उन्हें पाने के बाद 

01-05-2026

उन्हें पाने के बाद 

मधु शर्मा (अंक: 296, मई प्रथम, 2026 में प्रकाशित)

 

साथी मिला मगर न मिल गया सा लगता है, 
कुछ बेगाना कुछ उधार लिया सा लगता है। 
 
न अंदर जाये न यह झूठ बाहर निकल पाये, 
एक कड़वी दवा मानिंद पीया सा लगता है। 
 
जब भी मिलता है मुस्कुराता ही मिले है वो, 
आँखों में दर्द मगर छिपा हुआ सा लगता है। 
 
ख़ुशियाँ बाँटता फिरे है ज़ात-पाँत देखे बिन, 
आसमान से उतरा हुआ मसीहा सा लगता है। 
 
ख़ामोश है इतना ज़ुल्म सह कर भी वो कैसे, 
तोहफ़ा यह क़ुदरत का दिया सा लगता है। 
 
कल किसी ने आज किसी और ने लूट लिया, 
ठगों के शहर में मुसाफ़िर नया सा लगता है। 
 
चला गया क्या आँख में, जो आँसू टपक पड़े, 
चाहतों की चिता से उठता धुआँ सा लगता है। 
 
ज़ख़्म पुराना अचानक उधड़ता ही चला गया, 
आनन-फ़ानन में शायद सिया सा लगता है। 
 
दुश्मनी तो कभी किसी से न थी तुम्हारी 'मधु', 
काम यह किसी अपने का किया सा लगता है। 

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