जीवन का सत्य

15-04-2026

जीवन का सत्य

सरोजिनी पाण्डेय (अंक: 295, अप्रैल द्वितीय, 2026 में प्रकाशित)

 

बँधन से ही जीवन सम्भव 
निर्बँध न जीवन हो सकता
ना बँधें अण्ड औ' बीज अगर
क्या शिशु का जन्म कभी होगा? 
 
अक्षर-अक्षर मिलते हैं जब, 
तब तो बनता है शब्द एक
शब्दों से मिल भाषा बनती, 
भाषा करती दो हृदय एक
 
बँधन यदि होता है स्वैच्छिक 
आत्मा को गौरव देता है 
दूजे का दिया गया बँधन 
आनंद हृदय का हनता है 
 
अपने मन की ले थाह अगर
हमने जीवन का बँध चुना 
तो सीधा-सादा जीवन भी 
सुख देता है नित-नित दूना!! 
 
होता है मन अतिशय चंचल 
वह नित परिवर्तित होता है 
जो आज नयन का तारा हो, 
किरकिरी वही बन सकता है!! 
 
सुख-दुख तो अपने भीतर है 
उसको औरों से क्या पाना! 
पर याद सदा यह रखना है 
अति दुस्तर मन को समझ पाना!!! 

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