सपने 

हेमन्त कुमार शर्मा (अंक: 295, अप्रैल द्वितीय, 2026 में प्रकाशित)

 

सपनों पर कविता? 
सपनों की कविता? 
सपनों से कविता? 
सपनों में कविता? 
आश्चर्य है यह सीमित नहीं, 
प्रकृति से फैले हैं
मन में, 
चेतना पर कम्बल सा ओढ़े, 
अर्ध निंद्रा के सगे, 
यह स्वप्न। 
 
आधी जली पुस्तक के
कटे फटे पन्नों से, 
यह सपने किसी रेत में
गुलाब के पौधे में खिले फूल से। 
यह सपने आधे पत्थर में दबे पाँव से। 
बारिश की पहली फुहार से पहले, 
चींटियों के झुंडों से, 
सुरक्षा की खोज में। 
पेड़ के उस पत्ते की तरह, 
जिसे हवा ने कंपित किया है, 
यह सपना है

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