काँच हुए सब रिश्ते-नाते

15-04-2026

काँच हुए सब रिश्ते-नाते

डॉ. सुशील कुमार शर्मा (अंक: 295, अप्रैल द्वितीय, 2026 में प्रकाशित)

 

काँच हुए सब रिश्ते-नाते, 
मन भी टूट भरे। 
 
भीतर-भीतर सन्नाटे अब, 
मन में खटक रहे। 
शहरों की इस भीड़ में रिश्ते, 
खूँटी लटक रहे। 
पास बैठ कर भी कोसों की, 
दूरी पाल रहे। 
आँखों की भाषा को पढ़ना, 
हम सब टाल रहे। 
संवेदन की सूखी क्यारी, 
कोमल भाव मरे। 
 
हाथों में मोबाइल थामे, 
दुनिया साथ लिए। 
पर घर के ही कमरे में हम, 
ख़ुद को बंद किए। 
मुखड़ों पर झूठी मुस्कानें, 
अश्रु भटक रहे। 
रिश्ते अब तो आभासी हैं, 
भ्रम में अटक रहे। 
शब्द अर्थ सब बेगाने हैं
केवल तर्क धरे। 
 
स्वारथ की आपाधापी में, 
अपनापन खोया। 
अहंकार का मरुथल फैला, 
सरल हृदय रोया। 
देख किसी की पीड़ा पर अब, 
पत्थर हैं आँखें। 
स्वप्न नहीं दिखते हैं इनमें, 
मुरझाईं पाँखें। 
सजी हुई महफ़िल में भी हम, 
बेबस सिसक भरे। 
 
बाज़ारों का शोर-शराबा, 
संवेदन बौने। 
रिश्तों की इस टूट-फूट में, 
वीराने कौने। 
दिल मशीन से चलते हैं अब, 
श्रम का अंत हुआ। 
करे दिखावा जग में जो भी, 
उतना संत हुआ। 
बर्फ़ सरीखे ठंडे मन हैं, 
भीतर धधक भरे। 

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