सत्य जो किंवदंती बन गया (भाग 2) 

01-05-2026

सत्य जो किंवदंती बन गया (भाग 2) 

मधु शर्मा (अंक: 296, मई प्रथम, 2026 में प्रकाशित)


शिला रूपी अहिल्या

 

पिछले वर्ष के दिसम्बर अंक में प्रकाशित कहानी ‘सत्य जो किंवदंती बन गया’ में एक दादा व पौत्री के बीच हुए प्रश्नोत्तरी में मैंने हनुमान जी द्वारा पूरा पहाड़ उठा लाने वाले प्रसंग का उल्लेख किया था।

अब इस आलेख द्वारा रामायण के एक अन्य प्रसंग से संबंधित तथ्य पर अपना तर्क देना चाहती हूँ। मेरी छोटी-सी समझ में यही आया है कि समय के चलते अनजाने में चित्रकारों द्वारा कुछ घटनाओं को किंवदंतियों का रूप मिलता गया।

मैं स्वयं सनातन-धर्म परिवार में पली-बड़ी हूँ, इसलिए इस आलेख के द्वारा मेरा उद्देश्य इस धर्म को मानने वालों के विचारों को आहत करना बिल्कुल भी नहीं। फिर भी आप पाठक यदि मेरी किसी बात से सहमत न हों तो आपकी सकारात्मक आलोचना का स्वागत है।

इस आलेख द्वारा यह प्रश्न उठाने की हिम्मत कर रही हूँ कि क्या वास्तव में अहिल्या शिला में परिवर्तित हो गई थी, और फिर भगवान राम के चरणों की रज उसके ऊपर पड़ते ही वह फिर से अपने असली स्वरूप में आ गई थी?

इस प्रसंग से आप सभी परिचित ही हैं कि पति ऋषि गौतम द्वारा अहिल्या पर लांछन लगाये जाने पर उन्होंने उसका त्याग कर दिया। उसे उस आश्रम में नितांत अकेली छोड़कर वह अपने सभी शिष्यों को लेकर वहाँ से चले गये।

मेरे विचार में अहिल्या तो क्या किसी भी नारी का इस प्रकार का आघात न सहने के कारण ‘पत्थर’ हो जाना आश्चर्यजनक नहीं। नारी तो क्या, एक बलवान पुरुष भी जब किन्हीं दुखद परिस्थितियों के कारण एक गहरे अवसाद का शिकार हो जाता है तो खाना-पीना, सोना-जागना जैसी आम दिनचर्या भूल-भूलाकर वह हमेशा घर के एक ही कोने में बैठा दिखाई देता है। और चिकित्सक यही सलाह देते हैं कि ‘इसे पत्थर की भाँति बेजान-सा न पड़ा रहने दें . . . इसे हिलाएँ-डुलाएँ, इसके साथ बातचीत करें।’ भगवान राम ने भी तो वही किया और इतने वर्षों से अवसादग्रस्त व अकेली रह रही अहिल्या उनके दर्शन कर व उनके मधुर वचन सुन मानो फिर से जीवित हो गई।

रही चरण-रज की बात तो आम सुनने में आता है कि किसी नई बहू/अतिथि के आने पर यदि कारोबार वग़ैरह में अचानक लाभ हो जाए तो कहा जाता है कि उसके पाँव पड़ते ही उस घर के भाग्य खुल गये। इसी प्रकार आश्रम में प्रभु के पाँव पड़ते ही ‘पत्थर’ की भाँति निर्जीव-सी अहिल्या का भी उद्धार हो गया। वह वास्तव में शिला में परिवर्तित नहीं हुई थी। 

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