कविता से मेरा रिश्ता

01-06-2026

कविता से मेरा रिश्ता

डॉ. सुशील कुमार शर्मा (अंक: 298, जून प्रथम, 2026 में प्रकाशित)

 

कविता से मेरा रिश्ता
वैसा नहीं
जैसे शब्दों का काग़ज़ से होता है, 
यह रिश्ता
वैसा है
जैसे किसी सूखी धरती का
पहली वर्षा से होता है। 
कविता
मेरे लिए
अलंकारों की सजावट नहीं, 
वह भीतर की उस अनुगूँज का नाम है
जो मनुष्य को
मनुष्य बनाए रखती है। 
जब
दुनिया की आपाधापी में
संवेदनाएँ थक जाती हैं, 
जब सम्बन्ध
औपचारिकताओं की धूल से ढँक जाते हैं, 
जब मन
अपने ही भीतर
एक अजनबी की तरह भटकता है, 
तब कविता
धीरे से आती है
और आत्मा के कंधे पर
हाथ रख देती है। 
कविता
कभी लिखी नहीं जाती, 
वह जन्म लेती है
किसी माँ की आँखों में
रातभर जागते हुए, 
किसी किसान की हथेलियों में
बीज दबाते समय, 
किसी मज़दूर के पसीने में, 
किसी बेटी की चुप्पी में, 
किसी बूढ़े पिता की
धीरे होती चाल में। 
 
मैंने
कविता को
पुस्तकों में कम, 
जीवन में अधिक पाया है। 
वह
गौरैया के लौटकर न आने की पीड़ा में है, 
सूखती हुई नदी के तल में है, 
कटते हुए वृक्षों की निस्तब्धता में है, 
और उस बच्चे की आँखों में भी
जो रोटी से पहले
ममता खोजता है। 
कविता
उपदेश नहीं देती, 
वह
हृदय में
एक दीप रख देती है
जिससे मनुष्य
स्वयं अपना अंधकार देख सके। 
वह
शोर नहीं करती, 
फिर भी
सभ्यताओं से अधिक देर तक जीवित रहती है। 
क्योंकि कविता
विचारों से नहीं, 
अनुभवों से बनती है। 
 
जिसने
वियोग की राख नहीं छुई, 
जिसने
प्रतीक्षा की रातें नहीं जानीं, 
जिसने
असफलताओं के अँधेरे में
अपने भीतर की लौ नहीं बचाई
वह शब्द तो लिख सकता है, 
पर कविता नहीं। 
कविता
मनुष्य के भीतर
बचे हुए देवत्व की अंतिम शरण है। 
वह
क्रोध में भी करुणा खोज लेती है, 
वह
अंधकार में भी
एक जुगनू बचाए रखती है। 
 
मैं जब
पर्वतों को देखता हूँ
तो कविता
उनकी स्थिरता में उतर आती है। 
जब नदी बहती है
तो लगता है
मानो समय स्वयं
छंदों में बदल गया हो। 
जब अमलतास झरता है
तो पीले फूलों में
मौन प्रेम की भाषा खिल उठती है। 
कविता
प्रकृति और मनुष्य के बीच
वह अदृश्य सेतु है
जिस पर चलकर
आत्मा
अपने मूल तक पहुँचती है। 
वह
सिर्फ़ सुंदरता का वर्णन नहीं, 
विसंगतियों का साक्ष्य भी है। 
जहाँ अन्याय है
वहाँ कविता
प्रतिरोध बनती है। 
जहाँ पीड़ा है
वहाँ वह स्पर्श बन जाती है। 
जहाँ प्रेम है
वहाँ वह प्रार्थना हो जाती है। 
 
कविता का सबसे बड़ा गुण
उसकी सच्चाई है। 
वह
झूठे वैभव से प्रभावित नहीं होती। 
उसे
राजसिंहासन से अधिक
किसी झोपड़ी का दीप आकर्षित करता है। 
वह
उन लोगों के साथ खड़ी रहती है
जो बोल नहीं पाते। 
और शायद
इसीलिए
कविता कभी मरती नहीं। 
एक सच्ची कविता
पाठक के हृदय में
वैसे ही उतरती है
जैसे वर्षों बाद
माँ की आवाज़ स्मृति में उतरती है। 
वह
पढ़ी कम जाती है, 
महसूस अधिक होती है। 
कई बार
कविता
आँसू बनकर बहती है, 
कई बार
मौन बनकर ठहर जाती है। 
 
मैंने जाना है
कविता लिखना
दरअसल
अपने भीतर के मनुष्य को बचाए रखना है। 
जब संसार
हिसाब में उलझा हो, 
कविता
निःस्वार्थ रहना सिखाती है। 
जब सम्बन्ध
स्वार्थ के तराज़ू पर तौले जा रहे हों, 
कविता
एक निष्कलुष स्पर्श की तरह
हृदय में उतरती है। 
और जब
समय
मनुष्य को कठोर बनाने लगे, 
तब कविता
भीतर कहीं
एक कोमल कोना बचाए रखती है। 
 
कविता से मेरा रिश्ता
केवल रचनाकार और रचना का नहीं, 
यह जीवन और चेतना का रिश्ता है। 
मैं कविता को नहीं लिखता, 
कविता
धीरे धीरे
मुझे लिखती रहती है। 
 
मेरी संवेदनाओं में, 
मेरी विफलताओं में, 
मेरे प्रेम में, 
मेरे संघर्षों में, 
मेरे मौन में। 
और शायद
मेरे बाद भी
यदि कुछ शेष रहेगा, 
तो वह मेरा नाम नहीं
मेरी कविताओं में बची हुई
मनुष्यता होगी। 

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