देखता हूँ मैं शाम होते हुए

15-04-2026

देखता हूँ मैं शाम होते हुए

हेमन्त कुमार शर्मा (अंक: 295, अप्रैल द्वितीय, 2026 में प्रकाशित)

 

देखता हूँ मैं शाम होते हुए, 
सूरज डूबते चाँद जलते हुए। 
 
आह कोई किसी काम की नहीं, 
देखा दीया अकेला लड़ते हुए। 
 
मुस्कुराते हैं हरेक ज़ख़्म फिर से, 
उन्हें देखा है दूजों से हँसते हुए। 
 
फ़ेहरिस्त बड़ी लंबी इच्छाओं की, 
देखता हूँ सामने सपने मरते हुए। 
 
क्यों प्रलय का इंतज़ार तुम को, 
उम्र गुज़री इंतज़ार करते हुए। 

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