"इतनी माया जोड़ कर क्या करोगे? मैंने पहले ही कहा था। अब तो हमारा बेटा भी चला गया इकलौता; अब क्या करोगे इस माया का?" सुरेंद्र की पत्नी अपने बेटे के शव के पास बिलख रही थी।

सुरेंद्र दवाओं का थोक व्यापारी था। कोरोना काल में दवाओं की ख़ूब काला-बाज़ारी की थी।  रेमेडिसेविर और इंजेक्शन बीस-बीस हज़ार में बेचे थे।

बहुत कोशिशों के बावजूद डॉक्टर उसके इकलौते पुत्र को नहीं बचा पाए।

सुरेंद्र ने अपनी दुकान की सारी दवाइयाँ और एक हज़ार रेमेडिसेवियर इंजेक्शन और १० लाख रुपये कोरोना मरीज़ों के इलाज हेतु दान कर दिये।
 

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