अगर पुल आसमान का चाँद होता
हेमन्त कुमार शर्मा
घर का एक कोना भी शेष ना रहा। सब मटियामेट हो गया। लगातार सातवें दिन बारिश थी। जगमोहन की आँखों के आगे उसके सपनों का घर बिखर गया। बीवी बच्चे रिश्तेदारों के पास पहुँचा दिए। दीवार में दरार आने पर भयभीत हो गए थे सब। आवश्यकता का थोड़ा-सा सामान ही निकाल पाए घर से। वह वहीं रुक गया। पास ऊँचे सुरक्षित स्थान पर। बड़ी छतरी लिए अपने मकान को एकटक निहारता। बारिश झमाझम बरस रही थी। मिट्टी दरकने पर पूरा मकान धूल धूसरित हो गया था। मन तो नहीं करता था उसका वहाँ से जाने का पर मन मार के वह बस स्टैंड की तरफ़ बढ़ गया।
कोई बस ्चलने को तैयार नहीं खड़ी थी। किसी में भी ड्राइवर ना कंडक्टर। पूछताछ पर पता किया। जवाब मिला, “आगे पुल टूट गया है। ट्रैफ़िक जाम है। कोई नदी पार जा नहीं पा रहा।”
रास्ता आने जाने का पूरा बन्द हो गया। जगमोहन मायूस हो बैन्च पर बैठ गया। बारिश अविरल थी। हवा से सिहरन उठती रोंगटे खड़े हो जाते। चप्पल कीचड़ पानी से सराबोर थी। कपड़े भी काफ़ी भीगे हुए थे। थोड़ी दूरी पर चाय की दुकान दिखाई दी। चाय की चुस्की लेकर पास पड़े बासी अख़बार को पढ़ने लगा। पहले पन्ने पर चन्द्रयान-तीन की सफलता का गुणगान था। अगले पन्ने पर पहाड़ पर तबाही की तस्वीरें। फिर अन्य ख़बरें जहाँ भर की। सरसरी नज़र से देख अख़बार बैन्च पर रख दिया।
“भारत दूर आसमान पर भी पहुँच गया,” अन्य यात्री ने उससे कहा।
वह चुप मौन अपनी चाय पीने में मशग़ूल। उपेक्षा देख उस व्यक्ति ने जगमोहन की ओर पीठ कर ली और अख़बार को पढ़ने में व्यस्त हो गया।
थक हार के टूटे हुए पुल को देखने चल पड़ा। वर्षा धीमी हो गई थी। पर आसमान अभी भी काला था। सामने गाड़ियों की भीड़। हॉर्न ‘चें पों’ करते—लोगों का हुजूम। किसी भाँति आगे बढ़कर देखा, पुल मध्य से टूट गया था। नदी का बहाव बहुत तेज़ था। मिट्टी के रंग का पानी एकटक देखने पर चक्कर ही ला दे। कोई प्रशासन, कोई प्रबन्धक, कोई सरकारी ऑफसर इस स्थान पर मौजूद ना था।
‘किस प्रकार बच्चों के पास पहुँचूँगा’ यह विचार जगमोहन के मन में बार-बार उठता था।
कुछ व्यक्ति आपस में बात करते मिले।
“लगता है महीनों का काम हो गया है ये।”
“हाँ लगता तो है।”
“तीस चालीस साल से पुल ठीक-ठाक था। पता नहीं जब से नए पुल का काम लगा ठेकेदार ने नदी का बहाव सँकरा कर दिया। एक तरफ़ मोड़ दिया। उसी जगह के खंबे हिल गए।”
“मूर्ख है।”
“वह तो है ही। शायद ठेकेदार दूसरे पुल का ठेका भी लेना चाहता हो।”
“हो सकता है।”
जगमोहन के मन में भी विचार कौंध गया। ‘बरसाती नदी में सारे वर्ष पानी थोड़े ही होता। केवल वर्षा का मौसम ही नदी पर मेहरबान। डीलर लोगों ने मिट्टी डालकर नदी के किनारे की ज़मीन प्लाॅट बना लोगों को बेच दी। डंगा भी सरकारी पैसे से लोगों द्वारा अर्ज़ियाँ दे लगवा लिया। लोगों की ख़रीद की हद में यही प्लॉट आ सकते थे। सो उन्होंने ले लिए। पर बरसात आने पर घर में पानी भर जाता। काफ़ी लोग ज़मीन बेचने को आमादा हो गए थे।’
विचारों को विराम दे वह पान बीड़ी-सिगरेट बेचने वाले के खोके से सिगरेट लेकर सुलगा के खड़ा हो गया। लंबे-लंबे कश लेने लगा।
शाम के चार बज गए थे। सूरज ढलान की तरफ़ बढ़ रहा था। कोई प्रशासन यहाँ तक नहीं पहुँच सका और उधर भारत का चन्द्रयान-तीन चाँद पर पहुँच गया।
उसने धुआँ छोड़ते हुए विचार किया—काश, पुल आसमान का चाँद होता।
2 टिप्पणियाँ
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आपका धन्यवाद।-----हेमन्त
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संघर्षों भरी जीवन की गहराई लिए सार्थक कहानी
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