दर्द पराया

15-03-2026

दर्द पराया

मधु शर्मा (अंक: 294, मार्च द्वितीय, 2026 में प्रकाशित)

 

दर्द पराये को समझे कहाँ ऐसा ग़मख़्वार होता है, 
कोई मतलबी या वो फिर कोई फ़नकार होता है। 
 
समझके अपना उन्हें क्यों दास्ताँ सुना डाली हमने, 
सुना है ज़िक्र उसी का अब सर-ए-बाज़ार होता है। 
 
उस महबूब के प्यार को क्या नाम दीजिएगा आप, 
अकेले में इकरार तो सभी के बीच इंकार होता है। 
 
मुद्दत हुई जब वो मुझे छोड़ कहीं दूर जा बस गया, 
फिर क्यों मेरे हँसने-रोने पे कोई सरोकार होता है। 
 
 सुना है 'मधु'! रब मेरे, आपमें और सभी में बसता है, 
 मन मेरा फिर क्यों उसके दीदार का तलबग़ार होता है। 

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