जब

मधु शर्मा (अंक: 298, जून प्रथम, 2026 में प्रकाशित)

 

काँटों से दोस्ती, फूलों को दिया भुला, 
उजड़ा चमन उस माली को जब मिला। 
 
पापियों की गिनती अब और बढ़ चली, 
पाप उनका पावन गंगा में जबसे धुला। 
 
रंग होली के इस दफ़ा भी फीके पड़ गए, 
पानी की पाबंदी ने जब हमें दिया रुला। 
 
एक नया रंग ज़िन्दगी में निखर आया, 
ख़ुशियों के बीच ग़म आके जब घुला। 
 
अपनों से ज़्यादा बेगाने रोए मेरे मरने पे, 
मेरे बेघर होने का राज़ उन पे जब खुला। 

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