सब कुछ फ़सली है
हेमन्त कुमार शर्मा
पहली दफ़ा हिचकिचाहट थी। फिर आदत बन गई। संकोच सब नष्ट हो गया। पैवंद कुर्ते पर था। उसे कब तक छुपाते रहते मुल्ला जी। पहले-पहल थोड़ा झिझके। फिर अपनी हालत का उन्हें कोई अफ़सोस नहीं रह गया था।
पादा जी इस दौरान थोड़े मसरूफ़ थे। वरना क्या कारण था कि मुल्ला जी के घर न आते। रुक्किया भाभी द्वारा बनाई चाय का आनंद न उठाते।
नए साल में कुछ समझदार लोग हवन का आयोजन करवा रहे थे। इस हवन के लिए पादा जी को बुलाया गया था। वह अलग-अलग जगह जा कर हवन विधि सम्पन्न करवा रहे थे। इसी कारण मुल्ला जी से मिलना नहीं हो रहा था।
इधर मुल्ला जी शाम चार बजे के लगभग बरामदे में चारपाई बिछा कर बैठ जाते और मुख्य दरवाज़े पर नज़र बनाए रखते। अपने परम मित्र की प्रतीक्षा में। पर चार दिन बीत गए थे। पादा जी का कुछ अता पता नहीं था।
मुल्ला जी के पास दो कुर्ते थे। एक धो कर सूखने डाला था। दूसरा पहन रखा था। उसकी बाज़ू फट गई थी। जिसे अपनी बेगम रुक्किया से कह सिलवा लिया था। पर एक पैवंद की जगह बन गई थी। वह देखने पर बहुत भद्दी लगती।
सो वह आज बाहर जाने वाले नहीं थे।
सर्दी का मौसम अपनी ऊँचाई पर था। बेगम ने ऊपर से स्वैटर डालने के लिए भी कहा जिससे कुर्ता छुप जाता। परन्तु कुर्ते के नीचे स्वैटर डाल रखा था। वह डबल-डबल स्वैटर डालने के पक्ष में नहीं थे।
बेगम ने ग़ुस्से में कहा, “काम पर यही कुर्ता पाजामा डाल कर जाते हो। कौन-सी परेशानी होती है।”
मुल्ला जी ने उत्तर दिया, “ठीक कहती हो। पर दोस्त का घर अलग चीज़ है। भला वहाँ फटे पुराने कपड़ों में थोड़े ही जाऊँगा।”
आज मुल्ला जी का धैर्य जवाब दे रहा था। कईं वर्षों से दोनों मित्र थे। पर इतने दिन कभी नहीं हुए थे बिना मिले हुए।
पादा जी नहीं आते तो वह ख़ुद उनके घर जा आते। शाम की चाय दोनों इकट्ठे ही पीते।
पर जाने किस कारण से वह भी पादा जी से मिलने नहीं गए थे।
साढ़े चार बज गए थे। पादा जी आज भी शायद नहीं आएँगे। यह विचार मुल्ला जी को बेचैन कर रहा था। तभी गेट पर किसी के आने के पदचाप सुनाई दी।
मुल्ला जी के चेहरे पर मुस्कान दौड़ पड़ी। सामने लड़खड़ाते पादा जी का आगमन हो रहा था।
“अरे यार, कैसे मित्र हो। कम से कम अपने घर के पास नाली के पानी को राह तो दिखा देनी थी। कीचड़ में पैर धँस गया।”
“आते ही उलाहना। भला हम कितने दिन से तुम्हारी राह देख रहे हैं। रोज़ बेगम से चाय धरवाते हैं। पर तुम . . . पानी खौलता रहता है। यह नहीं किसी से संदेशा ही भिजवा देते।”
“तुम फोन कर दे . . .”
कहते-कहते पादा जी चुप हो गए। उन्हें पता था कि मुल्ला जी का फोन पुराने ज़माने का बटनों वाला, वह बिगड़ गया था। मैकेनिक ने जितने पैसे माँगे थे उतने में नया फोन आ जाता और उनका आजकल काम का मंदा था। नया फोन मुश्किल था।
पास बाल्टी में धरे पानी से पैरों को धोया। कुर्सी पर बैठ कर अपने गमछे से गीले पैरों को साफ़ किया।
“मुल्ला जी, बस कुछ काम था। नहीं तो आप जानते ही हैं कहाँ टलने वाला मैं। शाम का समय ही तो कुछ शान्ति का है। आप से ज़माने भर की बात कर मन को आराम आ जाता है।”
“पादा जी आज का अख़बार देखा। एक और व्यक्ति हिंसा का शिकार हो गया।”
पादा जी मायूस हुए। चुप थे।
“यह अख़बार ख़ून से लथपथ है। किसी को कुछ सुनाई नहीं देता। कितनी चीख़ें हैं।”
पादा जी मौन थे। रुक्किया भाभी चाय और बिस्कुट ले आई थी। कप को पकड़े चाय की चुस्कियाँ लेने लगे। बिस्कुट को उठाते हुए मुल्ला जी की ओर देखा। फिर चाय पीने में व्यस्त हो गए।
“मुझे तो समझ नहीं आया जिसे शासन सौंपा गया है। वह देश का नागरिक भी नहीं है। वह कैसे देश को रास्ता दिखा पाएगा।”
मुल्ला जी भीतर तक आहत थे।
पादा जी ने चाय का आख़री घूँट पी कर कप मेज़ पर रखा और गहरा श्वास लिया और अपनी जेब से बटन वाला फोन मुल्ला जी की तरफ़ बढ़ा दिया।
कहा, “नए साल में कुछ लोग समझदार हो गए हैं। नाच शोर-शराबे को छोड़ यज्ञ आदि करवाने लगे हैं। सोचा कुछ पैसे आए हैं तेरे लिए फोन ही ले लूँ।”
आँखों की कोरें भीग गई थी अपनत्व देख कर।
अपनी पैबंद वाली कुर्ते की बाँह से आँखें पोंछी और कहा, “यह बहते पानी में हाथ धो रहे हैं। पड़ोसी देश क्या समझता नहीं। वहाँ के लोग वहीं की मिट्टी के तो हैं। वही भाषा। फ़सल खेत मिट्टी में एक ही तो है। एक तरफ़ की फ़सल को आग लगेगी तो क्या दूसरी तरफ़ की बच पाएगी क्या? सब कुछ फ़सली है। यह जो नए नए शासक आए हैं सब फ़सली बटेर हैं। दाना चुग उड़ जाएँगे।”
पादा जी बिल्कुल चुप कुर्सी पर बैठे रहे। शून्य में ताक रहे थे।
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