सुख-दुःख 

01-05-2026

सुख-दुःख 

मधु शर्मा (अंक: 296, मई प्रथम, 2026 में प्रकाशित)

 

दु:ख जो तेरे थे, वो मेरे थे,
सुख तेरे मगर, सिर्फ़ तेरे थे।
 
रौशनी मिली तो बाँटती रही,
रखे अपने लिए सब अँधेरे थे।
 
मेहनत आख़िर रंग ले ही आई,
क़िस्मत ने तो डाल दिए घेरे थे।
 
काली तूफ़ानी रातों के बाद ही,
देखने को मिले उजले सवेरे थे।
 
अगर टिक जाता तो निभ जाती,
शहर-शहर मगर उसके डेरे थे।
 
चेहरे असली सामने आये 'मधु',
वक़्त पे अपनों ने जब मुँह फेरे थे।

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