कंधा

मधु शर्मा (अंक: 295, अप्रैल द्वितीय, 2026 में प्रकाशित)

 

चाहे सुबह के दस बजे हों या रात के, अपना हर छोटा-मोटा दुखड़ा सुनाने के लिए वह मुझे मिलने आ पहुँचती या फ़ोन कर दिया करती। 

और फिर एक दिन . . . एक दिन मैंने भी उसे अपनी एक परेशानी बताने की हिम्मत जुटाई ही थी कि मेरी बात को बीच में ही काटती हुई वह बोली, “आए डोंट नो, बट आरन्ट यू बीईंग अ ड्रामा-क्वीन?” (मालूम नहीं, लेकिन क्या तुम नौटंकीबाज़ नहीं बन रही हो?”)। 

उसे कंधा उचकाते देख मेरे कंधे ने उसके सिर को फिर न कभी अपने ऊपर रोने के लिए टिकाने की ग़रज़ से साफ़ इन्कार कर दिया है। 

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