रेत का आदमी

01-05-2026

रेत का आदमी

डॉ. सुशील कुमार शर्मा (अंक: 296, मई प्रथम, 2026 में प्रकाशित)

 

विवेक हर असफलता पर टूट जाता था। नौकरी न मिली रोया। प्रेम विफल हुआ रोया। व्यापार डूबा रोया। 

धीरे-धीरे लोग उससे दूर होने लगे। एक मित्र ने कहा, “दुखों पर क़ाबू सिर्फ़ साहस से पाया जाता है जो तुम्हारे पास नहीं है।”

विवेक को चोट लगी। वह नदी किनारे जाकर बैठा रहा। वहाँ एक बालक रेत का घर बना रहा था। लहर आई, घर टूट गया। बालक हँसा और फिर बनाने लगा। 

विवेक ने पूछा, “टूटने पर रोते क्यों नहीं?” 

बालक बोला, “क्योंकि रोऊँगा तो, फिर नया घर कैसे बनाऊँगा?” 

उस छोटे से उत्तर ने विवेक का जीवन बदल दिया। उसे समझ आया कि अधिक आँसू मन को हल्का नहीं करते, कभी-कभी निर्माण की मिट्टी ही बहा ले जाते हैं। 

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