बारूदी बयार

15-03-2026

बारूदी बयार

डॉ. सुशील कुमार शर्मा (अंक: 294, मार्च द्वितीय, 2026 में प्रकाशित)

 

युद्ध भरी सहमी
दुनिया में
चलो प्रेम का दीप जलाएँ। 
 
सहम रही है मानवता अब
तोपों के
ख़ूनी जंगल में। 
शांति-दूत की
चीख़ दबी है
स्वार्थ-सिद्धि के इस दंगल में। 
 
हमने देखीं बारूदों की
काली-ख़ूनी
कुटिल घटाएँ। 
 
सत्ता के
उन्मादी रथ पर
साज़िश का
फ़ौलादी पहिया। 
सरहद के
ख़ूनी मंज़र में
डूब रही जन-जन की नैया। 
 
किसने यहाँ मानचित्रों पर
खींची हैं
ख़ूनी रेखाएँ। 
 
कूटनीति के
बंद कक्ष में
बिकतीं हैं सबकी तक़दीरें। 
इंसानी
धड़कन के ऊपर
पहरा देतीं हैं शमशीरें। 
 
हमने सोचा मासूमों को
अमन चैन
का दीप दिखायें। 
 
सिसक रही
आज़ाद फिज़ाएँ
भीषण विनाश के घेरे में। 
संवेदन को
लकवा मारा
जगत खड़ा है
अँधेरे में। 
 
विकृत और उन्मादी दुनिया
साँसें इसकी
चलो बचायें। 

0 टिप्पणियाँ

कृपया टिप्पणी दें

लेखक की अन्य कृतियाँ

लघुकथा
गीत-नवगीत
कविता
दोहे
साहित्यिक आलेख
कविता-मुक्तक
सांस्कृतिक आलेख
बाल साहित्य कविता
स्मृति लेख
कहानी
काम की बात
सामाजिक आलेख
कविता - हाइकु
ऐतिहासिक
कविता - क्षणिका
चिन्तन
व्यक्ति चित्र
किशोर साहित्य कहानी
सांस्कृतिक कथा
हास्य-व्यंग्य आलेख-कहानी
ललित निबन्ध
स्वास्थ्य
खण्डकाव्य
नाटक
रेखाचित्र
काव्य नाटक
यात्रा वृत्तांत
हाइबुन
पुस्तक समीक्षा
हास्य-व्यंग्य कविता
गीतिका
अनूदित कविता
किशोर साहित्य कविता
एकांकी
ग़ज़ल
बाल साहित्य लघुकथा
सिनेमा और साहित्य
किशोर साहित्य नाटक
विडियो
ऑडियो

विशेषांक में