दो टेलीफ़ोन की परस्पर वार्तालाप

15-03-2026

दो टेलीफ़ोन की परस्पर वार्तालाप

मधु शर्मा (अंक: 294, मार्च द्वितीय, 2026 में प्रकाशित)

 

एक साधारण सा मोबाइल फ़ोन व एक नया क़ीमती मोबाइल फ़ोन अपने-अपने मालिकों की हड़बड़ाहट के कारण अनजाने में उनकी जेब से एक रेलवे-प्लेटफ़ॉर्म पर गिर गये। सौभाग्य से किन्हीं ईमानदार व्यक्तियों द्वारा पाये जाने पर वे दोनों वहाँ के 'लॉस्ट प्रॉपर्टी' के दफ़्तर में जमा करा दिये गये। 

एक दूसरे के समीप रखे जाने पर साधारण फ़ोन ने उस क़ीमती फ़ोन से कहा, “भाग्यशाली लगते हो, भाई!”

“नहीं यार! मैं तो अपने मालिक की रूटीन (दिनचर्या) देख-देख डिप्रैशन (अवसाद) में चला गया हूँ . . . और मैं कुछ कर भी नहीं सकता।

“क्यों, क्या हुआ?”

“वह किसी से कभी कोई बातचीत नहीं करता। ऑनलाइन ख़रीदने-बेचने का यद्यपि बहुत कमाई वाला उसका बिज़नेस है . . . लेकिन शॉपिंग, छुट्टियाँ फिर फ़्लाइट/होटल बुक करने से लेकर राशन-पानी तक की ख़रीदारी, सभी काम भी ऑनलाइन ही करता है। रात के समय कभी-कभार अगर अकेलापन महसूस करता भी है तो एआई से बात कर अपना मन कुछ हल्का कर लेता है। हँसना तो वह जैसे भूल ही चुका है। अगर किसी इक्के-दुक्के से बात करता है, तो वो भी बनावटी हँसी के साथ . . . जो सिर्फ़ मैं ही देख पाता हूँ।”

उस क़ीमती फ़ोन ने साधारण फ़ोन से पूछा, “तुम्हारी आवाज़ से तुम तो बहुत ख़ुश लग रहे हो, यह भई कैसे?”

“हाँ, मेरा मालिक सभी से ढेरों बातचीत करता है . . . मैसज लिखकर उस वक़्त ही भेजता है जब और कोई चारा न हो। इतना हँसता-हँसाता है कि दो-एक बार तो मैं उसके हाथों से गिरते-गिरते बचा।”

“तुम्हारा मालिक करता क्या है?”

“एक छोटी सी कम्पनी के लिए काम करता है . . . लॉकडाउन के बाद उसे व उसके सहकर्मियों को ‘वर्किंग फ़्रॉम होम’ का ऑप्शन (विकल्प) दिया गया। लेकिन मेरे मालिक ने ऑफ़िस में आकर काम करने को ही चुना। फ़ोन करके सभी को बताता रहता है कि इस तरह अलग-अलग लोगों से मिलना-मिलाना बना रहता है . . . साथ ही साथ उनके सुखद या कभी दुखद अनुभव सुनकर उसे आये दिन बहुत कुछ सीखने को मिलता है।”

इतने में साधारण फ़ोन वाले का मालिक वहाँ आ पहुँचा और अपना फ़ोन पाकर ख़ुशी से उसे चूमने लगा। क़ीमती फ़ोन यह सब देखकर प्रार्थना करने लगा, “हे प्रभो! मुझे मालूम है कि यदि मेरे मालिक ने मुझे ढूँढ़ने की कोशिश न की . . . जो मेरे लिए हैरानी की बात नहीं है . . . तो यह ‘लॉस्ट-प्रॉपटी’ वाले एक नियमित समय के बाद यहाँ लाई गईं सस्ती वस्तुओं की भाँति मुझे कचरे में नहीं फेंकेंगे। बल्कि किसी ऑक्शन (बोली) में अन्य क़ीमती वस्तुओं के साथ मुझे भी बेच देंगे। लेकिन कृपया मुझे मेरे मालिक से वापस न मिलवाइयेगा। क्योंकि उसका अलगाव मेरा अवसाद बढ़ाता चला जाएगा। निश्चित रूप से तब मैं किसी काम का न रहूँगा तो मुझे कूड़ा समझ फेंक कर उसके लिए नया फ़ोन ख़रीदना आम सी बात होगी।” 

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