एक ग़म का फ़साना है

15-07-2026

एक ग़म का फ़साना है

हेमन्त कुमार शर्मा (अंक: 301, जुलाई द्वितीय, 2026 में प्रकाशित)

 

एक ग़म का फ़साना है, 
एक दिल का ठिकाना है। 
 
महफ़िल में वह कतराता, 
उसका दोस्त विराना है। 
 
इस दौड़ का क्या कहना, 
सरसा ही ठिकाना है। 
 
इस बोली के तिनके, 
विरोध से जल बुझ जाना है। 
 
आ गए अजनबी यहाँ पर, 
घर कहीं और बसाना है। 
 
एक पेट की ख़ातिर बदनाम, 
जी-हुज़ूरी तो बहाना है। 
 
अब सुमन से पुछूँगा, 
क्यों शबनम बहाना है। 
 
इस फ़ैक्ट्री में घाटा है, 
मुलाजिमों को उठाना है। 
 
देर से जागा है, 
हरेक का यही फ़साना है।

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