फेंकी हुई रोटियाँ

15-03-2026

फेंकी हुई रोटियाँ

डॉ. सुशील कुमार शर्मा (अंक: 294, मार्च द्वितीय, 2026 में प्रकाशित)

 

अमलतास के पीले फूलों से ढकी सड़क पर सन्नाटा पसरा था। महल्ले के ऊँचे रुसूख़ वाले सफ़ेद बँगले के बाहर कूड़ेदान लबालब भरा था। रम्मू अपनी फटी बसंती कमीज़ की आस्तीन चढ़ाए, उस ढेर में से प्लास्टिक की बोतलें बीन रहा था। 

तभी बँगले की बालकनी से एक तीखी आवाज़ आई, “ऐ छोकरे! इधर आ।”

रम्मू ठिठक गया। बँगले वाली मालिकिन के हाथ में बासी रोटियों का एक पैकेट था। उन्होंने दूर से ही पैकेट उसकी ओर उछाला। पैकेट बीच हवा में खुला और रोटियाँ नाली के किनारे जा गिरीं। 

“ले, खा लेना। कल त्योहार था तो बच गई थीं,” मालिकिन ने नाक सिकोड़ते हुए कहा। 

रम्मू ने गिरी हुई रोटियों को देखा, फिर अपनी झोली से एक ताज़ा गुड़ की डली निकाली, जिसे उसने सुबह की मज़दूरी से ख़रीदा था। उसने रोटियाँ नहीं उठाईं। पास ही दीवार की मुँडेर पर बैठे एक भूखे कुत्ते की ओर इशारा करते हुए बड़े शांत स्वर में बोला, “माई, दान तो वह है जो हाथ से हाथ तक पहुँचे। जो ज़मीन पर गिर जाए, वह तो बस बोझ उतारना होता है।”

मालिकिन निरुत्तर थी। रम्मू अपनी ख़ाली बोरी कंधे पर लादकर आगे बढ़ गया, पर पीछे मुँडेर पर बैठा कुत्ता अब रोटियों की तरफ़ नहीं, बल्कि रम्मू की सादगी की ओर देख रहा था। 

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