सत्य जो किंवदंती बन गया

15-12-2025

सत्य जो किंवदंती बन गया

मधु शर्मा (अंक: 290, दिसंबर द्वितीय, 2025 में प्रकाशित)

 

सात वर्षीय टिंकी को उसकी दादी रात के भोजन के पश्चात प्रतिदिन उसे कहानी सुनाती हैं। रामायण में जो-जो रुचिकर प्रसंग हैं, आजकल एक-एक करके उन्होंने टिंकी को सुनाने शुरू किए हुए हैं। 

आज लक्ष्मण-मूर्छा वाली कहानी की बारी थी। तो दादी ने कहना शुरू किया—

“रावण जब सीता जी को चोरी से उठाकर लंका ले गया तो भगवान राम के भेजे दूतों ने उसे समझाने की बहुत कोशिश की कि वह सीता जी को लौटा दे। लेकिन जब वह नहीं माना तो भगवान ने अपनी सेना के साथ लंका पहुँच कर रावण पर हमला बोल दिया। एक दिन युद्ध के दौरान रावण के बेटे मेघनाद के शक्ति-अस्त्र से लक्ष्मण जी बेहोश हो गये। भगवान राम को मालूम हुआ कि रावण का राजवैद्य सुषेण ही अब उनके भाई लक्ष्मण की मूर्छा दूर कर सकता है। जब उन्होंने उस वैद्य को संदेश भिजवाया तो वह झट से वहाँ पहुँच गया . . .”

“लेकिन दादी, वह तो भगवान राम के दुश्मन रावण का डॉक्टर था न, तो वो वहाँ क्यों आ गया?” टिंकी ने हैरान होकर पूछा। 

“क्योंकि लड़ाई में घायलों का इलाज करते हुए यह नहीं देखा जाता कि कौन दुश्मन है, और कौन अपनी ही सेना का।” दादी ने उसे समझाया और कहानी को आगे बढ़ाते हुए बोलीं, “लक्ष्मण जी की हालत सीरियस थी। वैद्य जी ने बताया कि उनका इलाज सिर्फ़ एक ही जड़ी-बूटी से हो सकता है, और वह है संजीवनी-बूटी। लेकिन वह बहुत दूर हिमालय-पर्वत पर ही पाई जाती है . . . और अगर कल सुबह तक वह यहाँ न लाई गई तो लक्ष्मण जी जीवित नहीं रह पायेंगे। तो संजीवनी-बूटी को लाने का काम पवनपुत्र हनुमान जी को सौंपा गया क्योंकि सिर्फ़ वही हवा की तरह इतनी तेज़ी से कहीं भी आ-जा सकते थे।”

टिंकी आश्चर्यचकित हो अपनी आँखें दादी पर गढ़ाए हुए कहानी बहुत ध्यान से सुन रही थी। और दादी बता रही थीं कि हनुमान जी हिमालय-पर्वत पर पहुँच तो गये परन्तु उन्होंने पाया कि वहाँ लगभग सभी जड़ी-बूटियाँ देखने में एक जैसी ही थीं। उन्हें जब कुछ समझ नहीं आया तो वह पूरा पहाड़ ही उठा लाये।”

 टिंकी फिर से प्रश्न पूछ बैठी, “लेकिन दादी, क्या यह पॉसिबल है? माना कि हनुमान जी बहुत बलवान थे, फिर भी वो पूरा पहाड़ कैसे उठा लाये?” 

“तुम भगवान पर शक करती हो? मैं तुम्हें अब कहानी नहीं सुनाऊँगी . . .” दादी नाराज़ हो गईं। 

समीप ही कम्प्यूटर पर नज़रें टिकाए टिंकी के दादा जी ने जब यह सुना तो अपनी पत्नी से कहा, “भाग्यवान, बेचारी टिंकी शक नहीं जिज्ञासा कर रही है। बच्चे अगर कोई सवाल पूछें तो हम बड़ों को प्यार से उनकी जिज्ञासा दूर कर देनी चाहिए।” 

फिर दादा जी ने टिंकी को संबोधित करते हुए कहा, “टिंकी बेटी, हुआ यूँ कि हनुमान जी को ढेरों जड़ी-बूटियाँ लाया देख वैद्य जी बोल उठे, ‘अरे हनुमान जी, आप तो पूरा पहाड़ ही उठा लाये!’ बस फिर क्या था, चित्रकारों यानी कि पेंटर लोगों ने वैसे ही चित्र बना दिये कि जैसे वाक़ई हनुमान जी ने पहाड़ उठाया हुआ हो। बिल्कुल वैसे जब तुम्हारी मम्मी को शॉपिंग के ढेरों बैग से लदे देख तुम्हारे पापा कह उठते हैं कि ‘अरे तुम तो पूरी दुकान ही उठा लाईं!’ या जैसे कि मैं जब सब्ज़ी-मंडी में जो-जो ताज़ा फल-सब्ज़ियाँ देखता हूँ तो सभी ले आता हूँ . . . और यह तुम्हारी दादी मुझे टोकती हैं कि मैं तो पूरी मंडी ही उठा लाया . . . है न!”

 दादी यह सुन उत्सुक हो बोलीं, “अरे, मुझे तो यह सचाई मालूम ही न थी . . . और न ही मैंने इस बात पर कभी ध्यान दिया कि हमारी पौराणिक कथाओं को यूँ ही बड़ा-चढ़ाकर पेश किया जाता रहा है। और फिर मुझ जैसे उसकी जड़ तक पहुँचे बिन उसे ही सच मान बैठते हैं। थैंक्यू टिंकी डीयर, तुम्हारी वजह से आज मेरी भी नॉलेज बढ़ गई। आजकल इंटरनेट पर भी तो झूठ को सच की तरह परोसकर कितने ही लोग आम जनता को बेवुक़ूफ़ बना रहे हैं। हो सकता है हर धर्म के भगवान या संस्थापकों से जुड़ी न जाने कितनी और सच घटनाओं को भी लोगों ने उस समय तोड़-मोड़ कर किंवदंती या फिर फ़ेरीटेल बना डाला हो!”

टिंकी यह सुनकर खिलखिलाकर हँस पड़ी और दादी के गले में अपनी बाँहें डाल बोली, “तो दादी, आपकी नॉलेज बढ़ने की ख़ुशी में अब आप कहानी पूरी कर दें। मुझे नींद भी आ रही है।”

दादी उसका सिर सहलाते हुए कहानी का अंतिम भाग सुनाने लगीं कि संजीवनी बूटी के इलाज से लक्ष्मण जी पूरी तरह से स्वस्थ भी हो गये, और अगली लड़ाई में मेघनाद उनके हाथों मारा भी गया। टिंकी भी कहानी सुनते-सुनते अपने चेहरे पर हल्की सी मुस्कुराहट लिए न जाने कब गहरी नींद में सो गई। 

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