वानर महल
सरोजिनी पाण्डेय
मूल कहानी: इल् पलाज़ो डेले सिमी; चयन एवं पुनर्कथन: इतालो कैल्विनो; अंग्रेज़ी में अनूदित: जॉर्ज मार्टिन (मंकी पैलेस);
पुस्तक का नाम: इटालियन फ़ोकटेल्स; हिन्दी में अनुवाद: ‘वानर महल’ सरोजिनी पाण्डेय
एक बार की बात है, एक राजा के जुड़वाँ पुत्र थे—जगदीशऔर आदीश। राज परिवार को यह मालूम नहीं था कि उन दोनों में से किसका जन्म पहले हुआ। दरबारी भी इस विषय में एकमत नहीं थे कि उन दोनों राजकुमारों में किसका जन्म पहले हुआ। इस परिस्थिति के कारण यह निश्चित करना आसान न था कि किसे युवराज बनाया जाए। जब युवराज के नाम की घोषणा करने का समय आया, तब एक दिन राजा ने दोनों राजकुमारों को बुलाया और कहा, “तुम दोनों इस खुले संसार में जाओ, अपने लिए पत्नी ढूँढ़ो, जिसकी पत्नी मुझे सबसे अनुपम उपहार देगी उसी को युवराज बनाया जाएगा। मैं सोचता हूँ यही न्यायोचित बात है।”
दोनों राजकुमार यात्रा के लिए तैयार हुए, अपने-अपने घोड़े पर चढ़े और अलग-अलग दिशा में घोड़ों को दौड़ा दिया। दो दिन के बाद जगदीश एक बड़े नगर में पहुँचा। वहाँ उसने एक राजवंशी धनवान की बेटी से मित्रता की और उसके पिता के पास विवाह का प्रस्ताव लेकर गया। बेटी ने भी विवाह का प्रस्ताव मान लिया और एक छोटी डिबिया लेकर राजकुमार के साथ राजा के सामने गई और दोनों ने अपनी सगाई की घोषणा कर दी। राजा ने भेंट की डिबिया तो स्वीकार कर ली लेकिन उसे अभी खोला नहीं। आदीश की भावी पत्नी का उपहार पाने के बाद ही वह दोनों उपहारों को एक साथ देखना चाहता था। उधर आदीश भी अपने लिए जीवनसाथी की तलाश कर रहा था। चलते-चलते वह एक घने जंगल में पहुँचा, ऐसा लगता था कि वह जंगल कभी ख़त्म ही नहीं होगा। अपनी तलवार की सहायता से पेड़ों को काटता, झाड़ियों को रौंदता, जंगल में वह अपने लिए राह बनाता जाता था। अचानक वह एक ऐसी जगह पहुँचा जहाँ उसके सामने संगमरमर का एक सुंदर महल जगमगा रहा था। आदीश ने द्वार पर दस्तक दी और और वर्दी में सजे हुए एक बंदर ने उसका स्वागत, द्वार खोलकर किया। तभी दो बंदर और आए और उन्होंने आदीश को घोड़े से उतरने में सहायता की, सर झुका कर उसे महल में चलने के लिए संकेत किया। सुंदर सीढ़ियों पर जगह-जगह बंदर खड़े थे, जो राजकुमार के स्वागत में मानो बिछे ही जा रहे थे। चलते-चलते राजकुमार आदीश एक बड़े कमरे में जा पहुँचा जहाँ तीन बंदर पहले से एक मेज़ के तीन किनारे बैठे थे। आदीश ख़ाली कुर्सी पर बैठ गया, ताश का खेल खेला जाने लगा। कुछ समय बाद बंदरों ने संकेत से उससे भोजन के लिए पूछा। भोजन कक्ष भी वैसा ही शानदार था। सेवकों की वर्दी पहने हुए कई बंदरों ने सिर झुका कर राजकुमार का स्वागत किया। राजसी भोजन करने के बाद उसे शयन कक्ष में पहुँच दिया गया। आदीश इस स्वागत-सत्कार से हैरान था, वह भी बंदरों द्वारा? नरम, आरामदायक बिस्तर में उसने सोने की कोशिश की। लेकिन अभी उसे नींद आती कि उसके पहले ही अँधेरे में उसे एक धीमा स्वर सुनाई दिया, “आदीश!”
और आदीश ने सिर तक चादर ओढ़ ली और उसके भीतर से ही बोला, “कौन पुकारता है मुझे?”
“आदीश, तुम क्या ढूँढ़ते हुए यहाँ आए हो?”
“मैं एक ऐसी पत्नी चाहता हूँ जो मेरे पिता को जगदीश की पत्नी से अच्छा उपहार दे सके और मैं युवराज घोषित किया जाऊँ!”
“यदि तुम मुझसे विवाह करने के लिए हाँ कर दो तो वैसा उपहार और राज मुकुट, तुम्हें दोनों मिल सकते हैं।”
“तो फिर चलो हम विवाह कर लेते हैं!” आदेश तनिक से ऊँचे स्वर में बोला।
“ठीक है, कल तुम अपने पिता को एक पत्र भेजो,” स्त्री स्वर ने कहा।
अगले दिन आदीश ने अपने पिता को पत्र लिखा कि वह सकुशल है और शीघ्र ही अपनी दुलहन के साथ घर वापस आ जाएगा। यह चिट्ठी उसने एक बंदर को दे दी जो इस पेड़ से उस पेड़ पर उछलते हुए राजधानी पहुँच गया।
राजा को इस विचित्र दूत को देखकर पहले तो बहुत हैरानी हुई लेकिन उसके हाथ से शुभ संदेश पा कर राजा ने बंदर की बहुत आवभगत की।
अगली रात को फिर आदीश की नींद अँधेरे में आते हुए स्वर से टूटी, “शादी के बारे में क्या तुम्हारा अभी वही विचार है आदीश?”
“बिल्कुल।”
“ठीक है, तो आज तुम अपने पिता को एक दूसरी चिट्ठी भेजो।”
अगले दिन आदीश ने फिर अपने पिता को अपनी कुशलता का पत्र भेजा। जिसे लेकर दूसरा बंदर चला गया। राजा ने इस बंदर को भी अपने महल में प्रेम से रखा।
यही सिलसिला महीने भर तक चलता रहा, रोज़ रात को एक स्त्री-स्वर उससे विवाह के बारे में उसके विचार पूछता, आदीश अपना निश्चय बताता और अगले दिन एक पत्र, पिता को, वानर दूत के हाथों भेजता।
धीरे-धीरे राजधानी इन बंदर दूतों से भर गई। वे छतों पर पेड़ों पर और सभी इमारतों पर दिखाई देने लगे। मोची जब जूते गाँठते तब बंदर उनके कंधों पर बैठे रहते और उनकी नक़ल करते।
ज़र्राह जब किसी का फोड़ा चीर रहा होता तो कोई बंदर उसका छुरा लेकर भाग जाता। औरतें जब सड़कों पर निकलतीं तो बंदर उनकी ओढ़नी उड़ा लेते। किसी की समझ में कुछ नहीं आ रहा था कि क्या किया जाए?
एक महीना बीत जाने के बाद अंत में रात के अँधेरे में उस स्त्री-स्वर ने कहा, “कल हम तुम्हारे पिता के पास चलेंगे और शादी कर लेंगे!”
अगली सुबह जब आदीश अपने कमरे से बाहर आया तो उसने देखा कि द्वार पर एक सुंदर बग्गी उसका इंतज़ार कर रही है, जिसमें कोचवान के स्थान पर एक बंदर बैठा है, गाड़ी के दोनों और दो बंदर सेवा में तत्पर खड़े हैं और अंदर बैठी है रेशमी कपड़ों और गहनों से सजी एक बंदरिया! आदीश उस बंदरिया के बग़ल में जा बैठा और गाड़ी चल पड़ी राजधानी की ओर।
जब गाड़ी में बैठा यह जोड़ा राजधानी पहुँच तो सड़कों पर इन्हें देखने के लिए भीड़ उमड़ पड़ी और लोगों के आश्चर्य का ठिकाना तो तब ना रहा जब उन्होंने राजकुमार आदीश के बग़ल में बैठी उनकी दुलहन के रूप में एक बंदरिया को देखा। जब यह गाड़ी महल के द्वार पर पहुँची तब सब लोग टकटकी लगाए राजा की ओर देख रहे थे। वे यह जानना चाहते थे कि अपनी होने वाली पुत्रवधू के रूप एक बंदरिया को देखकर राजा की क्या दशा होगी? वह क्या कहेंगे? क्या करेंगे? लेकिन राजा मज़बूत दिल वाला था, उसके चेहरे पर शिकन तक ना आयी, उन्होंने पलक तक न झपकायी शांत स्वर में कहा, “मेरे बेटे ने उससे ब्याह करना तय किया है। एक राजा को अपने वचन से पीछे कभी नहीं हटना चाहिए।”
राजा ने बंदरिया के हाथ से उपहार स्वरूप वह छोटी डिबिया ले ली। अगले दिन विवाह होना था और तभी उन डिबियों का खोला जाना भी निश्चित हुआ। होने वाली दुलहन को उसके कमरे में पहुँचा दिया गया। वह अपने कमरे में अकेले ही रहना चाहती थी।
अगले दिन सुबह राजकुमार आदीश अपनी होने वाली पत्नी के पास गया। जब वह कमरे में घुसा तो उसकी होने वाली दुलहन शादी के जोड़े में सजी शीशे के सामने बैठी शृंगार कर रही थी।
“मैं कैसी लग रही हूँ?” उसने आदीश की ओर मुड़ते हुए कहा।
ब आदीश अवाक् रह गया। वह एक बंदरिया नहीं बल्कि एक सुंदर सुगठित युवती को देख रहा था! जिसके लंबे-लंबे बाल और गुलाबी गाल थे! आदीश तो मानो ख़ुशी से पागल हो गया, उसे अपनी आँखें पर विश्वास नहीं हो रहा था उसका मुँह खुला था।
“मैं और कोई नहीं तुम्हारी दुलहिन हूँ!”
यह सुनते ही आदीश ने उसे अपनी बाँहों में भर लिया।
महल के बाहर लोगों की भीड़ लगी थी। राजकुमार आदीश की बंदरिया-दुलहन को देखने की उत्सुकता सभी में थी। जब राजकुमार महल के बाहर अपनी सुंदरी दुलहन के साथ निकाला तो सबके मुँह खुले के खुले रह गए। महल के बाहर पेड़ों पर, घरों की छतों पर, खिड़कियों पर हर जगह बंदर ही बंदर भरे हुए थे और उछल-कूद कर रहे थे। जब राजकुमार आदीश की गाड़ी दूल्हा-दुलहन को लेकर आगे बढ़ी तब पेड़ों से बंदर उतर उतर कर उसकी गाड़ी की परिक्रमा करते और मनुष्य में बदल जाते, सुंदर स्त्रियाँ, घुड़सवार, सैनिक, किसान, सेवक, बंदर इन सभी मनुष्य रूपों में दिखलाई पड़ने लगे। यह काफ़िला बारात के रूप में आगे बढ़ चला, जहाँ विवाह होना था।
अब राजा साहब को राजकुमारों से मिली उपहार की डिबिया को खोलना था!! पहले उन्होंने राजकुमार जगदीश की दुलहन की दी हुई डिबिया को खोला, उसमें से एक चिड़िया का जीवित बच्चा निकला यह देखकर सब लोग हैरान रह गए कि बंद डिबिया में भी इतने दिनों तक वह पक्षी ज़िन्दा कैसे था! उसकी चोंच में एक छोटा, सुंदर रेशम। और ज़री से बना फुंदना लटक रहा था।
अब राजा ने आदीश की दुलहन से मिली हुई डिबिया खोली इसमें से भी एक छोटा सा चिड़िया का बच्चा निकला, उसने अपनी चोंच में एक छिपकली पकड़ी थी और छिपकली के पंजों में कशीदाकारी किया हुआ रेशम का रूमाल था, कशीदाकारी हैरान करने वाली थी!
यह देखकर राजकुमार जगदीश निराश हो गया क्योंकि अब तो यह तय था कि राजकुमार आदीश ही युवराज घोषित होगा!
राजा कुछ बोलते इसके पहले ही आदीश की दुलहन बोल उठी, “आदीश को अपने पिता की राजगद्दी नहीं चाहिए क्योंकि मैं अपनी राजगद्दी राजकुमार आदीश को दहेज़ के रूप में दे रही हूँ। मुझसे शादी करके राजकुमार ने मुझे और दूसरे सभी बंदरों को श्राप से आज़ाद कराया है।”
यह सुनते ही वे सभी लोग जो अभी हाल ही में बंदर से मनुष्य के रूप में आए थे, ‘महाराज आदीश की जय’ के नारे लगाने लगे।
राजकुमार जगदीश को युवराज घोषित कर दिया गया। सब लोग सुख और शान्ति से रहने लगे।
“उन सभी ने तो ज़िन्दगी का आनंद उठाया,
लेकिन मुझे तो कोई काम नहीं मिल पाया!“
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