तुम समझते हो

15-02-2026

तुम समझते हो

हेमन्त कुमार शर्मा (अंक: 293, फरवरी प्रथम, 2026 में प्रकाशित)

 

तुम समझते हो
कोरी राजनीति है यह। 
पेड़ से पत्ते गिरने, 
आ जातें हैं पतंगें मरने। 
विषयों से उपराम हो, 
बैठे ध्यान धरने। 
व्यक्ति व्यक्ति में भेद भरे हैं, 
पर राजनीति नहीं है। 
यह प्रकृति है, 
यह हास्य है। 
पर राजनीति है यह। 
रोटी पानी पर
अधिकार सभी का। 
पर पंचतंत्र के पंडित
स्वभूमि में ही शरणार्थी, 
शून्य चुप राजनीति के विद्यार्थी। 
सब कुछ है बस राजनीति नहीं है। 
काले वस्त्र, 
पीले भी त्रस्त। 
सुबह है, 
शाम है। 
नदी का किनारा है। 
डूबता सूरज है, 
उठता चाँद है। 
व्यर्थ की कानाफूसी है, 
घर से निकलना मुहाल है, 
घूरती आँखें, 
एक्स-रे सी। 
नारी स्वतंत्रता का, 
बराबरी का भाषण। 
सब है। 
पर राजनीति नहीं है। 

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