"बस यही तुम में और मनोज में अंतर है, तुम हर काम को अपने अनुसार करते हो जबकि मनोज हर काम को समझबूझ कर मुझसे पूछ कर करता है," रमेश ने अपने बेटे सुजीत पर झल्लाते हुए कहा। 

"पर पापा आप मुझ पर अपनी सलाह क्यों थोपते हो मैं बड़ा हो गया हूँ; मैं अपने निर्णय अपने विवेक से लेना चाहता हूँ," सुजीत ने अपने पिता का विरोध किया। 

"हाँ अब तुम बहुत बड़े हो गए हो अपने पिता से भी बड़े बग़ैर पूछे काम करने का लाइसेंस मिल गया है तुम्हें," पिता ने लगभग लताड़ते हुए सुजीत से कहा। 

"आप पिता हैं हमेशा पिता ही रहेंगे; मैं पिता के रूप में आपका सम्मान करता हूँ लेकिन ज़रूरी नहीं कि मैं हर बात आपके अनुसार करूँ, आपकी हर सलाह मानूँ," सुजीत के स्वर में तल्ख़ी थी। 

"अब मेरी बात क्यों मानोगे बेटा अब मैं बूढ़ा जो हो गया हूँ," रमेश के स्वर में दर्द था। 

"पापा आप सोच बदलिए आपके बेटे बड़े हो गए हैं। उन्हें अपने निर्णय लेने के अधिकार से वंचित मत करिये," सुजीत ने अपने पिता को समझाया।

"यही तो अंतर है तुम्हारी और मनोज की सोच में उसके लिए पिता ही सबकुछ है और तुम्हारे लिए कुछ भी नहीं," रमेश के चेहरे पर ग़ुस्सा था। 

"हाँ पापा यही अंतर है मुझमें और मनोज भैया में। मैं आज अपने पैरों पर खड़ा हूँ और वो आज भी आप पर आश्रित हैं। मन में सम्मान होना और बात मानना दोनों में बहुत अंतर है," सुजीत मुस्कुराते हुए वहाँ से निकल गया और छोड़ गया रमेश के मन में कई प्रश्न। 

4 टिप्पणियाँ

  • अच्छी लघुकथा। बधाई।

  • 3 Aug, 2021 02:17 PM

    आपने पूत व कपूत में अंतर को सही दर्शाया। साधुवाद।

  • बहुत बढ़िया

  • 1 Aug, 2021 01:44 PM

    आज के जेनरेशन गेप पर अच्छा लिखा है श्रीमानजी आपने।पिता लोगों को समझना चाहिए कि किसी बात को थोपना हमेशा ही कारगर हो ऐसा संभव नहीं।बहुत सुंदर ।आप मेरे पसंदीदा साहित्यकारों में शुमार हो ।

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