वाल्मीकि कृत ‘रामायण’ में अयोध्या वर्णन

15-12-2025

वाल्मीकि कृत ‘रामायण’ में अयोध्या वर्णन

सरोजिनी पाण्डेय (अंक: 290, दिसंबर द्वितीय, 2025 में प्रकाशित)

 

कोशल नरेश राजा दशरथ की राजधानी अयोध्या पुरी थी। दशरथनंदन श्री रामचंद्र भारतीय जनमानस के आदि अधिनायक हैं। उनकी जीवन गाथा से उत्तर से दक्षिण और पूर्व से पश्चिम तक का भारतीय साहित्य अटा पड़ा है। जहाँ राम की जीवन गाथा लोकभाषा के एक प्रचलित पद:

“एक राम हते एक रावन्ना, 
एक छत्री हते एक बाभन्ना, 
वाने वाकी हरी मेहरिया
वाने वाके प्रान हरे
बस इतनी हती बातन्ना
तुलसी लिखि गए पोथन्ना“

में संपूर्ण मानी जाती है, वहीं संस्कृत में इस कथा का थोड़ा सा विस्तार कर:

“आदौ राम तपोवनादि गमनं, हत्वा मृगं कांचनम्, 
वैदेही हरणं, जटायु मरणम्, सुग्रीव संभाषणम्, 
बाली निर्दलनं, समुद्र तरणम्  लंका पुरी दाहनम्, 
पश्चाद् रावण-कुंभकर्ण हननं एतद्धि रामायणम्।” 

जैसे श्लोक में भी पूर्ण कर दी जाती है। 

संस्कृत के आदिकवि वाल्मीकि ने इसी कथा का विस्तार चौबीस हज़ार श्लोकों में करके ‘रामायण’ ग्रंथ लिखा जो राम की जीवन गाथा का आदिगान है। अब जब कथा एक पद में ही पूरी हो जाती है तो फिर उसका इतना विस्तार क्यों? 

वह इसलिए कि साहित्य प्रेमी उस काल को अपनी कल्पना के माध्यम से साक्षात्‌ देख सकें। नदी, वनस्पति, वानर जाति आदि का अत्यंत सूक्ष्म निरीक्षण कर, उसका सविस्तार सजीव वर्णन इस ग्रंथ की विशेषता है। अयोध्या पुरी को ही लीजिए जो कोशल राज्य की राजधानी है, जहाँ वनवास से लौटने पर श्री राम का राज्याभिषेक हुआ, उसका वर्णन वाल्मीकि ने कई बार किया है। इस आलेख में मैंने भिन्न-भिन्न अवसरों पर वाल्मीकि के अयोध्या वर्णन को हिंदी के छंदों में बाँधने का प्रयास किया है, आप पाठक ही बताएँगे कि मैं इस प्रयास में कितनी सफल अथवा असफल रही हूँ।

(१) 

बालकांडम्-पंचम सर्ग (श्लोक संख्या-५ से१९ तक) 

“सजला सरयू के तीर बसा एक विस्तृत जनपद कोशल है, 
धन' धान्य पूर्ण, त्रैलोक्य विदित, यह मनु महराज की निर्मिति है, 
 
बारह-दस योजन की आयत, इसमें है पुरी अयोध्या की, 
वृक्षावलियों से घिरा राजपथ, शोभा बनता है जिसकी। 
 
नित जल से सिंचित यह होता और सज्जित होता पुष्पों से, 
छोटे-छोटे अनेक पथ भी नगरी में जाते हैं इससे । 
 
‘अलका’ समान यह अवधपुरी, राजा दशरथ ने बसाई थी 
शचिपति के सम जो धर्मशील, त्रिभुवन ने महिमा गायी थी। 

अनगिनत बज़ारें-हाटें थीं, सज्जित थे द्वार कपाटों से, 
शिल्पी अनेक बसते पुर में, थे अस्त्र शस्त्र आगारों में। 
 
ऊँची अटारियाँ पंक्तिबद्ध, ध्वज उन सब पर लहराते थे, 
था नगर सुरक्षित तोपों से, बंदी जन विरुद सुनाते थे। 
 
अमराई-शालवनों से थी यह नगरी सारी घिरी हुई, 
उद्यान-बग़ीचों में दिखतीं, नट-नटियों की मंडली कई। 
 
संपन्न अयोध्या पशुधन से, सुंदर, अतिदुर्गम, बसी हुई, 
इसकी तो परिधि बनातीं थीं, खाई दुर्गम अति भयंकरी, 
 
रंगमहलों-कूटागरों से यह अवधपुरी थी भरी-भरी! 
लख रत्न विभूषित अटारियाँ, लज्जित होती थी इंद्रपुरी। 
 
संपन्न सुस्वस्थ सब नर-नारी, सत-महले, भवन अटारी थीं, 
अठकोणी नगरी अयोध्या की, पूरी धरती पर न्यारी थी। 
 
मीठे जल से सिंचित होकर वसुधा भी शस्य उगलती थी, 
भोजन पानी भरपूर मिला, आबादी सघन विलसती थी। 
 
नृप थे कृपालु, धरती सफला, जनता संपन्न-सुरक्षित भी, 
वीणा-मृदंग-वंशी बजती, बज उठती थी दुन्दुभी कभी। 
 
अति दक्ष शिल्पियों से निर्मित, थे भवन विथियां दोष रहित, 
पृथ्वी पर मानो उतर पड़ी देवों के आशीर्वाद सहित। 

(२) 

श्री राम के राज्याभिषेक की घोषणा के समय की अयोध्या:

अयोध्या कांडम् षष्ठम् सर्ग (श्लोक सं० १० से २० तक) 
  
“श्री राम चढ़ेंगे सिंहासन,” जब अवधपुरी में बात चली, 
कोशल की उस रजधानी की, तब सजने लगी हर एक गली। 
 
आकाश चूमते मंदिर पर, भवनों, अटारियों, राहों तक, 
चौबारों और बाज़ारों पर लग गई ध्वजाएं मनमोहक, 
जो लहर-लहर लहराती थीं, गलियों में, ऊँचे वृक्षों पर। 
 
नट-नर्तक और गायकों के चहुंदिशि में गूँजे मधुर गान, 
आनंद मगन हो पुरवासी, सुनते थे यह समवेत तान। 
 
करने को राजतिलक चर्चा, अपने भवनों से निकल-निकल, 
एकत्र कई थे जन समूह, नगरी के पथ चौराहों-पर! 
  
क्रीड़ारत बालक-बाला भी जब आपस में बतियाते थे, 
“राजा होंगे अब रामचंद्र”, सब यही बात दोहराते थे। 
 
पुष्पाच्छादित थे राजमार्ग और पवन अगरु-चंदन से बसी, 
अति सुंदर सजी अयोध्या थी, धरती पर आयी इंद्रपुरी! 
  
करने को निशाएँ उजियारी, मार्गों पर दीपस्तंभ लगे, 
जगमग करती शाखों को लख, लगता था मानो वृक्ष खड़े। 

करके शृंगार अयोध्या का, पुरवासी सब लालायित थे, 
कब राम बनेंगे ‘कोशल-पति’ उस पल की प्रतीक्षा करते थे! 

सब सभागृहों, चौराहों पर होता था दशरथ-यशोगान 
कहते थे सारे पुरवासी, “अपने राजा दशरथ महान“!! 

(३) 

राम के वन गमन के बाद अयोध्या की दशा का वर्णन सुमंत्र द्वारा, राजा दशरथ से:

अयोध्या कांडम्, नवपंचादशम् सर्ग, (श्लोक सं० ४ से १६ तक)
 
पुर के पादप, तरु-पल्लव भी अंकुर समेत कुम्हलाए हैं, 
हे राजन, राम-वियोग कहाँ वे पुष्प-वृक्ष सह पाए हैं? 
 
वन-उपवन सारे सूख गए, सूखे पत्ते भी झरते हैं 
इस विरह-वेदना के कारण, नद, सर, तड़ाग सब तपते हैं। 
 
जब अवधपुरी से राम गए मोहक वन भी वीरान हुआ, 
निराहार-शिथिल वन-जीवों से वनप्रांतर भी श्मशान हुआ। 
 
नदियाँ-तड़ाग सब मलिन हुए, है पद्म-ताल निर्जल-सूखा, 
व्याकुल हैं जल के जीव सभी, तट के विहगों की है दीन दशा। 
 
हो गए पुष्प सब गंधहीन, तरुवर के फलों ने स्वाद तजा, 
रह स्वादहीन और गंधरहित सब सहते हैं यह दुस्सह्य व्यथा। 
 
हे राजन, सुनो, नगर के सब उद्यान वीराने लगते हैं, 
श्रीहीन हुए तरु-पादप सब, चुपचाप खड़े बस रोते हैं। 
 
हैं शोक मग्न सब पुरवासी, अभिवादन करना भी भूले
दुख से मुरझाए चेहरे हैं, भरते हैं उसासें खड़े-खड़े। 
 
राजा के रथ को सूना पा, राहों पर पथिक बिलखते थे, 
थे सभी दीन, सब दुख से ग्रसित बस झरझर आँसू बहते थे। 
 
भवनों, अटारियों में बैठी ललनाएँ करती थीं विलाप, 
“हा! राम गए वन राज्य त्याग, केकयी ने किया यह घोर पाप!” 
 
आँखों से बह निकला काजल, कजरारी आँखें सूनी थीं, 
एक दूजे को पकड़े बैठीं, बस करुण रुदन सब करती थीं। 
 
सब शत्रु-मित्र और उदासीन, डूबे मानो दुख सागर में, 
सब की पीड़ा एक जैसी थी, कुछ भेद नहीं था अब उनमें। 
 
हे देव! अवधपुर के वासी डूबे हैं शोक के सागर में, 
घोड़े-हाथी भी शांत नहीं, रोते हैं सभी आर्त्त-स्वर में। 
 
इस आर्त्तनाद के मिस मानो, रोती है अवधपुरी सारी 
 महारानी कौशल्या जैसी, बन गयी ‘पूत बिन महतारी’। 

(४) 

अपने ननिहाल कैकय से आने पर भरत अपने पिता की राजधानी अयोध्या की दशा देखकर व्यथित हैं‌। भरत की दृष्टि से अयोध्या:
 
अयोध्या कांडम्, एकसप्तति: सर्ग, (श्लोक सं० ३६से ४४ तक) 
 
श्रीहीन भवन सब तकता हूँ, स्वच्छताहीन अति दीन, मलिन, 
अगरू-चंदन की गंध नहीं, आरती-मंत्र सब हैं विलीन, 
 
भोजन की कहीं सुगंधि नहीं, पुर वासी भूखे लगते हैं, 
संपन्न नगर के वासी क्या इतने विपन्न भी होते हैं? 
 
पुष्पों से सज्जित, देवालय शीशे की तरह चमकते थे, 
जन-शून्य पड़े हैं वे सारे, जो जन-संकुल नित रहते थे। 
 
देवालय पूजा से वंचित, मख-शालाओं में हवन नहीं, 
शोभाविहीन इन हाटों में, ग्राहक भी दिखते कहीं नहीं! 
 
व्यापारी चिंता मग्न हुए, व्यापार भला कैसे होगा? 
मेरी प्यारी राजधानी का, बोलो सारथी, अब क्या होगा? 
 
देवालय के पशु-पक्षी भी मुझको शोकाकुल दिखते हैं, 
नर-नारी इस नगरी के सब, चिंतित उत्कंठित लगते हैं। 
 
अति व्यथित हृदय, मन में रोते सारथी से भरत यह कहते हैं, 
आशंका पूरित हृदय लिए वे राजभवन में जाते हैं। 
 
जिस अवधपुरी की शोभा से अलकापुरी लज्जित होती थी, 
उसको इस दीन दशा में पा, राम-अनुज की अँखियाँ रोती थीं॥

1 टिप्पणियाँ

  • 13 Dec, 2025 09:33 PM

    'वाल्मीकि कृत रामायण में अयोध्या वर्णन' का भावानुवाद सरोजिनी पाण्डेय जी द्वारा किया है। इसमें अयोध्या नगरी का स्थापत्य, उसका वैभव और राजा दशरथ के उत्तम शासन का वर्णन है। अयोध्या नगरी प्राकृतिक रूप से तो धनी है ही, इसके साथ ही प्रजा भी स्वस्थ व सुखी है। वहां कोई अभाव नहीं है। अयोध्या का नाम ध्यान में आते ही राजा दशरथ और उनके पुत्र राम अपने आप जेहन में घूम जाते हैं। घूमेंगे क्यों नहीं! राम भारतीय संस्कृति में रचे-बसे जो है। यह भी कहा जा सकता है कि राम ही भारतीय संस्कृति का आदर्श है। हम उनके आदर्शों से ही अपने कार्य व्यापारों का मूल्यांकन करते हैं। राम के राजा बनने की खबर से अयोध्या में खुशियां मनाई जाने लगी थी। बालक, वृद्ध सभी इस पर चर्चा कर रहे थे और रामराज्य में अपने सुनहरे भविष्य को देखने लगे थे। महलों के षड्यंत्रों से प्रजा अनजान रहती है। अचानक खबर सुनते हैं कि राम राजा नहीं बन रहे हैं तो पूरी अयोध्या शोक में डूब जाती है। मनुष्य ही नहीं, पशु-पक्षी भी दुख में डूब गए थे। हरे-भरे वृक्ष और लताएं मुरझा गए थे। सूनी उजड़ी अयोध्या का हाल उनके मंत्री सुमंत राजा दशरथ जी को सुनाते हैं। यहां दुख अपने उरुज तक पहुंच जाता है। यह दृश्य पाठक को विह्वल कर देता है। भरत आगमन वाला दृश्य और भी मारक है। भरत को मंदिर सूने, गलियां वीरान दिखाई देती हैं। मंदिरों में न अगरु की सुगंध महसूस होती है और न वाद्ययंत्रों के मोहक स्वर सुनाई दे रहे हैं। अनिष्ट की आशंका से उनका दिल बैठा जा रहा है। इसमें कवि ने प्रजा के साथ व्यापारियों की चिंता को भी व्यक्त किया है। व्यापारी हर युग में अर्थव्यवस्था की रीढ़ रहे है। यह व्यवस्था सनातन से लेकर आज तक चली आ रही है। सरोजिनी पाण्डेय जी के द्वारा किये गये इऊअनुवाद में सहजता है। पाठक उसमें बहता चला जाता है। इसमें कहीं बोझिलता महसूस नहीं होती है। लगता ही नहीं है कि ये संस्कृत ग्रंथ का अनुवाद है। छंदों की लय इतनी सुडौल है कि कहीं ठिठकना नहीं पड़ता है। यह रचना कई मामलों में समय का अतिक्रमण करके आज के युग में प्रवेश कर जाती है। इसीलिए रामायण आज भी प्रासंगिक है और आगे भी रहेगी। बढ़िया अनुवाद के लिए सरोजिनी जी को बहुत-बहुत बधाई!

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