नगरी-नगरी फिरता है

01-05-2026

नगरी-नगरी फिरता है

हेमन्त कुमार शर्मा (अंक: 296, मई प्रथम, 2026 में प्रकाशित)


नगरी-नगरी फिरता है, 
दिल दिन-सा जलता है। 
 
कह-कह कर हारा था, 
दिल को अभाव ने मारा था। 
अपने होने को जपता है, 
दिल दिन-सा जलता है। 
 
पत्थर पर लकीर-सी थी, 
माथे की जो लकीर-सी थी। 
उम्र गुज़री हाथ मलता है, 
दिल दिन-सा जलता है। 
 
फ़ारिग़ हुआ अपनों से, 
टूटे-फूटे सपनों से। 
फिर पैसे पर मरता है, 
दिल दिन-सा जलता है, 
नगरी-नगरी फिरता है।

0 टिप्पणियाँ

कृपया टिप्पणी दें

लेखक की अन्य कृतियाँ

कविता
सजल
कविता - हाइकु
कहानी
लघुकथा
नज़्म
ग़ज़ल
हास्य-व्यंग्य आलेख-कहानी
सांस्कृतिक कथा
चिन्तन
ललित निबन्ध
विडियो
ऑडियो

विशेषांक में