हिंदी भाषा की उत्पत्ति एवं विकास एवं अन्य भाषाओं का प्रभाव

15-09-2019

हिंदी भाषा की उत्पत्ति एवं विकास एवं अन्य भाषाओं का प्रभाव

सुशील कुमार शर्मा

(हिंदी दिवस पर विशेष )
 

प्रारम्भिक अवस्था में मानव ने अपने भावों-विचारों को अपने अंग संकेतों से प्रेषित किया होगा बाद में इसमें जब कठिनाई आने लगी तो सभी मनुष्यों ने सामाजिक समझौते के आधार पर विभिन्न भावों, विचारों और पदार्थों के लिए अनेक ध्वन्यात्मक संकेत निश्चित कर लिए। यह कार्य सभी मनुष्यों ने एकत्र होकर विचार विनिमय द्वारा किया। इस प्रकार भाषा का क्रमिक गठन हुआ और एक सामाजिक पृष्ठभूमि में सांकेतिक संस्था द्वारा भाषा की उत्पत्ति हुई।

प्रत्येक भाषा लोगों की आत्मा की निशानी और शक्ति है, जो स्वाभाविक रूप से इसे उन्हें अभिव्यक्त करती है। इसलिए प्रत्येक के अपने विचार-स्वभाव, जीवन, ज्ञान और अनुभव व्यक्त करना का तरीक़ा विकसित होता है ...। इसलिए किसी राष्ट्र के लिए या मानव समूह- का सबसे बड़ा मूल्य है, अपनी भाषा को संरक्षित करना और इसे एक मज़बूत और जीवित संस्कृति का साधन बनाना। एक राष्ट्र, जाति या एक व्यक्ति, जो अपनी भाषा खो देता है, अपना संपूर्ण जीवन या उसका वास्तविक जीवन नहीं जी सकता है।

भारतीय उपमहाद्वीप में, संस्कृत के उद्भव के बाद, कई नई भाषाएँ समय के साथ विकसित हुईं और बाद के पूर्ण उन्मूलन के बिंदु तक उनकी स्रोत भाषा को बदल दिया गया। कोई भी सिद्धांत या संभावना इस बात की जानकारी प्रदान नहीं करता है कि संस्कृत के लिए स्रोत भाषा एशिया माइनर से नहीं बल्कि उपमहाद्वीप के भीतर से आई है, और यह कि संस्कृत का एक पुराना संस्करण ही स्रोत भाषा थी। वैदिक लोगों की उत्पत्ति और पृष्ठभूमि के बारे में इतिहासकारों के बीच काफ़ी विवाद रहा है। न्यूज़ीलैंड के ऑकलैंड विश्वविद्यालय की विकासवादी जीवविज्ञानी क्विनटिन एटकिंसन ने अपने शोध के दौरान पाया कि इंडो-युरोपीयन समूह की भाषाएँ पश्चिमी एशिया के एक ही इलाक़े में पैदा हुई हैं। उनके अनुसार ऐसा क़रीब 8000 से 9500 हज़ार साल पहले हुआ था। शोध के दौरान उन्होंने क़रीब 100 से ज़्यादा प्राचीन और समकालीन भाषाओं का कंप्यूटर के माध्यम से अध्ययन किया और पाया कि यह सभी भाषाएँ अनातोलिया के इलाक़ों में पैदा हुई हैं।

सिंधु सभ्यता मूल रूप से एक भारतीय मामला था, जिस पर बाहर की दुनिया का कम या कोई प्रभाव नहीं था और वे शायद वैदिक लोगों के पहले के चचेरे भाई थे, कुछ द्रविड़ तत्वों के साथ पुरानी संस्कृत के रूढ़िवादी रूप को भाषा के रूप में प्रयोग करते थे, और कृषि, धातु विज्ञान, शहरी नियोजन, व्यापार और वाणिज्य के विशेषज्ञ थे। सभ्यता शायद 6000 ईसा पूर्व के आसपास शुरू हुई क्योंकि ईरान की सीमाओं तक, उपमहाद्वीप के विशाल क्षेत्र में खेती और खाद्य एकत्रीकरण समुदाय फैला हुआ है। इसने दो चरणों में अपना चरम स्थान प्राप्त किया। पहले चरण में, शायद लगभग 4500 ईसा पूर्व, यह छोटे गाँव की बस्तियों में विकसित हुआ और फिर 3500 ईसा पूर्व या उससे भी पहले सुव्यवस्थित और समृद्ध शहरी शहरों में विकसित हुआ। सिंधु लोग संभवतः सरस्वती नदी के एक क्षेत्र में रहते थे, जो अब विलुप्त हो चुका है, इससे पहले कि वे अन्य क्षेत्रों में चले गए, जलवायु परिवर्तन से मजबूर हो गए।

संभवतः 2500 ईसा पूर्व के आसपास सिंधु संस्कृति द्वारा वैदिक संस्कृति अपना ली गई और, संस्कृत संचार की प्रमुख भाषा के रूप में, कम से कम समाज के कुलीन और शासक वर्गों के बीच में स्थापित हो चुकी थी। इस समय तक संस्कृत पहले से ही एक पूर्ण विकसित भाषा के रूप में विकसित हो चुकी थी जैसा कि वेदों में पाए गए सबसे पहले के संस्कृत श्लोकों से स्पष्ट होता है।
संस्कृत के प्रत्येक स्वर और व्यंजन में एक विशेष और अविवेकी बल होता है जो चीज़ों की प्रकृति और विकास या मानव की पसंद से मौजूद होता है; ये मूलभूत ध्वनियाँ हैं जो तांत्रिक द्विजमंत्रों के आधार पर निहित हैं और मंत्र की प्रभावकारिता का गठन करती हैं। मूल भाषा के प्रत्येक स्वर और प्रत्येक व्यंजन के कुछ प्राथमिक अर्थ होते थे, जो इस आवश्यक शक्ति या बल से उत्पन्न हुए थे और अन्य व्युत्पन्न अर्थों के आधार थे। स्वरों के साथ, व्यंजन और किसी भी संयोजन के बिना, स्वरों ने स्वयं कई प्राथमिक जड़ें बनाईं, जिनमें से द्वितीयक जड़ों को अन्य व्यंजन के अतिरिक्त विकसित किया गया था। सभी शब्द इन जड़ों से बने थे।

हिंदी भाषा की उत्पत्ति कहाँ से है? किन पूर्ववर्ती भाषाओं से वह निकली है? वे कब और कहाँ बोली जाती थीं? हिंदी को उसका वर्तमान रूप कब मिला? इस पर बहुत मत और वादविवाद हो सकते हैं किन्तु कितने ही वैदिक छंद तक अवेस्ता में तद्वत पाए जाते हैं। इन उदाहरणों से साफ़ ज़ाहिर है कि वैदिक आर्यों के पूर्वज किसी समय वही भाषा बोलते थे जो कि ईरानी आर्यों के पूर्वज बोलते थे। अन्‍यथा दोनों की भाषाओं में इतना सादृश्‍य कभी न होता। भाषा सादृश्‍य ही नहीं, किंतु अवेस्‍ता को ध्‍यान-पूर्वक देखने से और भी कितनी ही बातों में विलक्षण सादृश्‍य देख पड़ता है। संस्‍कृत और अवेस्‍ता की भाषा में इतना सादृश्‍य है कि दोनों का मिलान करने से इस बात में ज़रा भी संदेह की जगह नहीं रह जाती कि किसी समय ये दोनों भाषाएँ एक ही थीं। शब्‍द, धातु, कृत, तद्धित, अव्‍यय इत्‍यादि सभी विषयों में विलक्षण सादृश्‍य है।

अशोक के समय में दो तरह की प्राकृत प्रचलित थी - एक पश्चिमी, दूसरी पूर्वी। इनमें से प्रत्‍येक का गुण-धर्म जुदा-जुदा है - प्रत्‍येक का लक्षण अलग-अलग है। पश्चिमी प्राकृत का मुख्‍य भेद शौरसेनी है। वह शूरसेन प्रदेश की भाषा थी। गंगा-यमुना के बीच के देश में, और उसके आस-पास, उसका प्रचार था। पूर्वी प्राकृत का मुख्‍य भेद मागधी है। वह उस प्रांत की भाषा थी जो आज कल बिहार कहलाता है। इन दोनों देशों के बीच में एक और भी भाषा प्रचलित थी। वह शौरसेनी और मागधी के मेल से बनी थी और अर्द्ध-मागधी कहलाती थी। सुनते हैं, जैन-तीर्थं कर महावीर इसी अर्द्ध-मागधी में जैन-धर्म का उपदेश देते थे। पुराने जैन ग्रंथ भी इसी भाषा में हैं। अर्द्ध-मागधी की तरह की और भी भाषा प्रचलित थी।

हिंदी की शब्दावली मुख्यतः संस्कृत से ली गई है। अन्य इंडो-आर्यन भाषाओं की तरह हिंदी अपने वर्तमान आकार में 10वीं शताब्दी के आसपास आकार लेने लगी। लेकिन 14वीं शताब्दी से पहले यह सौरासेनी अपभ्रंश से अत्यधिक प्रभावित था। दिलचस्प बात यह है कि सौरासेनी ने पंजाबी को भी जन्म दिया। (पंजाबी पर लेख देखें)।

सबसे पुरानी हिंदी मिस्टिको - भक्ति काव्य - गोरख नाथ 1150 के पद्य और वेणी, महान नाथ पंथ के शिक्षक, और अन्य समकालीन योगी हठ-योग के दर्शन और अभ्यास का उपदेश भी इसी अवधी में दिया गया है। लेकिन उनकी भाषा बहुत बदली हुई है और यह तय करना मुश्किल है कि इनमें से कितनी रचनाएँ वास्तविक हैं। इन कविताओं में शुद्ध जीवन की आवश्यकता, भौतिक समृद्धि से अलगाव और वास्तविक ज्ञान पर जोर दिया गया, जिसने बाद के काल के भक्त कवियों के लिए जमीन तैयार की।

प्राचीन भारतीय आर्यभाषा काल का समय 1500 ईसा पूर्व से लेकर 500 ईसापूर्व तक माना गया है इसमें वेदों, ब्राह्मण ग्रंथो एवं पाणनि की अष्टाध्यायी की रचना हुई। हिंदुस्‍तान की वर्तमान संस्‍कृतोत्‍पन्‍न भाषाओं का जन्‍म कोई 1000 ईसवी के लगभग हुआ। मध्यकालीन भारतीय आर्यभाषा काल 500 ईसा पूर्व से 1000 ईस्वी सन तक माना जाता है इस समय इस समय लोक भाषा का विकास हुआ और उन्हें पालि (500 ईसा पूर्व से -1 ईसा पूर्व तक ) प्राकृत (1 ईसा से 500 ईस्वी तक ) अपभ्रंश (500 ईस्वी से 1000 ईस्वी तक ) भाषा का नाम दिया गया। अभी तक माना जाता था कि ब्राह्मी लिपि का विकास चौथी से तीसरी सदी ईसा पूर्व में मौर्यों ने किया था, पर भारतीय पुरातात्विक सर्वेक्षण के ताज़ा उत्खनन से पता चला है कि तमिलनाडु और श्रीलंका में यह 6ठी सदी ईसा पूर्व से ही विद्यमान थी। यह लिपि प्राचीन सरस्वती लिपि (सिन्धु लिपि) से निकली, अतः यह पूर्ववर्ती रूप में भारत में पहले से प्रयोग में थी। सरस्वती लिपि के प्रचलन से हट जाने के बाद प्राकृत भाषा लिखने के लिये ब्राह्मी लिपि प्रचलन मे आई। ब्राह्मी लिपि में संस्कृत मे ज्यादा कुछ ऐसा नहीं लिखा गया जो समय की मार झेल सके। भारतीय आचार्यों ने शब्दों की दो स्थितियाँ - सिद्ध एवं असिद्ध दी हैं। इनमें "असिद्ध" शब्द को केवल "शब्द" तथा "सिद्ध" शब्द को "पद" के रूप में परिणत किया जाता है। "सिद्धि" के सुंबत (नाम) एवं तिङंत (क्रिया) तथा "असिद्ध" के कई भेद प्रभेद किए गए हैं। यहाँ तक कि संस्कृत का प्रत्येक शब्द "धातुज" ठहराया गया है। व्याकरण शास्त्र का नामकरण एवं उनकी परिभाषा इसी प्रक्रिया को ध्यान में रख कर की गई है यथा, शब्दानुशसन (महर्षि पतंजलि एवं आचार्य हेमचंद्र) तथा "व्याक्रियंते विविच्यंते शब्दा: अनेन इति व्याकरणम्।" पाश्चात्य विद्वान् धात्वंश को आवश्यक नहीं मानते, वे आधार रूपांशों (base-elements) को नाम एवं आख्यात् दोनों के लिये अलग अलग स्वीकार करते हैं। वस्तुत: बहुत सी भाषाओं के लिये धात्वंश आवश्यक नहीं।

प्राकृत/पाली भाषा मे लिखे गये मौर्य सम्राट अशोक के बौद्ध उपदेश आज भी सुरक्षित है। जो शब्द संस्‍कृत से आ कर प्राकृत में मिल गए हैं वे “तत्‍सम” शब्‍द कहलाते हैं। और मूल प्राकृत शब्‍द जो सीधे प्राकृत से आए हैं “तद्भव” कहलाते हैं। पहले प्रकार के शब्‍द बिलकुल संस्‍कृत हैं। दूसरे प्रकार के प्रारंभिक प्राकृत से आए हैं, अथवा यों कहिए कि वे उस प्राकृत या प्राकृत की उस शाखा से आए हैं जिससे ख़ुद संस्‍कृत की उत्‍पत्ति हुई है। हिंदी ही पर नहीं, किंतु हिंदुस्‍तान की प्रायः सभी वर्तमान भाषाओं पर, आज सैकड़ों वर्ष से संस्‍कृत का प्रभाव पड़ रहा है। संस्‍कृत के अनंत शब्‍द आधुनिक भाषाओं में मिल गए हैं। परंतु उसका प्रभाव सिर्फ वर्तमान भाषाओं के शब्‍द-समूह पर ही पड़ा है।

500 ई. के आसपास उत्तर भारत में, अपभ्रंश बोलियाँ प्राकृत से विकसित हुईं। उन्होंने 13वीं शताब्दी ईस्वी तक एक प्रकार के लिंगुआ फ्रेंका के रूप में कार्य किया और दिल्ली सल्तनत के फारसी शासकों द्वारा हिंदवी के रूप में संदर्भित किया गया, जिन्होंने 1206 से 1526 तक भारत के बड़े-बड़े क्षेत्रों पर शासन किया। हिंदी भाषा अपभ्रंश के आसपास से बिखर रही थी। 11वीं शताब्दी ईस्वी, उनमें से अधिकांश 12वीं तक पूरी तरह से अलग थे, हालांकि कई स्थानों पर अपभ्रंश भाषाएँ अभी भी समानांतर में बोली जाती थीं।यह दिल्ली सल्तनत के अधीन था कि फारसी भाषा ने पहले स्थानीय अपभ्रंश बोलियों के साथ मिश्रण करना शुरू किया था, जो बाद में हिंदी और उर्दू भाषा बन गई।

उत्तरी भारत में बोली जाने वाली भाषाएँ, इंडो-ईरानी शाखा के इंडो-आर्यन संस्कृत समूह से पनपी हैं, जो बड़े भारत-यूरोपीय परिवार से संबंधित है। संस्कृत, आज की पूरी तरह से मृत भाषा है, लेकिन संस्कृत और पाली, जो प्राचीन काल से जीवित रहने वाली दो भाषाएँ हैं, आज भी महत्वपूर्ण हैं: संस्कृत भारत और हिंदू धर्म की शास्त्रीय भाषा है, जिसमें अधिकांश धर्मग्रंथ (वृंदावन), महाकाव्य ( महाभारत, भगवत गीता) और प्राचीन साहित्य लिखा जाता है। पाली का उपयोग थेरवाद बौद्ध धर्म की प्रचलित और विद्वतापूर्ण भाषा के रूप में किया जाता है, क्योंकि बौद्ध धर्म की उत्पत्ति सबसे पहले बिहार, भारत में हुई थी। उत्तर भारत की अधिकांश आधुनिक भाषाएँ इन दो भाषाओं जैसे हिंदी, उर्दू, पुनाजाबी, गुजराती, बंगाली, मराठी, कश्मीर, सिंधी, कोंकणी, राजस्थानी, असमिया और उड़िया से उपजी हैं।

हिंदी भाषा अन्य भाषाओं का प्रभाव

अपने पूरे इतिहास में, हिंदी ने कई अलग-अलग भाषाओं के उधार लिए शब्दों को अवशोषित किया। खड़ी बोली पर मुख्य बाहरी प्रभाव जो बाद में हिंदुस्तानी बन गया, दिल्ली सल्तनत के प्रशासकों और सैनिकों और बाद में मुग़ल साम्राज्य के माध्यम से फारसी था। हिंदुस्तानी में ज़्यादातर अरबी शब्द फारसी से आते हैं, जिसमें बहुत सारे अरबी से उधार शब्द हैं।
इसके अतिरिक्त, चूँकि 1960 के दशक तक पुर्तगाल के पास भारत में क्षेत्र थे, इसलिए हिंदी में "टेबल" (पुर्तगाली मेसा से) या कमीज़, "शर्ट", जैसे कैमिसा से पुर्तगाली शब्द की उचित मात्रा है। बेशक, अँग्रेज़ी औपनिवेशीकरण और आधुनिक वैश्वीकरण के माध्यम से, हिंदी में "प्रोफ़ेसर" से "बॉटल" या प्रैफ़ेसर जैसे बोटल जैसे अंग्रेज़ी शब्द भी अच्छी संख्या में हैं। 

ज़ाहिर है, अन्य भारतीय भाषाओं ने भी हिंदी को नए शब्दों के साथ प्रदान किया है, जैसे कि हिंदी शब्दों ने अन्य भाषाओं जैसे कि तमिल या मराठी में लिया है।

हिंदी और उर्दू: एक भाषा विभाजन या एक पुनर्मिलन? 

उर्दू को सबसे पहले मुग़ल साम्राज्य में खड़ी बोली के एक संस्करण के रूप में देखा जाता है, जिसमें ज़बान-ए उर्दू-ए मुअला, जिसे "अदालत की भाषा (या शिविर)" कहा जाता है। यह हिंदी के समानांतर अस्तित्व में था और अंततः देश की स्थापना के समय पाकिस्तान की आधिकारिक भाषा बन गई। उर्दू और हिंदी दोनों को हिंदुस्तानी का रजिस्टर माना जाता है - ये एक ही भाषा के दो संस्करण, जैसे कि ब्रिटिश अंग्रेज़ी और अमेरिकी अंग्रेज़ी दोनों अंग्रेज़ी के रजिस्टर हैं। हिंदी और उर्दू दोनों हिंदुस्तानी भाषाएँ हैं।

हिंदी केवल एक भाषा नहीं है, बल्कि भारतीय संस्कृति का एक विशाल दर्पण भी है। इसकी मृदु-ध्वनियाँ भारतीय कविता को परिभाषित करती हैं। वास्तव में हिंदी पूरे देश को संगीतमय सम्मोहन से बाँधती है और एक जीवंत समाजकी परिकल्पना प्रदान करती है । भाषाओं की भव्य योजना में यह अपेक्षाकृत युवा है, । बहुत से लोग हिंदी भाषा सीखने के लिए प्रयास कर रहे हैं क्योंकि भारत अधिक सामाजिक और राजनीतिक रूप से शक्तिशाली हो रहा है, भारत एक वैश्विक महाशक्ति भूमिका में बढ़ रहा है और हिंदी में विश्वगुरु बनने की अपार संभावनाएँ हैं ।

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