सत्य जो किंवदंती बन गया (भाग 2) 

01-05-2026

सत्य जो किंवदंती बन गया (भाग 2) 

मधु शर्मा (अंक: 296, मई प्रथम, 2026 में प्रकाशित)

 
शिला रूपी अहिल्या

 (परिचय: इस भाग 2 की कथा के माध्यम से मैं यह प्रश्न उठाने का दुस्साहस कर रही हूँ कि क्या वास्तव में अहिल्या एक शिला में परिवर्तित हो गई थी, और फिर भगवान राम की चरण-रज उसके ऊपर पड़ते ही वह अपने वास्तविक स्वरूप में कैसे आ गई? 

मेरी छोटी सी बुद्धि में यही समझ आया है कि समय के चलते अनजाने में चित्रकारों ने कुछ प्रसंगों को कम पढ़ी-लिखी जनता तक पहुँचाने के प्रयास में उन्हें किंवदंतियों का रूप दे डाला। इसलिए हो सकता है कि अन्य धर्मों के भगवान या संस्थापकों से भी जुड़ी कुछ-एक सच घटनाओं को लोगों ने चित्रों के द्वारा किंवदंती या फ़ैरीटेल बना डाला हो! 

मैं स्वयं सनातन-धर्म परिवार में पली-बड़ी हूँ, इसलिए इन सांस्कृतिक-कथाओं द्वारा मेरा उद्देश्य इस धर्म के मानने वालों के विचारों को आहत करना बिल्कुल भी नहीं। फिर भी पाठक यदि मेरी किसी बात से सहमत न हों तो आपकी सकारात्मक आलोचना का स्वागत है) 

अहिल्या की कथा से आप सभी पाठक परिचित ही होंगे। फिर भी संक्षेप में:

शिला रूपी अहिल्या

सृष्टि को बनाने वाले ब्रह्मा जी की पुत्री अहिल्या बहुत ही सुन्दर थी। जब वह विवाह योग्य हुई तो ब्रह्मा जी ने घोषणा कर दी कि जो व्यक्ति तीनों लोक की परिक्रमा कर सबसे पहले उनके पास पहुँचेगा, वही अहिल्या का पति बनेगा। 

अहिल्या जैसी रूपवती स्त्री को अपनी पत्नी बनाने के उद्देश्य से देवराज इन्द्र तीनों लोक की यात्रा कर आये। परन्तु जब तक वह ब्रह्मा जी के यहाँ पहुँचे तब तक अहिल्या का विवाह गौतम ऋषि से हो चुका था। क्योंकि गौतम ऋषि ने केवल एक गर्भवती गाय की ही परिक्रमा कर ली, जो वेदों के अनुसार तीनों लोक की परिक्रमा समान मानी जाती थी। 

इन्द्र अपनी यह हार स्वीकार न कर सके। एक दिन गौतम ऋषि की अनुपस्थिति में उनका रूप धारण कर वह उनके आश्रम में पहुँच गये, और छल से अहिल्या का सतीत्व भंग कर दिया। इतने में गौतम ऋषि भी आश्रम लौट आये। अपनी पत्नी व इन्द्र को उस अवस्था में देख उन्होंने क्रोध में आकर तत्काल ही अहिल्या का त्याग कर दिया। उस आश्रम में उसे नितांत अकेली छोड़ वह स्वयं हिमालय की ओर प्रस्थान कर गये। 

अहिल्या तो क्या किसी भी नारी का इस प्रकार का आघात सहन न करने के कारण ‘पत्थर’ हो जाना आश्चर्यजनक नहीं। नारी तो क्या, एक बलवान पुरुष भी जब किन्हीं दुखद परिस्थितियों के कारण एक गहरे अवसाद का शिकार हो जाता है तो खाना-पीना, सोना-जागना जैसी आम दिनचर्या भूल-भूलाकर घर के एक ही कोने में उसका हमेशा यूँही बैठे-लेटे रहना स्वाभाविक है। ऐसे रोगी के लिए चिकित्सक यही सलाह देते हैं कि ‘इसे पत्थर की भाँति बेजान सा न पड़ा रहने दें . . . इसे हिलाएँ-डुलाएँ, इसके साथ बातचीत करें। ‘

और भगवान राम ने भी तो यही किया . . . जब उन्होंने ऋषि विश्वामित्र व लक्ष्मण जी सहित सीता-स्वयंवर के लिए मिथिलापुरी की ओर जाते हुए मार्ग में गौतम ऋषि के उसी उजाड़ आश्रम में अहिल्या को निर्जीव शिला की भाँति बैठे पाया। इतने वर्षों से अवसादग्रस्त व अकेली रह रही अहिल्या प्रभु को आया देख कृतार्थ हो उठी और उनके मधुर वचन सुन मानो फिर से जीवित हो गई। 

रही चरण-रज की बात तो आम सुनने में आता है कि किसी घर में नयी संतान, बहू या अतिथि के आने पर यदि व्यापार, नौकरी इत्यादि में अचानक उन्नति मिल जाए तो कहा जाता है कि उनके पाँव पड़ते ही उस घर के भाग्य खुल गये। इसी प्रकार उस आश्रम में प्रभु के पाँव पड़ते ही अहिल्या भी अपने अवसाद से बाहर निकल आई और उस ‘पत्थर’ समान जीवन व्यतीत करने वाली का उद्धार हो गया। 

कालांतर में चित्रकारों ने अहिल्या को शिला की ‘भाँति’ नहीं, अपितु शिला के रूप में ही चित्रित कर दिया। वह वास्तव में एक असली शिला में परिवर्तित हुई ही नहीं थी। अपितु अपने पति द्वारा लगाए गये लांछन व तत्काल ही त्यागे जाने पर यह आघात न सहने की दशा में पत्थर’ सी हो गई थी। 

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