सत्य जो किंवदंती बन गया (भाग 3)
मधु शर्मा
शूर्पणखा की नाक कट जाना
आज पूरा दिन हमारे चार वर्षीय जुड़वाँ बच्चों में जोश देखते ही बनता था। शाम होते-होते उनके उतावलेपन की हद पार हो चुकी थी। होती भी क्यों न! हमें इस नये घर में आये कुछ ही महीने हुए हैं और आजकल नवरात्रि के दिनों इसके नज़दीक वाले एक मैदान में रामलीला दिखाई जा रही है। इससे पहले वाले घर में रामलीला का मैदान मीलों दूर होने के कारण, और फिर बच्चों की उम्र छोटी होने के वजह से हम उन्हें कभी वहाँ ले जा न सके।
आज के दिन हमें रामलीला दिखाने के लिए चार दिन पहले मैंने पतिदेव को बड़ी मुश्किल से मनाया था . . . कल रविवार की छुट्टी जो है। उन्होंने उसी रोज़ मंच के सामने की ही चार सीटें रिज़र्व करवा लीं थीं।
घर से निकलते समय ऐन वक़्त पर इनके एक दोस्त किसी ज़रूरी काम से आ धमके। चाय-नाश्ता करवाने के बाद उन्हें जैसे-तैसे विदा किया। इसलिए हमें वहाँ पहुँचने में थोड़ी देर हो गई। कार से बाहर क़दम रखते ही खुले मैदान में चल रही सर्द हवा ने जब हमारा स्वागत किया तो समीप ही खड़े मूँगफली के ठेले वाले से गर्मा-गर्म मूँगफली ख़रीदे बिना रहा न गया।
रामलीला शुरू हो चुकी थी। हम अपनी-अपनी सीट पर अभी बैठे ही थे कि स्टेज पर रावण की बहन शूर्पणखा की ऐन्टरी हो गई। जैसा कि हम सभी जानते ही हैं कि प्रभु राम, जो महलों को छोड़ अपनी पत्नी सीता व छोटे भाई लक्ष्मण सहित जंगलों में चौदह वर्षीय वनवास की अवधि काट रहे थे, उन्हें देखते ही शूर्पणखा उन पर मोहित हो गई थी। उस दृश्य में वह उनसे ज़िद्द कर रही थी कि वह उसे अपनी पत्नी बना लें। राम उसे समझा रहे थे कि वह विवाहित हैं और पत्नी सीता उनके साथ है। इसलिए वह लक्ष्मण से जाकर पूछे, शायद वह मान जाए!
लक्ष्मण जी के भी इंकार किए जाने पर, और दोनों भाइयों द्वारा बार-बार ठुकराये जाने पर, शूर्पणखा क्रोधित हो अपने असली राक्षसी स्वरूप में आ गई, और सीता जी को मारने के लिए उनपर झपटी। राम के इशारे पर लक्ष्मण ने उसकी नाक काट दी। उसका चेहरा टपकते हुए लाल रंग से और भी भयानक हो गया।
यह देखते ही हमारे दोनों बच्चे डर गये और रोने-चिल्लाने लग गये। हमारे पीछे बैठे कुछ दूसरे छोटे बच्चे भी रोने लगे। मेरे पतिदेव ने आव देखा न ताव . . . छलाँग लगा वह सीधा स्टेज पर चढ़ गये। उद्घोषक और सूत्रधार से कुछ कहा और माइक हाथ में लेकर बहुत ही शांत स्वर में पहले तो सभी से चुप होने की विनती की। और फिर उन्होंने जो कुछ कहा, उसने तो मेरी भी आँखें खोल दीं—
“मैं रामलीला कमेटी, सभी पात्रों व आप सभी दर्शकों से क्षमा चाहता हूँ कि मैं इस तरह अचानक स्टेज पर आ धमका। मुझे सिर्फ़ और सिर्फ़ दो मिनट दीजिए ताकि इन सभी डरे हुए बच्चों के परिवार वालों को कह सकूँ कि बच्चों को समझाएँ कि असल में ऐसा कुछ भी नहीं हुआ था। आपने ‘नाक कट जाना’ मुहावरा तो सुना ही होगा, जिसका मतलब है बेइज़्ज़त होना। तो जब लक्ष्मण जी से शूर्पणखा का दुर्व्यवहार सहन न हुआ तो उन्होंने भी उसे शब्दों द्वारा ऐसा अपमानित किया कि वह खिसिया कर वहाँ से चली गई।
लेकिन अपने इस अपमान का बदला लेने की ठान वह सीधा लंका में अपने भाई रावण के महल पहुँच गई। और जो उसके साथ बीती थी, उसमें ख़ूब नमक-मिर्च लगाकर बोली कि ‘उन दो भाइयों ने मेरी तो नाक काट दी। अब तुम भी उनकी स्त्री को, जो बहुत ही सुन्दर है, उसे अपनी रानी बनाकर अपनी इस बहन की बेइज़्ज़ती का बदला लो।’
कालांतर में चित्रकारों ने हू-ब-हू वैसा ही चित्र बनाना शुरू कर दिया कि जैसे शूर्पणखा वाक़ई कटी नाक के कारण लहूलुहान हो गई हो। वैसे और भी ढेरों ऐसे प्रसंग हैं जहाँ असल में घटना कुछ और ही घटी थी लेकिन चित्रकारों ने बात को आम जन-जन तक पहुँचाने के चक्कर में सच को किंवदंती का रूप दे डाला।
इसलिए हो सकता है कि दूसरे धर्मों के भगवान या संस्थापकों से भी जुड़ी कुछ-एक वास्तविक घटनाओं को लोगों ने चित्रों द्वारा किंवदंती यानी कि फ़ैरीटेल बना डाला हे!
ऐसे बाक़ी के प्रसंग फिर कभी सही। जय सियाराम।”
यह कहते हुए पति स्टेज से उतरकर अपनी सीट पर विराजमान हो गये। दर्शकों ने खड़े होकर ज़ोरदार तालियों से उनका स्वागत किया। उनकी पत्नी होने का गर्व महसूस करती हुई मैंने अपने बच्चों सहित रामलीला का भरपूर आनंद उठाया।
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