मिलन के विरुद्ध

01-04-2026

मिलन के विरुद्ध

डॉ. सुशील कुमार शर्मा (अंक: 294, अप्रैल प्रथम, 2026 में प्रकाशित)

 

कभी कभी
सोचता हूँ
यदि मनुष्य ने
एक दूसरे तक पहुँचने के मार्ग
इतने सरल न बनाए होते। 
यदि दूरी
केवल भूगोल नहीं
एक अनुशासन होती
तो शायद
हृदय अपने ही भीतर
अधिक गहरे उतरता
मिलन
अपने साथ
कितनी अनकही विडंबनाएँ लाता है
समीपता के भीतर ही
विरक्ति के बीज छिपे रहते हैं। 
 
स्पर्श
जो प्रारंभ में
एक मधुर आश्वासन होता है
धीरे धीरे
अधिकार की कठोर भाषा में बदल जाता है
और फिर
वही निकटता
एक दिन
अपरिचय का सबसे तीखा अनुभव बन जाती है
इसलिए कभी लगता है
कि दूरी
केवल अभाव नहीं
संरक्षण भी है। 
 
यदि हम
एक दूसरे को
केवल शब्दों में छूते
तो कितनी कोमल रहती दुनिया
पत्रों की स्याही में
उँगलियों की ऊष्मा बसती
और अक्षरों के बीच
धड़कता रहता
अधूरा किन्तु सुरक्षित प्रेम
कितना कुछ बचा रहता
अनकहा
और उसी अनकहे में
अपनी सबसे सुंदर आकृति में जीवित। 
 
काग़ज़
केवल संदेश का माध्यम नहीं होता
वह प्रतीक्षा का शरीर बन जाता
जिसे खोलते समय
हृदय अपनी धड़कनों को
धीरे धीरे पढ़ता
कोई शब्द
सीधे कानों में नहीं उतरता
वह पहले आँखों से गुज़रता
फिर आत्मा में उतरकर
अपना घर बनाता
और तब
प्रेम
क्षणिक आवेग नहीं रहता
वह दीर्घ साधना बन जाता। 
 
सोचता हूँ
यदि संवाद
केवल लिखित होता
तो कितनी बच जातीं चीख़ें
कितने हाथ
घृणा की ओर नहीं मुड़ते
वे शब्दों को सँवारते
वाक्यों को सहलाते
और अर्थों में शरण लेते
बारूद की गंध से पहले
स्याही की गंध
मनुष्य के भीतर बसती
और युद्ध
शायद
एक अधूरा वाक्य बनकर
किसी ड्राफ़्ट में ही रह जाता। 
 
दूरी
मनुष्य को
अकेला नहीं करती
वह उसे
स्वयं के निकट लाती है
जहाँ वह
अपने ही भीतर
दूसरे का स्थान बना सकता है
बिना उसे खोए
कितना अद्भुत होता
यदि हम
मिलने से अधिक
लिखने पर विश्वास करते। 
 
यदि हर विदाई
एक नए पत्र की शुरूआत होती
और हर प्रतीक्षा
एक नए अर्थ की सम्भावना
तब शायद
बिछड़ना
इतना पीड़ादायक न होता
क्योंकि जो कुछ भी होता
वह अक्षरों में सुरक्षित रहता। 
 
और हम
कभी भी
किसी भी क्षण
उन शब्दों के बीच
वापस लौट सकते
जहाँ प्रेम
समय से परे
अपनी शांत और दीर्घ श्वास में
अब भी जीवित होता। 

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