नारी की पीड़ा

01-01-2026

नारी की पीड़ा

राजीव डोगरा ’विमल’ (अंक: 291, जनवरी प्रथम, 2026 में प्रकाशित)

 

आख़िर मैं ही क्यों
दबी कुचली रहूँ इस समाज में
क्या मेरा कोई अस्तित्व नहीं? 
 
आख़िर मैं ही क्यों
अपनी पीड़ा को अंतरमन में रखूँ
क्या मेरी संवेदनाओं का कोई वुजूद नहीं? 
 
आख़िर मैं ही क्यों
कुंठित व्यक्तित्व झेलूँ लोगों का
क्या मेरी भावनाओं का कोई मूल्य नहीं? 
 
आख़िर मैं ही क्यों
जियूँ और लोगों के लिए
क्या मेरे जीवन की कोई ‘हस्ती’ नहीं? 
 
आख़िर मैं ही क्यों
दिन-रात उत्पीड़न सहन करूँ
क्या मुझे स्वयं ख़ुश रहने का अधिकार नहीं? 

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