रह गई

01-02-2026

रह गई

मधु शर्मा (अंक: 293, फरवरी प्रथम, 2026 में प्रकाशित)

 

कहते-कहते मेरी बात रह गई, 
छोड़ गया वो मगर याद रह गई। 
 
जीती तो मैं थी बाज़ी वो ले गया, 
मेरे हिस्से फिर वही मात रह गई। 
 
महफ़िल पूरे ज़ोर-ओ-शोर पे थी, 
तेरे जाते ही ख़ामोश रात रह गई। 
 
माँगें उनकी सुन दुलहन भड़की जो, 
शर्म में डूब कर वो बारात रह गई। 
 
सामान सारा समेट तो लिया गया, 
अश्कों की सिर्फ़ सौग़ात रह गई। 
 
नादानी थी उसकी या फिर बेदारी, 
लुटाके सब वो ख़ाली हाथ रह गई। 
 
पैग़ाम भेजा है मौत ने आज आऊँगी, 
अधूरी उम्र की ये अधूरी रात रह गई। 
 
ढूँढ़ रही इंसानियत को 'मधु' वहाँ, 
शैतान की जहाँ सिर्फ़ ज़ात रह गई। 

0 टिप्पणियाँ

कृपया टिप्पणी दें

लेखक की अन्य कृतियाँ

सजल
लघुकथा
कविता - क्षणिका
कविता
चिन्तन
सांस्कृतिक कथा
कहानी
हास्य-व्यंग्य कविता
किशोर साहित्य कविता
काम की बात
नज़्म
ग़ज़ल
चम्पू-काव्य
किशोर हास्य व्यंग्य कविता
हास्य-व्यंग्य आलेख-कहानी
किशोर साहित्य कहानी
बच्चों के मुख से
आप-बीती
सामाजिक आलेख
स्मृति लेख
कविता-मुक्तक
कविता - हाइकु
पत्र
सम्पादकीय प्रतिक्रिया
एकांकी
विडियो
ऑडियो

विशेषांक में