दृष्टि लगी है कब से आँगन में

15-05-2026

दृष्टि लगी है कब से आँगन में

हेमन्त कुमार शर्मा (अंक: 297, मई द्वितीय, 2026 में प्रकाशित)

 

भूल आया कुछ तो, 
जीवन वन में। 
आराधना जैसे, 
शेष मन में। 
 
गीत थे धूमिल धूमिल, 
जैसे पिय सपन में। 
 
तारे सब गिन डाले
स्वयं को खोज रहा
अब तन में। 
 
बाहर कुछ शब्द, 
भीतर दुख बैठा
आसन में। 
 
देखो कोई डोरी जुड़ी हो, 
जैसे रंग बिखरें
मन भावन में। 
 
आने का कह कर गए, 
दृष्टि लगी है कब से
आँगन में। 

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