स्त्री का मोक्ष

01-06-2026

स्त्री का मोक्ष

डॉ. सुशील कुमार शर्मा (अंक: 298, जून प्रथम, 2026 में प्रकाशित)

 

वह
जिसे संसार
सौभाग्यवती कहता रहा, 
अक्सर
अपने ही भीतर
धीरे-धीरे विलुप्त होती रही। 
उसने
सिंदूर में अपना आकाश घोला, 
चूड़ियों में अपनी इच्छाएँ बंद कीं, 
और एक दिन
अनजाने ही
अपने नाम से अधिक
किसी और के नाम में पहचानी जाने लगी। 
 
वह प्रेम करती थी
इतना
कि स्वयं को
प्रेम से बाहर कर दिया। 
उसने
अपनी नींदें बाँट दीं, 
अपनी देह
परिवार की थकानों के नाम लिख दी, 
अपने सपनों को
रसोई के धुएँ में
धीरे-धीरे राख होते देखा। 
 
और तब भी
उससे पूछा गया
तुम्हें मिला ही क्या कम है? 
 
कितनी विचित्र है यह व्यवस्था
जहाँ समर्पण को
स्त्री का स्वभाव कहा गया, 
और उसके टूटने को
उसकी नियति। 
जो स्त्रियाँ
अपने पतियों से प्रेम करती हैं, 
वे भी
कभी-कभी
रात के अंतिम प्रहर में
चुपचाप ईश्वर से कहती हैं
 
अगले जन्म में
यदि फिर स्त्री बनाओ
तो मुझे
इतना मत मिटाना
कि मैं स्वयं को ही भूल जाऊँ। 
वे मुक्ति चाहती हैं
प्रेम से नहीं, 
उस विलय से
जहाँ उनका अपना अस्तित्व
धीरे-धीरे
किसी और की परछाईंं बन गया। 
 
और जो स्त्रियाँ
प्रेम नहीं कर पाईं, 
जो अपमानों के बीच
दिन गिनती रहीं, 
जो देह पर नीले निशान
और आत्मा पर
अनकहे घाव लेकर जीती रहीं
उनकी प्रार्थना
और भी गहरी होती है। 
वे कहती हैं
हे ईश्वर, 
यदि यही बँधन है
तो मुझे जन्मों का यह चक्र
यहीं समाप्त कर दो।” 
क्योंकि
हर स्त्री
सिर्फ़ पत्नी नहीं होती, 
वह भी
एक सम्पूर्ण मनुष्य होती है
जिसके भीतर
स्वप्न होते हैं, 
एक निजी आकाश होता है, 
एक ऐसी पहचान
जो केवल किसी सम्बन्ध की परिभाषा नहीं। 
पर इस समाज ने
उसे इतना बाँटना सिखाया
कि अंत में
उसके पास
स्वयं के लिए कुछ बचा ही नहीं। 
 
वह
जीवन भर
सबकी मुक्ति का कारण बनी रही
बच्चों की चिंता से, 
पति की अव्यवस्था से, 
घर की विखंडन से
पर किसी ने नहीं पूछा
कि उसे
किससे मुक्ति चाहिए। 
उसकी सबसे बड़ी पीड़ा
मार नहीं थी, 
तिरस्कार नहीं था, 
बल्कि यह था
कि वह धीरे धीरे
अपने भीतर से ग़ायब होती रही
और किसी ने
उसकी अनुपस्थिति तक महसूस नहीं की। 
 
इसलिए
कई स्त्रियाँ
मोक्ष इसलिए नहीं माँगतीं
कि उन्हें स्वर्ग चाहिए, 
वे इसलिए माँगती हैं
कि उन्हें
फिर से स्वयं होना है। 
एक ऐसा जन्म
जहाँ प्रेम हो
पर स्वत्व भी हो, 
जहाँ साथ हो
पर समर्पण आत्महत्या न बने, 
जहाँ विवाह
बँधन नहीं
दो स्वतंत्र आत्माओं की सहयात्रा हो। 
 
और शायद
सच्चा मोक्ष भी यही है
जब स्त्री
किसी की परछाईंं नहीं, 
अपने अस्तित्व की पूर्ण रोशनी बन सके। 

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