न जाने

मधु शर्मा (अंक: 284, सितम्बर द्वितीय, 2025 में प्रकाशित)


(कुछ जिज्ञासाएँ मेरे मन की) 
 
खाकर हमारी ही थाली में
किसने किया छेद, न जाने। 
 
कर्म व वचन में अंतर उनके, 
पंडित व पांडे जो वेद न जाने। 
 
बेटी भी बेटों से बढ़कर होती, 
समाज क्यों यह भेद न जाने। 
 
पवन किस ओर उड़ा ले जाये, 
कहाँ बरसूँगा यह मेघ न जाने। 
 
गति मन की प्रकाश से तीव्र, 
नादान 'मधु' वह वेग न जाने। 

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