बूढ़ी गाय

01-02-2026

बूढ़ी गाय

हेमन्त कुमार शर्मा (अंक: 293, फरवरी प्रथम, 2026 में प्रकाशित)

 

गाय भी शहर आ गई है। देखते हो ना सड़क। कैसे भरी रहती है गोवंश से। इधर के पकड़ कहीं और छोड़ आएँगे। उधर के पहले ही यह काम कर चुके हैं। सब मान दें शायद यह मन में हो। 

डंडे से हाँकते देखा था उस बूढ़ी गाय को। कोई स्वामी नहीं था। जब तक दूध के योग्य रही बाँध कर रखा होगा। या फिर अपने संगी साथियों से बिछड़ गई हो। 

सड़क से लगते अधशहरी गाँव में किसी के घर के पशुओं को रखने की जगह पर रात को पहुँच जाती। अकेलेपन से घबरा जाती हो। भूरा रंग मिट्टी से भरा था। कोई घर का छोटा बच्चा उसे देख दूर तक खदेड़ आता। शायद उसे बताया नहीं गया था कि गाय में सभी देवता निवास करते हैं। अनभिज्ञ रखा होगा। या वह मोबाइल पढ़-पढ़ कर अधिक विद्वान हो गया होगा। 

बूढ़ी गाय थोड़े समय के बाद घूम-घाम कर पशुओं के बाड़े की तरफ़ फिर आ जाती। चारे की तरफ़ देखती भी नहीं थी। किसी को भयभीत भी नहीं करती। बस दूर से खड़ी उन भैंसों को निहारती रहती। जब तक की कोई उसे वहाँ भगा न दे। 

पेट उसका ढोल की तरह रहता था। कूड़ा गिराने की जगह गोवंश घूमता रहता था। वह भी वहीं से कुछ खा लेती होगी। कभी-कभी आपस में गोवंश सींघ फँसा लेते थे। पर वह बूढ़ी गाय इन विवादों से परे रहती। 

एक दिन रात को आवारा पशुओं पर क़हर बरपा। कुछ नौजवानों ने ‘साहस’ दिखाते हुए पशुओं को ट्रक में भर दूर कहीं छोड़ने का मन बनाया। छोड़ भी आए। 

वह बूढ़ी गाय बच गई। वह उस पशुशाला के पास बैठी जुगाली कर रही थी। उधर दृष्टि नहीं गई होगी लोगों की। सड़क किनारे पीपल का पेड़ था। रात को कुछ आवारा पशु वहाँ इकट्ठे हो जाते। वहीं से यह छोड़ने की क्रिया को अंजाम दिया गया था। उनका मानना था कि यह पशु उनकी फ़सल को नुक़सान पहुँचाते हैं। पर किसी ने खेतों में घुसते हुए कम ही देखा था। अधिकतर कूड़े वाले स्थान के आसपास मँडराते रहते थे। 

घर में पूजा हो। तब गाय को ढूँढ़ा जाता था। कुछ अन्न का भाग देने के लिए। इतनी समझ थी। पंडित जी द्वारा भी निर्दिष्ट हो सकती है यह क़वायद। 

बूढ़ी गाय बच गई फ़िलहाल। पर संगी साथी छूट गए। अपने से प्रतीत होते थे। उन्हें न पा कर वह विह्वल रहने लगी। जब तब जाकर उस पशुशाला के सिरहाने खड़ी हो जाती। पशुओं को निहारने लगती। फिर वहाँ से कोई खदेड़ देता। 

थकी तो वह थी। पीपल के पेड़ के नीचे बैठी रहती थी। बार बार वहाँ जाना सम्भव भी नहीं था। अकेलेपन से उकता जाती हो तब चल पड़़ती हो। 

एक सुबह किसी बछड़े के बार बार बोल सुनाई दे रहे थे। गाय के कान बार-बार खड़े हो जाते। सूरज के दर्शन हुए। दूर गाय ने देखा छोटे गोवंश को। वह अकेला था। झट उठ कर उसकी तरफ़ बढ़ी। 

बछड़ा उसे देख चुप हो गया। गाय के साथ-साथ रहने लगा। अब गाय उस पशुशाला की तरफ़ नहीं जाती थी। प्रायः लोग उनको साथ-साथ देखते थे। 

0 टिप्पणियाँ

कृपया टिप्पणी दें

लेखक की अन्य कृतियाँ

कहानी
कविता
लघुकथा
नज़्म
सजल
ग़ज़ल
हास्य-व्यंग्य आलेख-कहानी
सांस्कृतिक कथा
चिन्तन
ललित निबन्ध
विडियो
ऑडियो

विशेषांक में