घर

मधु शर्मा (अंक: 293, फरवरी प्रथम, 2026 में प्रकाशित)

 

मजबूरी थी मेरी कोई बहाना न था, 
घर तोड़ के उनका तो बसाना न था। 
 
घर दूसरों का तोड़ने की ताक में रहें, 
घर ऐसे मेहमानों को बुलाना न था। 
 
घरों में घुसकर लूटते थे जो सरेआम, 
ताल्लुक़ ऐसे घराने से बढ़ाना न था। 
 
 घर मेरा जला के तमाशा देखने वाला, 
अपना ही था वो कोई बेगाना न था। 
 
सिलसिला आँधियों का रहे है सदा, 
घर रेत का ‘मधु‘ यहाँ बनाना न था। 

0 टिप्पणियाँ

कृपया टिप्पणी दें

लेखक की अन्य कृतियाँ

सजल
लघुकथा
कविता - क्षणिका
कविता
चिन्तन
सांस्कृतिक कथा
कहानी
हास्य-व्यंग्य कविता
किशोर साहित्य कविता
काम की बात
नज़्म
ग़ज़ल
चम्पू-काव्य
किशोर हास्य व्यंग्य कविता
हास्य-व्यंग्य आलेख-कहानी
किशोर साहित्य कहानी
बच्चों के मुख से
आप-बीती
सामाजिक आलेख
स्मृति लेख
कविता-मुक्तक
कविता - हाइकु
पत्र
सम्पादकीय प्रतिक्रिया
एकांकी
विडियो
ऑडियो

विशेषांक में