जीवन की शरद-ऋतुएँ 

15-04-2026

जीवन की शरद-ऋतुएँ 

सरोजिनी पाण्डेय (अंक: 295, अप्रैल द्वितीय, 2026 में प्रकाशित)

 
सुबह-सुबह की खुनकी लिए हवा 
जब मेरे तन से टकराई, 
हियरा हुलस उठा भीतर से एक आवाज़ आई, 
चली गई इस साल की उमस भरी वर्षा ऋतु, 
शरद सुहानी लो आई, फिर आई। 
 
इस ऋतु की मोहक मनभावनी हवा, 
मेरी रसोई में चुपके से आती है, 
गैस की जलती लपट को हिला-कँपाकर 
मौसम बदलने का संदेशा दे जाती है, 
सुबह के सूरज की सुनहरी नन्ही सी किरन
मन को पुलक का एक चमकीला चुम्मा-सा दे जाती है, 
भर कर इक छोटी, प्यारी सी चुटकी, 
मन को बहला-फुसलाकर कर वृन्दावन बनाती है। 
  
चाय बनाते, दूध गर्माते मेरा मन 
इधर-उधर उछल कूद करता है, 
बचपन से अब तक के गुज़रे शरद के दृश्यों को 
यह पागल मन, मानो महसूसने ही लगता है। 
  
माँ के मुख से क्वार के आने की बातें सुन, 
एक बालिका का मन बल्लियों उछलता था
रामलीला जाने पहाड़ी खीरे खाने के
सपने चुपके-चुपके मनमें सँजोने लगता था 
—लखन राम सीता को निहारना कितना मनमोहक होता था!

सोचती थी— 
कुछ ही दिनों में अब सर्दी आ जाएगी! 
कोट की जेबों को मूँगफली से भर जाएगी, 
सुननी पड़ेगी फिर पापा से डाँट—
“मूँगफली के लालच में चूहे, कोट की जेबें देंगे काट!” 
लेकिन परवाह थी किसको उस डाँट की
माँ जो रहती थी सदा बीच में ढाल सी। 
 
कुछ समय बीतने पर, कुछ और बड़ी होने पर, 
त्रेता के राम और मूँगफली से मन कुछ हटने लगा, 
मुझ किशोरी को अब द्वापर का रसिया कृष्ण 
बहुत अपना-सा लगने लगा।
  
शरद की मदमस्त हवा जब मुझको छूकर जाती
मेरे मन में नई-नई जिज्ञासाएंँ जगाती, 
सच! क्या कृष्ण ने धर कर अनेक रूप 
बृज की बालाओं संग रास किया होगा? 
 
इस विस्तृत धरती पर क्या कहीं 
मेरा भी कोई मनमोहन! होगा? 
नाचूँगी राधा-सी जिसके प्रेम से निखर 
क्या वह मेरे लिए राम-सा एकनिष्ठ भी होगा!. 
 
त्रेता-द्वापर के युग चुटकियों में निकल गए 
शरद के हल्के बादलों से
उजले और हल्के स्वप्न, 
जीवन के आकाश से न जाने कहाँ तिरोहित हो गए।
 
नवयुवती होते-होते कलयुग जीवन में आ गया, 
माता पिता का स्नेह मुझे गृहस्थी में उलझा गया, 
शरद तो अब भी अपने नियत समय पर आती, 
मेरे हाथों में ऊन औ’ सलाइयाँ पकड़ाती! 
 
स्वेटरों के नए नमूने बनाते-सिखाते 
बच्चों और सयानों को ठंड से बचाते, 
सलाइयों पर फँदे उतारते-चढ़ाते
मौसम का बदलाव कुछ पल याद रहता, 
ज़रूरी या उल्टे-सीधे कामों में मन सदा फँसा रहता।
 
शरद तो आता रहा साल दर साल 
लेकिन मुझे बाँधे रहा गृहस्थी का मायाजाल
भूल गई कृष्ण का सम्मोहन और महारास
राम का वन-गमन और सोलह वर्ष का वनवास।
 
समय की सलाई पर दिन, 
सप्ताह, वर्ष के फँदे चढ़ते और उतरते रहे, 
छोटे बच्चे युवा और युवा वयस्क होते रहे।
 
सब कुछ तो प्रतिपल बदलता ही जाता था।
ऋतु के बदलाव पर किसका ध्यान जाता था? 
 
सहसा पति ने चाय के लिए पुकार लगाई, 
तब मैं अचकचा कर यादों के उपवन से बाहर आई, 
चाय की चुस्की के साथ मैं बोली, ज़रा ज़ोर से, 
हटाने को पिया जी का ध्यान अख़बार की ओर से। 
 
“आज मौसम का रुख़ कुछ बदला-सा लगता है!
सर्दी जल्दी आएगी ऐसा कुछ लगता है, 
कंबल और रजाई को धूप भी लगाना है, 
‘ब्लोअर’ और ‘गीजर’ भी दुरुस्त कराना है।
पिछले बरस जैसी तेज़ ठंडक जो आएगी 
दीदी के घुटनों की तकलीफ़ बढ़ जाएगी।”
 
इतना बोल कर मैं मौन हो गई, 
एक बार फिर कहीं ख़्यालों में खो गई, 
कैसी गुज़री उम्र और कैसी और गुज़रेगी, 
मेरी ये आँखें कैसे कैसे शरद देखेंगी? 
मौसम आता-जाता सदा वैसा रहता है, 
जीवन उन्हें देखने का नज़रिया बदल देता है!

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