अभियोग 

01-07-2026

अभियोग 

मधु शर्मा (अंक: 300, जुलाई प्रथम, 2026 में प्रकाशित)

 

समीप के ही एक शहर में मेरे पति के एक सहकर्मी के बेटे की शादी थी। वहाँ से देर रात गये लौटना हुआ। घर में घुसते ही साथ वाले घर से हमारी इंग्लिश पड़ोसिन जैनी व उसकी पन्द्रह वर्षीय बेटी जूलिया की आपस में ज़ोर-ज़ोर से झगड़ा करने की आवाज़ें आ रही थीं। (यू.के. के ठंडे मौसम के अनुसार बनाये गये यहाँ लगभग सभी घरों के भीतर वाली दिवारें पतली होती है, ताकि गैस/बिजली वाले हीटर चालू करते ही भीतर से घर शीघ्र गर्म हो सकें। इन पतली दीवारों के साथ जुड़े हुए घर की आम बातचीत चाहे सुनाई न दे, लेकिन शोर भरा संगीत या टीवी की ऊँची आवाज़ वग़ैरह साफ़ सुनाई दे जाती है)। उन माँ-बेटी के बीच आये दिन की बहस की आवाज़ें सुनने के हम अब तक आदी हो चुके थे। 

ख़ैर, थकान से चूर हम उन आवाज़ों को सुनी-अनसुनी करते हुए फ़्रैश होकर बेडरूम में सोने चले गये। अगली सुबह मैंने हमेशा की तरह जल्दी उठकर पति महोदय को नाश्ता करवाया। उनके ऑफ़िस के लिए निकलते ही घर का बाक़ी काम सुबह-सुबह ही निपटाकर पिछले दिन की थकान मिटाने हेतु उस पूरी दोपहर विश्राम करने का इरादा बना लिया। 

तभी अचानक फोन की घंटी बजी। स्क्रीन पर जैनी का नाम देख मुझे हैरानी हुई कि कभी-कभार घर के बाहर टकराने पर ही हाए-हैलो करने वाली वो मुझे क्यों फोन कर रही है! मेरे हैलो कहने पर उसने घबराई हुई आवाज़ में पूछा कि क्या वो मुझसे मिलने अभी की अभी आ सकती है? यह सोचकर कि न जाने किस परेशानी ने उसे आ घेरा हो, अपने आराम को भुलाकर मैंने उसे ‘हाँ’ कर दी। 

जैनी ने आते ही बैठते हुए कहा, “नलिनी, तुम तो इंडिया से हो . . . तुमने वो ख़बर सुनी ही होगी कि 2019 में मुम्बई के एक सत्ताइस साला लड़के रैफ़ायल सैमुअल ने कैसे अपने पेरंट्स को कोर्ट में ले जाने की धमकी दी थी कि वे उसकी इजाज़त के बिना उसे इस दुनिया में क्यों लाए!”

“हाँ, ख़बर सुनी तो थी लेकिन यह भी सुना था कि उसके पेरंट्स ख़ुद वक़ील थे। कहीं उनका बेटा उनपर मुक़दमा कर यूँ ही अदालत का समय बरबाद न करता फिरे, तो उन्होंने उसे समझा-बुझा कर रोक भी दिया था . . . ,” मैंने कहा।

“वो तो उस मुसीबत से बच गये थे . . . लेकिन अब हमारी बेटी जूली भी हमें वही धमकी दे रही है। मैं तो उसे समझा-समझा कर और अब डाँट-डपट करने के बाद हार चुकी हूँ। सोचा कि तुम्हारे पति वकील हैं . . . शायद वो उसे यह कोर्ट वग़ैरह के मामले समझा-बुझा कर शांत कर सकें।”

मैंने हँसते हुए उसके कंधे पर हाथ रखा और कहा, “जैनी, तुम्हारी जूली को मेरे पति से समझाने की ज़रूरत ही नहीं पड़ेगी। मैं ही उसे समझा दूँगी। हो सके तो कल उसके स्कूल के बाद, घर लौटने पर तुम दोनों सीधे यहीं ‘टी’ के लिए आ जाना। क्योंकि उसने बारह बजे के आसपास ‘स्कूल-डिनर’ किया होगा, तो उसे भूख भी लगी ही होगी।” (यहाँ यू.के. के स्कूल में जो दोपहर का भोजन दिया जाता है, उसे ‘स्कूल-डिनर’ कहा जाता है। चूँकि ऐतिहासिक रूप से ‘डिनर’ का अर्थ दिन का मुख्य भोजन होता है, चाहे वह किसी भी समय खाया जाए। इसीलिए यहाँ दोपहर के भोजन को ‘डिनर’ व शाम के हलके-फुलके भोजन को ‘सपर’ कहते हैं।)

उसी शाम जैनी ने फ़ोन पर मुझे सूचित कर दिया कि जूली मुझसे बात करने के लिए बड़ी मुश्किल से तैयार हुई है। और अगले दिन, जैनी अपने हाथों में फूलों का एक सुंदर-सा गुलदस्ता लिए, बेटी के साथ सुनिश्चित समय पर ठीक चार बजे आ पहुँची। झुँझलाती हुई जूलिया ने जब चाय व विभिन्न सैंडविचेज़ के बीच अपना पसंदीदा चॉकलेट केक देखा, तो झट से खिल उठी। उसे मुस्कुराता देख, जैनी की भी साँस में साँस आई।

स्कूल और मौसम वग़ैरह की अनौपचारिक बातें करते हुए चाय-नाश्ता कर लेने के बाद, जैनी ने बातचीत को असली मुद्दे पर लाने की ग़रज़ से मेरी तरफ़ इशारा करते हुए जूलिया से पूछा, “जूली, तुम कुछ कहना चाहोगी, या तुम नलिनी से ही सुनना चाहोगी कि कोर्ट की कार्यवाही . . .?"

“नहीं, मॉम! सॉरी, नलिनी, आप ही मुझे विस्तार से, या फिर जैसा सही लगे, समझा दें,” जूलिया ने अपनी माँ की बात बीच में ही काटते हुए कहा।

मैंने तो इस वार्तालाप के लिए स्वयं को पहले से ही तैयार कर रखा था। मुझे केवल इस बात का ध्यान रखना था कि जूलिया जैसी खुले विचारों वाली लड़की को एक बच्ची न समझकर, उसी के स्तर पर बात करनी होगी। इसलिए मैंने मुस्कुराते हुए अपनी बात शुरू की, “जूलिया, तुम्हें स्कूल में पिछले चार-पाँच सालों से यह पढ़ाया जा ही रहा होगा कि एक बेबी किस तरह माँ के गर्भ में आता है। इसलिए मुझे फिर से उसे डिटेल में बताने की ज़रूरत नहीं। लेकिन उसी संदर्भ में, मैं केवल यह कहना चाहूँगी कि अगर तुम अपने पैरेंट्स को इसलिए कोर्ट में ले जाना चाहती हो कि तुम्हें इस ‘ज़ोर-ज़बरदस्ती करने वाली दुनिया’ में लाने की इजाज़त तुमने इन्हें कभी नहीं दी थी . . . तो फिर ये दोनों भी तो तुमसे पूछ सकते हैं कि तुम्हारे पिता के उन लाखों स्पर्म (कोशाणु) में से तुम ही क्यों वह एकलौता स्पर्म थी, जो अपनी मॉम के अंडे के भीतर पहुँचीं? उन कोशाणुओं की दौड़ के बीच तुम भी औरों की तरह पीछे रह जातीं, परिणामस्वरूप तब तुम नहीं, कोई दूसरा बेबी इनके गर्भ से पैदा हो जाता, है न? उस दौड़ में तुम्हारी जीत का मतलब यही हुआ कि तुम्हें भी इस दुनिया में आने की जल्दी थी। हाँ, यह बात अलग है कि पैदा होने के बाद . . . और अब उम्र के बढ़ने पर, अपने ऊपर बंदिशें पाकर, अपने दूसरे साथियों की तरह तुम्हारा मन भी कभी-कभी विद्रोह करने के लिए मचल जाता होगा।”

जूलिया, जो अब तक चुपचाप बैठी मेरी बात सुन रही थी, शर्मिंदा होकर बोली, “नलिनी, यह बात तो मैंने कभी सोची ही नहीं। इस छोटी-सी बात के पीछे छिपी इतनी बड़ी बात समझाने के लिए आपका थैंक्स . . . और मॉम, आप भी मुझे माफ़ कर दें, अगर मेरी वजह से आप और डैड का दिल दुखा हो।”

जैनी ने मुस्कुराते हुए अपनी बेटी को गले लगा लिया और उसे कहा कि घर जाकर वह अपनी स्कूल-यूनिफ़ॉर्म बदले, तब तक वह भी आ जाएगी। जूलिया के जाते ही जैनी ने मुझे भी गले लगाकर धन्यवाद दिया। मैंने उसे हमारी अब बड़ी हो चुकी बेटियों का उदाहरण देते हुए कहा, “जैनी, तुम्हें घबराकर बेटी को इस तरह डाँटना-फटकारना नहीं चाहिए। क्योंकि इसमें जूलिया का कोई दोष नहीं . . . सभी बच्चे जब इस टीनएज (किशोरावस्था) से गुज़र रहे होते हैं, तो आए दिन की छोटी-मोटी समस्याओं की आड़ में यूँ ही विद्रोह कर बैठते हैं। उनका यह व्यवहार उनके शरीर में बदल रहे हॉर्मोन्स के कारण हो रहा होता है, जो शीघ्र ही सामान्य भी हो जाता है। तुम्हें बेटी पर सिर्फ़ रोक-टोक न लगाकर, बल्कि उन बंदिशों की वजह, जैसे कि उसी की सुरक्षा या भविष्य में इनका क्या-क्या फ़ायदा होगा, वह भी साथ-साथ बताते रहना होगा।”

जैनी ने मुझे फिर गले लगाया और बोली, “अरे, मैं तो भूल ही गई थी कि मैं भी तो कभी उस टीनएज स्टेज से गुज़री थी! आज से मैं और मेरा हसबैंड अपनी इस एकलौती बेटी के पैरेंट्स होने के साथ-साथ इसके दोस्त भी बनकर रहेंगे।”

उस दिन के बाद उनके घर से आवाज़ें आती तो है, परंतु केवल हँसने-बोलने की। मुझे ख़ुशी है कि एक बेटी अपने लगाए गए आरोप को न्यायालय में अभियोग का रूप देने से पहले ही पीछे हट गई।

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