आपका बीता हुआ कल
मधु शर्मा
आज होली थी। शाम होने जा रही थी। मुझे किसी का इन्तज़ार भी न था। विदेशों में वैसे भी कई दफ़ा त्योहार यूँ ही बिन मनाये गुज़र जाया करते हैं। और फिर हस्पताल के बिस्तर पर पड़े-पड़े कैसी होली, किसकी होली।
अचानक ढलते हुए सूरज की लालिमा इस हस्पताल की खिड़कियों में से प्रवेश कर मेरे चेहरे पर पड़ने लगी . . . मानो मेरे पीले पड़ गये चेहरे पर गुलाल मल रही हो। मेरे होंठों पर यह सोचकर हल्की सी मुस्कुराहट फैल गई कि चलो, दिन में न सही, दिन ढलने के बाद खेली गई यह होली मैं कभी नहीं भूलूँगी।
परन्तु मेरा यह मीठा सा अहसास ज़्यादा देर तक टिका न रह पाया। उसी समय मेरे बिस्तर के बायीं ओर वाले ख़ाली बिस्तर पर एक वृद्धा को लाया गया। वह आधी बेहोशी में न जाने क्या बार-बार बुड़बुड़ा रही थी। यूँ लग रहा था जैसे ‘हे राम, हे राम’, और फिर रुक-रुककर कुछ और भी कह रही हो। मुझे पहले तो हैरानी हुई क्योंकि वह एक इंग्लिश महिला थी . . . फिर मुझे लगा कि हो सकता है वह भी मंदिर में आने वाले कुछ-एक इंग्लिश लोगों की तरह भगवान राम को मानती हो और उन्हें पुकार रही हो।
रात होते-होते जब चारों ओर ख़ामोशी की चादर तन गई तो मुझे साफ़ सुनाई देने लगा कि वह अपनी बेहोशी में एक ही वाक्य के इन शब्दों को बार-बार दोहराती चली जा रही थी, “हे रॉन . . . माय हसबैंड जॉन इज़ हिअर . . . हे रॉन, गैट आउट . . . क्विक . . . हे रॉन यूज़ द बैक डोर . . .” (हे रॉन, वो मेरा पति जॉन आ गया है . . . जल्दी से निकलो . . . पिछले दरवाज़े से निकल जाओ)
कितना भी छुपा कर रख लीजिए, परन्तु जाने-अनजाने में किसी रोज़ अगर आपका बीता हुआ कल सभी परदों को चीरता हुआ दुनिया के सामने आकर खड़ा हो जाये . . . तो?
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