टायर की ख़रीद
हेमन्त कुमार शर्मा
धूप कड़क थी। आसमान में दूर-दूर तक बादल नहीं थे। पैदल का रास्ता। दूसरे राज्य के बार्डर पर ही उतार देते ऑटो वाले।
वहाँ से बाज़ार का रास्ता दूर था। पेड़ भी आसपास नहीं थे। दुकान की पहचान करते हुए बस चलना था।
मोटरसाइकिल के टायर पुराने हो गए थे। कई बार बदलने का मन बना लिया था। पैसे का अभाव सदा रहा था। कोई नई बात नहीं थी।
सर्दियाँ तो काट दी थीं। परन्तु ग्रीष्म के आरंभ में ही पिछले टायर ने ना-ना बोलना आरंभ कर दिया।
वैसे आवश्यकता पर ही मोटरसाइकिल को चलाता था राजू।
प्राइवेट नौकरी थी। बस लगी हुई थी आने-जाने के लिए। बस छुट्टी वाले दिन ही मोटरसाइकिल की आवश्यकता होती।
वह भी कहीं जाना हो तब।
नौकरी नहीं थी, शादी हुई नहीं थी—तब ख़ूब चलाई थी मोटरसाइकिल। अब तो बस . . .
बच्चे भी बस से स्कूल चले जाते।
घर के ख़र्चे बाधा थे टायर बदलने में।
पर आज कहीं किसी रिश्तेदार के जाना था। देखा टायर में हवा नदारद थी। करे तो क्या करे? राजू पशोपेश में पड़ गया।
टायर का पैंचर बनाने के लिए दुकान पर गया। दुकान क्या थी बस घर में ही सामान रखा हुआ था।
‘सलीम ऑटो रिपेयर’ का बोर्ड लगा रखा था। उसने ग्राहक को देखा। और मोटरसाइकिल के टायर को देखा, कहा, “टायर पैंचर हो गया है।”
राजू ने ‘हाँ’ मुंडी हिला दी। मोटरसाइकिल पैदल घसीटने से वह थक गया था।
“ट्यूब ज़्यादा डैमेज न हो गई हो?”
“नहीं नहीं। मैं कौन-सा बैठ कर आया हूँ। और तो और टायर की नलकी का नट भी ढीला कर लिया था।”
अधिक बात न कर दुकानदार ने पैंचर लगाने की क़वायद शुरू कर दी।
अंदर की तरफ़ पैंचर था।
“यहाँ पैंचर टिकेगा नहीं।”
“यार किसी तरह . . .” कहते कहते राजू चुप हो गया था।
पैंचर लगा दिया।
राजू ने पूछा, “दस पन्द्रह दिन चल जाएगा क्या?”
“कह नहीं सकता।”
“पक्का पैंचर लगा देते।”
“अरे, मेरे हाथ लगे हैं। यह पैंचर पक्के पैंचर से भी बढ़िया होता है। साइड से लीक नहीं होता।”
दुकानदार की बात सुन राजू चुप हो गया।
घर पर आकर मोटरसाइकिल खड़ा दी। जाने की तैयारी करने लगे।
थोड़ी देर बाद देखा टायर की हवा फिर खड़े-खड़े निकल गई।
राजू ग़ुस्से से भर गया। पहले सोचा कि पैंचर बनाने वाले का कद्दू काट दे। परन्तु आगे ढाबे के पास एक और पैंचर वाला था—रघु। वह जाना-पहचाना भी था। बस राजू के घर से थोड़ी दूर था। पहले वाला समीप था सो चला गया था राजू उसके पास। पर अब नहीं।
वैसे भी पास वाले किसी काम के नहीं होते।
उसे कह कि वह टायर डाल देगा, राजू टायर लेने निकल गया।
बस यही सब बात थी। बहुत मशक़्क़त के बाद। पैदल सारा बाज़ार घूमा। आने से पहले अपने मित्र को फोन किया था। सोचा था उसकी मोटरसाइकिल से टायर ख़रीदने निकलेगा। उसने फ़ोन नहीं उठाया बाद में फोन खड़खड़ा रहा था। थक कर फोन उठाया और कहा, “वैसे ही किया था।”
जब आवश्यकता थी . . . अब तो बाज़ार किसी तरह पहुँच ही गया।
एक दुकान पर पूछा, “टायर का रेट क्या है?”
“नंबर क्या है?”
“सत्रह नंबर।”
रेट न बनता देख राजू अगली दुकान पर हो लिया।
धूप ने जैसे सारा पानी सोख लिया। पास में गन्ने का रस बेचने वाला था। उससे एक ग्लास बनाने को कहा। बर्फ़ अधिक डालने को भी कहा। टूटी-फूटी कुर्सी थी पूछ कर बैठ गया।
एक बोर्ड भी लिखा था—‘मेहनत मेरी रहमत तेरी’।
कुछ ठंडक सी शरीर में आई।
अगली दुकान एक शोरूम था। ऊँची कंपनी का। उसका रेट सुन दंग रह गया।
‘दुकान के शीशों के पैसों का भी मूल्य निकाल लेगा क्या?’
बड़बड़ाते हुए राजू शोरूम से निकला।
इस प्रकार वह धक्के खाता एक अन्य दुकान पर विराजमान हुआ। वह थक गया था। टायर का रेट ठीक लगा।
लेकर घर पहुँचा।
मोटरसाइकिल उठाई, अब चला कर ही ले गया। अब कौन-सा टायर ट्यूब की चिंता थी। रास्ते में पहले वाला दुकानदार भी गोलगप्पे खा रहा था रेहड़ी रोक कर। राजू को देख कर आश्चर्यचकित हुआ—हाथ में टायर ट्यूब पकड़े देख कर—आगे जाता देख कर।
टायर बदलवाया। ख़र्चे ‘डिसबैलेंस’ हुए पर अब बहुत दिनों का आराम तो हो गया।
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