फिर भी

हेमन्त कुमार शर्मा (अंक: 300, जुलाई प्रथम, 2026 में प्रकाशित)

 

बहुत भीड़ है, 
फिर भी तपिश अकेलेपन की। 
 
दूर आकाश में, 
और निर्जन वन में, 
कोई वैमनस्यों को लेकर, 
साधक, 
अपने को साधने चला। 
वहाँ विवादों की भीड़ हैं, 
फिर भी तपिश अकेलेपन की।
  
मूढ़ता का उपवन, 
जटिलता-सा सरल
मस्तिष्क। 
भरे-पूरे विचारों से, 
पर—
रिक्त हैं स्नेह से, 
रिश्तों की भीड़ हैं, 
फिर भी तपिश अकेलेपन की। 

बारिश की बूँदें
पत्ते पर थरथराती। 
पीपल यूँ पुराना हैं, 
बरगद में सिमट कर। 
आहट है वर्षा की, 
ग्रीष्म फिर भी जाता नहीं, 
कठोर हैं, 
देखता हैं आगे, 
स्यात् श्वास धीमे हैंं, 
फिर भी—

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