान गलियारे से गुज़रता रहता है। 
उसके पास
बात करने के हज़ार माध्यम हैं, 
किन्तु कहने के लिए
एक भी अपना कंधा नहीं। 
वह
हर दिन
स्वयं से लड़ता है
अपनी महत्वाकांक्षाओं से, 
अपनी थकानों से, 
अपने ही बनाए आदर्शों से। 
एक ओर
उसे सफल होना है, 
दूसरी ओर
संवेदनशील भी बने रहना है। 
उसे कमाना है, 
मुस्कुराना है, 
सबको साथ रखना है, 
और उसी समय
अपने भीतर मरते हुए मनुष्य को भी
जीवित बचाना है। 
यही उसका सबसे बड़ा युद्ध है। 
 
आज का मनुष्य
घर बनाते बनाते
घरपन खो रहा है। 
वह
सम्बन्ध निभा रहा है
पर सम्बन्धों में
उपस्थिति नहीं बची। 
प्रेम है
पर समय नहीं। 
संवाद हैं
पर आत्मीयता नहीं। 
 
हर कोई
अपने भीतर
एक अनकही चीख़ लिए घूम रहा है। 
किसी को
अपेक्षाओं ने थका दिया, 
किसी को
तुलनाओं ने, 
किसी को
अकेलेपन ने, 
और किसी को
अपनों की उदासीनता ने। 
मनुष्य
अब दूसरों से कम
स्वयं से अधिक भयभीत है। 
उसे डर है
कि कहीं एक दिन
वह इतना व्यस्त न हो जाए
कि अपनी आत्मा की आवाज़ ही भूल जाए। 
 
कभी कभी
रात के अंतिम प्रहर में
जब सारी दुनिया सो जाती है, 
तब उसका अंतर्मन
धीरे से पूछता है
जो जीवन तुम जी रहे हो, 
क्या सचमुच वही जीवन
तुम जीना चाहते थे? 
और यही प्रश्न
उसे भीतर तक हिला देता है। 
क्योंकि
उसने बहुत कुछ पाया है, 
पर स्वयं को खोकर। 
वह दूसरों की अपेक्षाओं का
इतना बड़ा घर बन गया
कि उसमें
उसके अपने सपनों के लिए
कोई कमरा ही नहीं बचा। 
 
आज का मनुष्य
दो हिस्सों में बँटा हुआ है
एक हिस्सा
जो संसार को दिखाई देता है, 
आत्मविश्वासी, सफल, हँसता हुआ। 
और दूसरा हिस्सा
जो हर रात
तकिए में चेहरा छिपाकर
अपने ही भीतर
चुपचाप रो लेता है। 
यह अंतर्द्वंद्व
केवल व्यक्ति का नहीं, 
पूरे समय का संकट है। 
हमने
प्रगति तो कर ली, 
पर शान्ति खो दी। 
सुविधाएँ पा लीं, 
पर सुकून खो दिया। 
 
अब
मनुष्य मशीनों से नहीं हार रहा, 
वह अपनी ही संवेदनहीनता 
से हार रहा है। 
और फिर भी
सबसे सुंदर बात यह है
कि उसके भीतर
अब भी
एक छोटा सा प्रकाश बचा है। 
वही प्रकाश
उसे टूटने नहीं देता। 
वही कहता है
कि
थोड़ा और प्रेम करो, 
थोड़ा और सुनो, 
थोड़ा और मनुष्य बने रहो। 
 
क्योंकि
इस युग का सबसे बड़ा प्रतिरोध
सफल होना नहीं, 
संवेदनशील बने रहना है। 

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