ई की मात्रा

मधु शर्मा (अंक: 297, मई द्वितीय, 2026 में प्रकाशित)

 

(परिचय: इसमें कोई दो राय नहीं कि हिन्दी एक श्रेष्ठ भाषा है। परन्तु हर भाषा की भाँति इसमें भी कुछ अपवाद हैं। एक अपवाद यह है कि कुछ शब्दों के अंत में ई की मात्रा लगाने से वे स्त्रीलिंग नहीं या उनके अर्थ में बहुत अन्तर आ जाता है। मैंने ऐसे पाँच-एक शब्दों के अंत में ई की मात्रा लगाकर उन्हें एक ही संदर्भ के अंतर्गत उनमें परस्पर मिलाप करवाने का यहाँ दुस्साहस कर डाला है) 

1
मेहँदी से दाढ़ी रंगते ही, चेहरे पर रौनक़ छा गई, 
सँवारते वक़्त उसे मगर एक दाढ़ हाथ में आ गई। 
2
पत्ता-पत्ता, बूटा-बूटा, सूख रही है डाली-डाली, 
माल उड़ाकर रातों-रात फुर्र हुआ फ़ुर्तीला माली। 
3
देखकर परमसुंदरी को आँख उनकी एक दब गई, 
गाली सहित चपत गाल पर, डैंचर मुँह से गिर गई। 
4
नाम पड़ा है अँगूठे से और इतराए अँगूठी ख़ुद पर, 
दिखाके बेचारे को अँगूठा, बैठी उँगली पे सजकर। 
5
बड़ी उम्र में दुलहन बनीं, ढोलक न कोई शहनाई, 
बाजा सुनते ही बाजी की तब जान में जान आई। 

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