आख़िरी रोटी

15-05-2026

आख़िरी रोटी

डॉ. सुशील कुमार शर्मा (अंक: 297, मई द्वितीय, 2026 में प्रकाशित)

 

रवि शहर में नौकरी करता था। वर्षों बाद गाँव आया तो उसे माँ बहुत कमज़ोर लगी। वह हर बात पर टाल देती “अब उम्र हो गई है बेटा, भूख कम लगती है।” 

रवि ने ध्यान दिया, माँ आज भी सबको गरम रोटियाँ खिलाती है, पर स्वयं अंत में बचा हुआ खा लेती है। 

एक रात उसे देर तक काम करना था। वह पानी लेने गया तो देखा कि माँ कोने में बैठी बची हुई सूखी रोटी पानी में भिगोकर खा रही थी। 

रवि चौंका, “माँ, तुमने सब्ज़ी क्यों नहीं ली?” 

माँ मुस्कुरा दी, “तेरे बेटे को पसंद है न . . . वही बचाकर रख दी। और मुझे ये सब्ज़ी इतनी अच्छी भी नहीं लगती।” 

उसी समय रवि की नज़र डिब्बे पर पड़ी। घर में आटा बहुत कम बचा था। सुबह उसने पहली बार समझा कि माँ की कम भूख दरअसल घर की चिंता थी। 

बचपन में वही माँ उसे अपनी थाली से कौर खिलाती थी, और आज बुढ़ापे में वह अपने हिस्से की रोटी भी परिवार में बाँट रही थी। 

रवि की आँखें भर आईं। उसे लगा कि घर की सबसे भूखी स्त्री ही अक्सर सबसे तृप्त दिखाई देती है। 

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