मधु शर्मा - अश’आर - 001

15-06-2026

मधु शर्मा - अश’आर - 001

मधु शर्मा (अंक: 299, जून द्वितीय, 2026 में प्रकाशित)


1
2122    2212    2122
 
क़ाफ़िया है रद्दीफ़ भी, बनती नहीं बह्र,
दरिया जज़्बातों का हो तो कैसे गिनूँ लहर।  
 
2
1222    1222    1222
 
मोहब्बत खेल होती ही है इक ऐसा,
हमेशा हारो तुम, महबूब जीते सदा।
  
3
22    22    22    22    22    2
 
पलकों पे यूँ संजोके न रखो ख़्वाबों को,
बह निकलेंगे वो बेरहम आँसुओं के साथ।

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