दरिया–ए–दिल

 

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क्या ये ज़िंदगी कोई ख़्वाब है
या किसी किताब का बाब है
 
कभी धूप दे कभी छाँव दे
कभी देती काँटे गुलाब है
 
जो रज़ा में राज़ी रहे सदा
वो अक़ीदतों का नवाब है
 
मेरी बेहिसाब ख़ताएँ हों
तेरी रहमतें बेहिसाब हैं
 
मेरी बेयक़ीनी को पुरसुकूँ
वो यकीं से देता जवाब है
 
जो ख़ुमार था तेरी याद का
तेरी रहमतों की शराब है 
 
जो दुआ के दर पे झुकाए सर
वही सुन सके वो रबाब है
 
जो भी है ये है लाजवाब सी
दो जहाँ की ‘देवी’ किताब है

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