विशेषांक: दलित साहित्य

दलित साहित्य

दलित साहित्य और उसके होने की ज़रूरत
डॉ. शैलजा सक्सेना


दलित साहित्य उस समाज की सच्चाई से भरा साहित्य है जिसे हमारे समाज में अछूत, अस्पृश्य, हरिजन या शेड्यूल कास्ट कहा जाता है। मनुष्य को मनुष्य की तरह जीने के लिए जिन आवश्यक चीज़ों की ज़रूरत होती है, उनमें सम्मान बहुत महत्वपूर्ण है। यह सम्मान व्यक्ति अर्जित करता है अपने को योग्य बना कर और योग्यता को प्रमाणित करके। पर अगर योग्य बनने के लिए अवसर कम हों, या अवरुद्ध कर दिए जाएँ या इस प्रकार का वातावरण उपस्थित कर दिया जाए जहाँ व्यक्ति का आत्मविश्वास टूटने लगे या टूट जाए तब क्या हो? या अगर वह समस्त विपरीत स्थितियों से संघर्ष करके उनसे बाहर निकल भी आए तो भी छोटी जाति का कह कर उसका निरंतर अपमान होता रहे तब क्या हो? जातिवाद की इस चुभन को जितने तीखेपन से इस युग में, इस साहित्य में देखा गया, पहले नहीं देखा गया था।

दलित साहित्य के चारों ओर चार प्रश्न खड़े रहते हैं: 1) क्या इस तरह अलग से वर्गीकरण और नामकरण किए जाने की आवश्यकता है? 2) क्या इस साहित्य में केवल दलितवर्ग द्वारा लिखा साहित्य मान्य होगा या अ-दलित द्वारा लिखित भी, यानि स्वानुभूति? या सहानुभूति? 3) इस साहित्यिक धारा के प्रतिष्ठित लेखक क्या केवल साहित्यकार कहलाने नहीं चाहिए, उन्हें दलित साहित्यकार ही क्यों कहना चाहिए? इसके साथ ही चौथा मुद्दा दलित स्त्री विमर्श का भी है कि क्या अलग से दलित स्त्री पर बात करना क्यों आवश्यक है। मेरे विचार से प्राय: ये सभी प्रश्न स्त्री विमर्श और प्रवासी साहित्य विमर्श के साथ भी हैं। 

दलित साहित्य के संदर्भ में इन प्रश्नों के उत्तर अनेक विचारकों ने अनेक प्रकार से दिए हैं जिन्हें आप इस अंक के आलेखों में देखेंगे। संक्षेप में कहें तो यह कड़वी सच्चाई है कि दलित समाज हमारे ही भारतीय समाज के कुटुंब में सदियों से प्रताड़ित रहा है अत: उसके संघर्ष को अलग से रेखांकित करने की आवश्यकता है। इस वर्ग को साहित्य में पहले भी प्रस्तुत किया जाता रहा है पर वह प्रस्तुति भोगे हुए यथार्थ से उत्पन्न नहीं थी। बहुत कम साहित्यकार होते हैं जो ’परकाया प्रवेश’ की उदार संवेदना रखते हैं अत: प्राय: जो साहित्य दलित समाज की प्रस्तुति करता भी था उसमें अनुभव की गहनता कम रहती थी। और अगर यह गहनता उनमें है तो भी दलित समाज के भोगे हुए यथार्थ को और अधिक लिखे जाने में समस्या नहीं होनी चाहिए। मेरे विचार से हर विमर्श, समाज के किसी एक वर्ग या समूह विशेष के विशिष्ट संघर्ष और साहस की प्रस्तुति से प्रारंभ होता है, उस समूह विशेष की बात को समाज के सामने तीखे रूप से प्रस्तुत करके, मानवीय चेतना को झकझोरने और अपने लिए समान संवेदना जगाने की चेष्टा करता है पर इन प्रश्नों को कुछ समय बाद हर लेखक/विमर्श व्यापक मानवीय चेतना और सामाजिक संवेदना से जोड़ता भी है। यह किसी भी विचार की स्वाभाविक परिणति भी है जिसमें बिंदु से सिंधु की ओर जाया जाता है। आख़िरकार ये विमर्श, व्यापक सामाजिक संवेदना जगाने के लिए, इस समाज के एटीट्यूड यानि तेवर को बदलने की चेष्टा ही तो कर रहे हैं ताकि असली अर्थों में सब में समानता आए और सब को सम्मान मिल सके चाहें वह दलित पुरुष हो या दलित स्त्री। 

स्वतंत्रता के पहले लगभग १९३० से शुरू हुई दलित चेतना स्वतंत्रता के बाद पूरे भारतीय समाज में एक आंदोलन के रूप में उभरी। बाबा साहब के महाराष्ट्र निवासी होने के कारण शायद वहाँ उसका ज़ोर लोगों को अधिक दिखा होगा पर पूरे भारत में इसका स्वर गूँज रहा था। संवैधानिक समान अधिकार दिलाने में डॉ. अंबेडकर का बहुत हाथ रहा। उन्होंने दलितोद्धार को सामाजिक आंदोलन का रूप दिया। गाँधी-विनोबा के दलितोद्धार का मूल था हृदय परिवर्तन द्वारा, हरिजन को सम्मान दिला कर समाज में समानता की स्थापना जबकि डॉ. अंबेडकर की विचारधारा पूरी तरह सामाजिक संरचना को बदल कर दलित वर्ग को उनके अधिकार और सम्मान दिलाने की रही। इन सामाजिक आंदोलनों के बारे में विस्तार से आप इस अंक के कई लेखों में पढ़ेंगे। डॉ. कमल किशोर गोयनका जी का लेख, ’दलितों के मसीहा विवेकानंद’ वस्तुत: आँख खोल देने वाला लेख है जिसमें अनेक उद्धरणों के माध्यम से गोयनका जी ने विवेकानंद जी के क्रांतिकारी विचारों को रखा है। विवेकानंद जी सामाजिक संरचना को बिगाड़ने वाले जातिवाद और ब्राह्मणों के पाखंड पर प्रहार करते हुए नीची कही जाने वाली जातियों को ऊपर लाने की बात १८वीं शती के अंत में, गाँधी, विनोबा, डॉ. अंबेडकर सभी से बहुत पहले कर गए हैं। वे तीखे शब्दों में अस्पृश्यता मानने वाले, ’छुओ-मत-वादी’ समाज को आमूल बदलने की बात कहते हैं और सबसे बड़ी बात जो विवेकानंद कहते हैं, वह यह कि कर्ण, नारद, द्रोण, कृप जो निम्न जातियों से ही ऊपर उठे, वे उच्च जातियों में मिल गए, उनके ऊपर उठने का लाभ उनके समाज को क्या मिला? यह एक प्रासंगिक और महत्वपूर्ण प्रश्न है।

दलित साहित्य की धारा बिल्कुल नई नहीं है। इसका इतिहास १९१४ में ’सरस्वती’ पत्रिका में हीरा डोम  की लिखी, ’अछूत की शिकायत’ और अछूतानंद ’हरिहर’ से प्रारंभ होकर आज तक चल रहा है। ’जय भीम’ का नारा देने वाले बिहारी लाल हरित ने तो १९४० के दशक में अपनी भजन मंडली के साथ मिल कर घर-घर उद्बोधन गीत पहुँचाए। महाशय नत्थु राम ताम्र मेली, ओम प्रकाश वाल्मीकि, मोहनदास नैमिशराय, सूरजपाल चौहान, जयप्रकाश कर्दम, दयानंद बटोही, डॉ. धर्मवीर, रजनी तिलक, सुशीला टाकभौरे, रमणिका गुप्ता, डॉ. श्योराज सिंह आदि इस साहित्य के अनेक बड़े नाम हैं। उनमें से कुछ की रचनाएँ आप यहाँ पढ़ेंगे। अनेक अ-दलित साहित्यकारों ने भी संवेदनात्मक विश्लेषण द्वारा इस साहित्य को चर्चा में लाकर साहित्यिक और सामाजिक जागरूकता में अपना योगदान दिया है, उनके लेख भी इस अंक में हैं। बहुत सी कविताओं, कहानियों, उपन्यास अंश और आत्मकथा अंश को इस अंक में समेटा गया है। दलित साहित्य में आत्मकथाओं का महत्वपूर्ण स्थान है जिनके कारण यह साहित्य बहुत गंभीरता से लिया जाने लगा साथ ही ये आत्मकथाएँ अन्य लोगों के लिए भी संघर्ष और साहस की प्रेरक विजय गाथा बनीं। इस अंक में सुशीला टाकभौरे जी की आत्मकथा के अंश इस बात के गवाह हैं। साथ ही रजतरानी मीनू, रजनी दिसोदिया, रजनी अनुरागी, पूनम तुषामड़ आदि लेखिकाओं की उपस्थिति दलित स्त्री साहित्य का प्रतिनिधित्व कर रही है। इस साहित्य की सरल और प्रांतीय शब्दों से भरी सरल भाषा भी ध्यान देने योग्य है। संक्षिप्त वाक्य, दो टूक बात, बिना लाग-लपेट या कलात्मक रहस्यवादी आवरण के बात कह देने वाला यह साहित्य एक अलग शैलीगत सौंदर्य पैदा करता है। इनकी शैली की यह संक्षिप्तता मानों जीवन की तीखी नोंक है जहाँ कुछ भी अतिरिक्त नहीं!

हमें विश्वास है कि दलित साहित्य, दलित कहे जाने वाले मनुष्य के संघर्ष और अपार संभावनाओं को न केवल उकेरने बल्कि उन संभावनाओं को उभारने वाला साहित्य बन कर, अपने सशक्त स्वर से हिन्दी साहित्य को समृद्ध करता रहेगा।

ज्योति पासवान तुम्हारे हौसले बुलंद इरादों के चर्चे फैल चुके हैं दूर तक देश-विदेश में, तुम कौन हो? मुझे याद आ रहा है  तुम्हारा इतिहास तुम बहादुर थीं ज़िम्मेदार भी थीं तब भी- जब गाँव में  तुम पैठ से साइकिल चला कर सौदा लेने बाज़ार जाती थीं दबंगों को नागवार  गुज़रा था तुम्हारा  साइकिल चलाना तुम्हारी माँ को भी धमकियाँ  दी गयी थीं इसे रोक ले साइकिल पर चढ़ने से अपनी औक़ात  भूल गयी तू भी नीच जात की होकर ये साइकिल चलाएगी तो हमारी बहू-बेटियाँ क्या चलाएँगी? तू बराबरी करेगी हम से इसकी इतनी हिम्मत। उसके बाद तुम्हारी साइकिल छूट गयी थी परन्तु - तुमने अपना हौसला तब भी बनाये  रखा था जैसे आज बनाये रखा है कोरोना संकट में, तुम्हारी उस साइकिल  इतिहास की ख़बरें तब भी छपीं थीं अख़बारों में ‘एक दलित की बेटी को साइकिल  चलाने से दबंगों ने रोका’ तब तुम दलित की… आगे पढ़ें
हमें प्यार है जंगल से  गिरते झरने, पहाड़ी नदियाँ  भाती हैं दिल को महुआ की मादक गंध महका देती है तन – मन सरहुल के नृत्य उमंग भर देते हैं मन में बेंग, फुटकल, सनई, रुगड़ा और खुखड़ी कहीं जाने नहीं देते साल के वृक्ष हमारे संरक्षक हैं जो थाली, प्लेट, कटोरी से लेकर  ढकते हैं हमारा तन   हम सुरक्षित रखते हैं  अपनी परम्पराओं को जीवित रखते हैं  अपनी संस्कृति को   हमारे यहाँ लड़का – लड़की नहीं होती होता है तो ‘हल जोतवा’ या ‘साग तोड़वा’ ‘साग तोड़वा’ को खुली छूट है अपना जीवन जीने की उसे हवा की सी आज़ादी है नदी में बहने की स्वतंत्रता है और ‘हल जोतवा’ समझता है  बराबरी के अधिकार को   पुरखों को नहीं भूले हैं हम परब की शान है हड़िया हम जुड़े हैं अपनी ज़मीन अपने जंगल और  कल – कल बहते जल से  संस्कृति को सँजोये… आगे पढ़ें
आज मन में आया मैं भी क्यों न उठा लूँ हाथों में बग़ावती लाल झंडा शोषितों की क़तार  दलितों से शुरू होकर  हम पर ही तो ख़त्म होती है!!  सामाजिक शोषण-हिंसा का शिकार दलित ही नहीं हम भी हैं,  मुट्ठी भर ताक़तमंद  मर्दों की मनमानी के शिकार   यही नहीं  नारी देह की बहती गंगा में  कुछेक दंभी पुरुष  अक़्सर धोते आए हाथ  जब-जहाँ-जैसा पानी मिला  गंदा, मैला, कुचला, उथला, गहरा या छिछला ज़रूरी नहीं, भरी-पूरी नदी हो छोटी-छोटी कीचड़ भरी बावड़ियों में भी उतरने से बाज़ नहीं आते तथाकथित मर्द   किसी से नहीं उम्मीद न्याय की दलितों, पिछड़ों और महिलाओं का जीवन  आज भी है उड़ती हुई बरसाती पाखी की तरह जिसके पंख झड़ते ही तमाम जीव रहते हैं मुँह बाये  आहार बनाने के लिए कितनों ने अपनाई ख़ुदकुशी की राह ये सोचकर गिद्धों से नुचवाने से बेहतर है ख़ुद ही करना देह निष्प्राण    मगर… आगे पढ़ें
करमी जाती है नंगे पाँव  खेत में  रोपती है धान मुर्गी, बत्तख, बकरियों के बीच रहती है  नापती है धरती – आसमान रोज़ ही और हंडिया पीकर झूमके नाचती है  जी रही है सिर उठाकर  सुंदर सपनों की मृगतृष्णा  ले आई नयी दुनिया में  अब पहनती है ऊँची हील की सैंडल  चमचमाते ब्रांडेड कपड़े  आगे – पीछे गाड़ियाँ  हाथों में व्हिस्की  झूमती है पॉप म्यूज़िक पर   आँखों का भोलापन  सन गया कीचड़ में  उसने मार दिया  अपनी आत्मा को ‘करमी’ अब ‘कशिश’ हो गई। आगे पढ़ें
पर्वतों के पीछे से आज फिर रिस रहा है लहू शायद फिर हो रहा है कोई हलाल काटा जा रहा है किसी का शीश अभी तो रेता जा रहा होगा उसका गला फिर, किये जाएँगे अलग उसके हाथ, फिर,धड़, पैर फिर उखाड़ दिया जाएगा समूल वो नहीं बन पाएँगे इतिहास नहीं पनपेगी उनकी वंश बेल दुनिया के नक़्शे से ग़ायब हो जाएँगे आदिमजातियों के आदिम घर विरासत में मिले हरियालेपन को हमने कर दिया धूसर उन्होंने हमें दिया भोजन और साँसें और हमने स्वाहा कर दिया उनका जीवन शायद तभी गढ़ी गई होम करते हाथ जलने की परिभाषा न, न, परिभाषा तो हमने अपने लिए गढ़ी दरअसल, केवल उनके हाथ ही नहीं जले वो पूरे जल गए, पूरे कट गए, पूरे मिट गए जब खंडहर ही नहीं होंगे तो कोई कैसे जानेगा कि इमारत कितनी बुलंद थी वो भी हो जाएँगे ऐसे ग़ायब जैसे ग़ायब हो रहे हैं… आगे पढ़ें
कौन, कितना  देखकर होता द्रवित है टूटती हैं लाठियाँ जब भी दलित की  पीठ पर,  ज़ालिम दबंगों के क़हर की   गा रहे समभाव को  ऊँचे स्वरों में क्या उन्हें समता कहीं देती दिखायी क्रूरता का वीडियो  सोशल पटल पर डालकर निर्भीक हो करते ढिठाई   नहीं देते जगह  शव तक के दहन को कौन आता है कहाँ प्रतिरोध में तब  बिन किये  परवाह फैले क्रूर डर की   लोग किस स्वाधीनता की  बात करते आज भी बेगार के बरगद खड़े हैं जन्म के बन्धन विकट कसकर बँधे जब आस्था के प्रश्न तब  कितने बड़े हैं   जाति-गौरव ,  दम्भ की परिकल्पनाएँ हैं खड़ी इतिहास लेकर श्रेष्ठता का और सेनाएँ  लिए कल्पित समर की   ओढ़कर निष्पक्षता की  केंचुली को मीडिया कितना  विमर्शों से घिरा है शुद्ध प्रायोजित जहाँ  चर्चा पटल पर सूत्र का मिलता नहीं कोई सिरा है   बौद्धिकों को  वंचना दिखती नहीं क्यों देखकर अनदेख,… आगे पढ़ें
मैं रिझाने के लिए तुमको लिखूँ जो  हैं नहीं वे शब्द  मेरे कोश में भी   दोपहर की  चिलचिलाती धूप में जो  खेत-क्यारी में  निराई कर रहा है खोदता है घास-चारा  मेंड पर से  बाँध गठ्ठर ठोस  सिर पर धर रहा है   है वही नायक  समर्पित चेतना का  मैं उसी को गा रहा  उद्घोष में भी   जो रुके सीवर  लगा है खोलने में  तुम जहाँ पर  गंध से ही काँपते हो दूरियों को नापकर  चढ़ता शिखर तक  तुम जहाँ दो पाँव  चलकर हाँफते हो   मैं उसी की  मौन भाषा बोलता हूँ प्राणपण से  दनदनाते रोष में भी   घाव, टीसें, आह, आँसू  छोड़कर मैं  किस तरह उल्लासमय  उत्सव मनाऊँ  या किसी की यातनामय  चीख सुनकर  मैं रहूँ चुप, और  रो-रोकर रिझाऊँ   जब असंगत हैं  सभी अनुपात तो फिर ताप मैं भरता रहूँ  आक्रोश में भी आगे पढ़ें
पेड़ पर लटके हुए  शव लड़कियों के  सिर्फ़ मादा जिस्म, या कुछ और हैं    कौन हैं ये लड़कियाँ  रौंदी गयी हैं  देह जिनकी  क्यों प्रताड़ित है  दलित अपमान को  पीते हुए भी  कौन हैं वे  गर्व जिनको   लाड़लों की क्रूरता पर  क्यों समय निर्लज्ज  बैठा मौन को  जीते हुए भी    सांत्वना के शब्द भी  हमदर्द होकर  गालियों के बन रहे  सिरमौर हैं    यह दबंगों की   सबल, संपन्न  सत्ता-अंध क्रीड़ा  जब तुम्हारे बीच से  उठकर, तुम्हें धिक्कार देगी  आज के असहाय  जन की कसमसाहट  मुखर होकर  संगठित हो  एक दिन संघर्षमय  प्रतिकार लेगी    रोक सकते क्रूरता  तो रोक लो यह  आ रहे बदलाव के  अब दौर है आगे पढ़ें
भीड़ में भी तुम मुझे पहचान लोगे  मैं निषिद्धों की  गली का नागरिक हूँ    हर हवा छूकर मुझे  तुम तक गई है  गन्ध से पहुँची  नहीं क्या यन्त्रणाएँ  या किसी निर्वात में  रहने लगे तुम कर रहे हो जो  तिमिर से मन्त्रणाएँ    मैं लगा हूँ राह  निष्कंटक बनाने  इसलिए ठहरा हुआ  पथ में तनिक हूँ     हर क़दम पर भद्रलोकी आवरण हैं  हर तरह विश्वास को  जो छल रहे हैं  था जिन्हें रहना  बहिष्कृत ही चलन से  चाम के सिक्के  धड़ाधड़ चल रहे हैं    सिर्फ़ नारों की तरह  फेंके गए जो  मैं उन्हीं विख्यात  शब्दों का धनिक हूँ   मैं प्रवक्ता वंचितों का, पीड़ितों का  यातना की  रुद्ध-वाणी को कहूँगा  शोषितों को शब्द  देने के लिए ही  हर तरह प्रतिरोध में  लड़ता रहूँगा    पक्षधर हूँ न्याय  समता बंधुता का मानवी विश्वास का  अविचल पथिक हूँ आगे पढ़ें
चीखकर ऊँचे स्वरों में  कह रहा हूँ  क्या मेरी आवाज़  तुम तक आ रही है?   जीतकर भी  हार जाते हम सदा ही  यह तुम्हारे खेल का  कैसा नियम है  चिर -बहिष्कृत हम  रहें प्रतियोगिता से,  रोकता हमको  तुम्हारा हर क़दम है    क्यों व्यवस्था  अनसुना करते हुए यों एकलव्यों को  नहीं अपना रही है    मानते हैं हम,  नहीं सम्भ्रांत, ना सम्पन्न,  साधनहीन हैं,  अस्तित्व तो है  पर हमारे पास  अपना चमचमाता निष्कलुष,निष्पाप सा  व्यक्तित्व तो है    थपथपाकर पीठ अपनी  मुग्ध हो तुम  आत्मा स्वीकार से  सकुचा रही है    जब तिरस्कृत कर रहे  हमको निरन्तर  तब विकल्पों को तलाशें  या नहीं हम  बस तुम्हारी जीत पर  ताली बजाएँ  हाथ खाली रख  सजाकर मौन संयम    अब नहीं स्वीकार  यह अपमान हमको  चेतना प्रतिकार के  स्वर पा रही है आगे पढ़ें
तीन प्रकार के  अणुओं से मिलकर  बनता है हमारा रक्त पढ़ा था मैंने  विज्ञान की पुस्तकों में रक्त सुर्ख होता है रक्ताणु से और   प्रत्येक कोशिका तक पहुँचती है ऑक्सीजन श्वेताणु दिलाते हैं मुक्ति रोगों से और  बढ़ाते हैं प्रतिरोधक क्षमता बिम्बाणु कारगर है चोट में नहीं बहता है रक्त किंतु हज़ारों सालों के  इतिहास से शोध करके पाया है मैंने  ग़लत हैं विज्ञान की पुस्तकें विज्ञान की नज़र नहीं खोज पाई  चतुर्थ अणु को भारतीयों के रक्त में  इसी के आधार पर  ब्राह्मण सर्वश्रेष्ठ क्षत्रिय अतिश्रेष्ठ वैश्य श्रेष्ठ कहलाते हैं शूद्रों में भी पाया जाता है  न्यूनाधिक मात्रा में और किसी को शूद्र तथा किसी को महाशूद्र बना देता है श्रेष्ठाणु। आगे पढ़ें
छीनना चाहते हो  समस्त संसाधन मान-सम्मान और अधिकार बनाना चाहते हो एक बार फिर अपने पैरों की जूती।    डर है तुम्हें फिर ना पैदा हो चुनौती दे सकने वाला कोई शंबूक कोई एकलव्य कबीर और रैदास अम्बेडकर और बिरसा डर लगता है तुम्हें पेरियार और फूले से भी।   इसलिए लाना चाहते हो तुम फिर एक बार  रामराज्य किंतु  कैसे भूल गए तुम हमारी संस्कृति के रक्षक महाप्रतापी और बलशाली महिषासुर और  हिरण्याकश्यपु को जिन्हें हर वर्ष मार कर भी नहीं मार पाते तुम अरे मूर्खो! जिन्हें मार नहीं पाया तुम्हारा भगवान भी उन्हें तुम क्या मारोगे? हम समझते हैं अब तुम्हारे सब छल-कपट नहीं चाहिए  तुम्हारा रामराज्य इसलिए सुझाव मानो देश को संविधान से चलने दो रामराज्य को  रामायण में ही रहने दो। आगे पढ़ें
वह मैं ही था जिसने सौंप दिया अपना राज-पाट जंगल और ज़मीन तुम्हारे माँगने पर तीन पग में जानते हुए भी तुम्हारा छल-कपट।   वह मैं ही था छीन लिया जिसका जीवन तुमने  मात्र इसलिए कि भूलकर अपनी शूद्रता बन बैठा था मैं वेद-पुराणों का ज्ञाता तुम्हारे समकक्ष।   वह मैं ही था, जिसे नहीं दी गई शिक्षा तुम्हारे द्वारा किन्तु  तनिक लज्जा नहीं आई तुम्हें माँगते हुए गुरुदक्षिणा की भीख और हँसते हुए दिया मैंने अपना अँगूठा।    वह मैं ही था जिसे मजबूर किया तुमने नीच कर्म करने पर किंतु मैंने सिखाई तुम्हें निर्गुण भक्ति समृद्ध किया तुम्हारा साहित्य।    वह मैं ही था  जिसे नहीं दिया तुमने ज्ञान का अधिकार कभी बैठने नहीं दिया विद्यालय में हाथ नहीं लगाया कभी मेरी पुस्तकों को फिर भी ज्ञानार्जन कर अपने बल पर मैंने दिया तुम्हें संविधान।    वह मैं ही हूँ भोग करते रहे तुम जिसके श्रम… आगे पढ़ें
मेरा रंग रूप नैन नक़्श  बल, बुद्धि और प्रकृति  थोड़ी बहुत भिन्न हो सकते हैं  परन्तु फिर भी मैं हूँ तुम्हारे जैसा यहाँ तक कि दुनिया में तुम्हारी ही तरह आता और जाता हूँ फिर कैसे  मैं हिन्दू तुम मुसलमां मैं सिक्ख और तुम ईसाई?   मेरे जैसे होने के बाद भी तुमने नहीं छोड़ा मेरे लिए  कुछ भी समस्त संसाधनों पर  करके अपना अधिकार आज तुम पूँजीपति और मैं निर्धन मेरे हिस्से को खाकर मेरे ऊपर ही अत्याचार करते हुए क्या तुम्हें थोड़ी भी शर्म नहीं आती?   तुम्हारे जैसा ही रक्त  बह रहा है मेरी धमनियों में फिर भी  घोषित कर रखा है देवता तुमने अपने आपको और मुझमें तुम्हें मानव भी दिखता नहीं एक ख़ून सनी योनि से बाहर आकर भी तुम कैसे सर्वश्रेष्ठ और मैं नीच तुम ब्राह्मण देवता और मैं दलित-शूद्र?   मैं जन्म देती हूँ तुम्हें फिर भी तुम्हारे समकक्ष नहीं कभी… आगे पढ़ें
सुना है मैंने   वो करता है पैदा मुझे  अपने पैरों से क्योंकि उसका मस्तिष्क  काम नहीं करता उसकी छाती  कर देती है मना फटने से सिकुड़ जाती है नसें  नाभि मार्ग की जननेन्द्रियाँ हो जाती है अवरुद्ध।    चलो पैरों से ही सही पैदा तो उसने ही किया था ना? फिर सुध क्यों नहीं ली कभी मेरी फेंक दिया क्यों मुझे किसी निरीह की भाँति भूखे भेड़ियों मांस नोचने वाले गिद्धों आवारा साँड़ों और नरपिशाचों के बीच जब मन हुआ इन भेड़ियों ने किया मेरा शिकार मेरा मांस नोच-नोच कर भरी इन गिद्धों ने ऊँची-ऊँची उड़ानें मार-मार कर सींग हटाया मुझे अपने रास्ते से इन आवारा साँड़ों ने पी कर मेरा लहू  लाल हुए गाल इन नर पिशाचों के और मैं तड़प-तड़प कर पुकारता रहा उसे क्योंकि सुना था मैंने दौड़ा चला आता है वो दीन-हीनों की पुकार पर फिर मेरी पुकार पर कभी  क्यों नहीं आया… आगे पढ़ें
जाति नहीं है अनुशासन न ही यह कोई व्यवस्था है यह ख़ालिस अराजकता  गयी परोसी थाली में घूँट-घूँट में गयी पिलायी ये ज़हर था यह नहीं था पानी!   हाथ हथौड़े, क़लम नहीं था बहा पसीना खाता था रक्त नहीं चूसा है मैंने न ही मैं परजीवी। मैं सूरज था मुझसे तेरे खेत-खलिहान तुम लगा रहे थे मुझे ग्रहण। मैं मौन खड़ा समय की सीढ़ी पर देख रहा था वर्ण प्रपंच।   तुम लिख रहे थे गणित समय का मैं भी मानक और इकाई था फिर भी ज़िक्र नहीं मेरे होने का?  ये सृजन नहीं सियासत थी!           अनामिका अनु              'दलित' कविता              हंस पत्रिका (दलित विशेषांक)  हम मानव एक निश्चित गुणसूत्र संख्या के साथ पैदा होते हैं। हम सब की मूलभूत आवश्यकताएँ भी एक सी हैं। मानव रूप में जन्म लेते ही मानवाधिकार हमें… आगे पढ़ें
पहले समाचार चैनलों के माध्यम से लोगों को सूचनाएँ प्राप्त होती थीं। आज देखने को मिलता है कि लोगों के माध्यम से समाचार चैनलों को सूचनाएँ प्राप्त हो रही हैं। कई बार यह जानकारी समाचार चैनलों तक फ़ेसबुक, ट्विटर या किसी अन्य सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म के ज़रिए ही पहुँच पाती है। रिपोर्टिंग को लगभग समाप्त कर दिया गया है। रिपोर्टिंग का स्थान सोशल मीडिया ने ले लिया है। इस सोशल मीडिया में दलित समाज की स्थिति को देखने, समझने के लिए हमें कई पहलुओं पर ध्यान देना होगा।  ग़रीब का जीवन अत्यंत दुरूह होता है लेकिन ग़रीबों में भी यदि आप दलित हैं तो जीवन जीना और भी दुश्वार है। पग-पग पर कठिनाइयाँ आपका पीछा करती रहती हैं। कोरोना महामारी ने दलितों के जीवन को और भी संकटपूर्ण बना दिया है। इस लेख में हम दलित जीवन के संकट पर बात करते हुए कोरोना महामारी में उनकी स्थिति… आगे पढ़ें
प्रेषक: सतीश खनगवाल भारतीय समाज की बुनावट में आरंभ से ही परम्पराओं और प्रथाओं का विशेष योगदान रहा है। यही हमारी सांस्कृतिक धरोहर भी रही है। लोकगीतों की गूंज तो जर्रे-जर्रे में रही है। बकौल कमलेश्वर लोकगीत दलितों की विरासत है। उन्हीं लोकगीतों और लोक कथाओं की गुम होती चली जा रही अस्मिता और पहचान को खोजने के लिए हाशिए से केन्द्र में तेजी के साथ आ रही है। आज नई पीढ़ी तत्पर है। देखा जाए तो भगवान बुद्ध के सामाजिक न्याय के सिद्धांत की डोर को मध्यकाल के संतों/फकीरों/और सिद्धों ने फिर से पकड़ा था। रविदास से ही हीरा डोम, हीरा डोम से अछूतानन्द और अछूतानन्द से बाबा साहेब डॉ. अम्बेडकर और डॉ. अम्बेडकर से मान्यवर कांशीराम आदि ने जन-जन को जाग्रत करने का प्रयास किया था। वे हमारे इतिहास पुरूष हुए हैं और सामाजिक बदलाव के सूत्रधार भी। उनसे हमें प्रेरणा भी मिलती रही है।  … आगे पढ़ें
हम सब जानते हैं, दलित साहित्य का आविर्भाव दलित तबके को द्विजों द्वारा सदियों से मिलती आई हकमारी से उपजी खुदमुख्तारी की एसर्टिव भावना के तहत हुआ है। लोकतंत्र के मानवाधिकारपूर्ण सामाजिक सेटअप में इस अनिवार हस्तक्षेप का आना लोकतंत्र को पूरता है। अँगरेज़ शासन कालीन जमाने के भारत से ही अभिव्यक्ति के औजार एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के जो कुछ अवसर देश की उत्पीड़ित-वंचित जन को मिले हैं उनमें देश में ‘उदार’ एवं निहित स्वार्थी दोनों तरीके के विदेशी शासकों-प्रशासकों एवं अन्य वर्चस्वशाली वर्गों की मदद का प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष बड़ा हाथ रहा है। शिक्षा अथवा ज्ञान के जो व्यवस्थित संसाधन और औजार भारतीय परम्परा से आए उनपर संस्कृति एवं शासन के पहरुओं अर्थात राजन्य या कि शक्तिशाली वर्ग से आने वाली मुट्ठीभर सूक्ष्मसंख्यक प्रभु जातियों का कब्ज़ा था तथा इस शिक्षा-ज्ञान का ओरिएंटेशन प्रभु वर्ग के हितों के अनुकूल था। समाज के सवर्णवादी एवं ब्राह्मणवादी कुचक्रों… आगे पढ़ें
कुत्ते की दुम कभी सीधी नहीं हो सकती  उससे भी टेढ़ी सनातन धर्म  और उसकी सड़ी-गली व्यवस्था है  जिसे अपनाने के लिए सदियों से  तिरस्कृत समाज व्याकुल है  गर्त में मिलाने वाला यह धर्म  जादुई छड़ी से लोगों को दिशा भ्रमित कर  पूजा पाठ में लीन कर रहा है  पहले तो नफ़रत ऐसी की  कि विकास और सभ्यता से दूर  अलग बस्तियाँ बनाई  उस में कीड़े मकोड़े सा बिलबिलाता रहा दलित  शिक्षा के बल पर उस गली से बाहर निकला  तो जादुई छड़ी उसके सिर पर ऐसी घूमी  कि अपना रास्ता ही भूल गया  और मूर्खो, तुम्हें पूजना है  तो बुद्ध, ज्योतिबा फुले   बाबा अंबेडकर और कबीर को पूजो  जिन्होंने तुम्हारी आँखों में रोशनी डाली है। आगे पढ़ें
तुम कहाँ हो  वह देखो छप्पर पर बहा जा रहा आदमी  दूसरे छप्पर पर साँप बिच्छू  गाँव पूरा उजाड़ हो गया बाढ़ में  मेरा खेत मेरी किताब  मेरी माँ की कुर्ती कहाँ है  ओखल जिस में धान कूटती थी माँ  कितना भारी है  वह भी बाहर जा रहा है  मैं टुकुर-टुकुर ताकती हूँ  पूरा सन्नाटा पसर गया है  बाढ़ से कई गाँव बाढ़ में  विलीन है अब कहाँ है काला गोरा पवन सूत इसमें  सभी एक इसमें सभी एक हो गए हैं आगे पढ़ें
परिचय करवाया किस्कू जी ने, "दुमका में हिंदी अफसर हैं मैडम शालू।"  उसमें से कुछ लोग पढ़े-लिखे थे, कुछ कम पढ़े-लिखे, कुछ अनपढ़। औरतें एकदम अनपढ़। अपनी आदिवासी भाषा में बातें कर रही थीं। शालू को किस्कू साहब की पत्नी सरल स्वभाव की लगीं। बेटे भी ढंग के लगे। परंतु बेटियाँ बातूनी एवं चंट स्वभाव की लगीं। तीन की पढ़ाई-लिखाई कम हो पाई थी। जल्दी शादी करके उनकी पत्नी आश्वस्त होना चाहती थीं।  बेटियों से परिचय उनकी पत्नी ने करवाया, “ये बड़ी कनक, इसके तीन बच्चे हैं। ये मँझली बिजली, इसके चार बच्चे हैं। इसका पति बेरोज़गार है। यहीं रहती है। बाक़ी तीन छोटी हैं। अभी पढ़ रही हैं। बेटे भी पढ़ रहे हैं। भई, खाना खिलाओ। थकी-माँदी आई हैं। खाना खा कर आराम भी करेंगी।”  पत्नी खाना लाने गई। किस्कू जी बैठकर त्यौहार के बारे में बताने लगे, “सरहुल पर्व धान कटने के बाद ख़ुशी से मनाया… आगे पढ़ें
कुछ अंश पृष्ठ- १६० से १७२ मकान किराये पर लेने की भी बहुत लम्बी कहानी है। बहुत दिनों तक, कितने महीनों तक हम किराये के मकान की खोज में भटकते रहे। किराये का मकान ढूँढ़ते समय हमें हर जगह अपनी जाति बतानी पड़ी। हम अपनी जाति वाल्मीकि बताते थे। महाराष्ट्र प्रान्त में कुछ लोग ‘वाल्मीकि’ नाम से हमारी जाति के वर्ण और जातिभेद के स्तर को नहीं समझ पाते थे, तब वे हमें दो-चार दिन के बाद आने के लिए कहते। दो-चार दिन में वे ‘वाल्मीकि रहस्य’ को जान लेते, तब दोबारा उनके पास जाने पर उनका टका सा जबाब मिलता - "मकान किराये पर नहीं देना है।" "आप हमारे मकान में कैसे रह सकते हैं?" "वाल्मीकि कहकर आप हमें बेवकूफ़ बना रहे थे?" कई बार इस तरह की बातों से शर्मिंदा होना पड़ा था। हम जलालखेड़ा क्षेत्र के गौलीपुरा में एक मकान देखने गये। मकान में गाय… आगे पढ़ें
वर्ण व्यवस्था के पृष्ठपोषक हैं द्युपितर1  श्रमिक हैं प्रमथ्यु2 यहाँ  युगों से अंधविश्वास, अशिक्षा और सुरक्षा के बीच  हम प्रमथ्यु को भूलते देखते रहे  उफ़ तक नहीं किया  अब प्रमथ्यु जाग गया है  जाग गई है मानवता  लोग पोंगा स्वर में अलापते हैं  पहले ही अच्छी थी व्यवस्था  पहले जो द्युपितर कहता था  लोग सहर्ष स्वीकारते थे  अब प्रमथ्यु जन-जन को जगा रहा है  जगा रहा है सोए क़बीले को  मुसहर, डोम, ढाढ़ी को  युगों से सफ़ेद स्वच्छ कपड़े  द्युपितर के अलावा हम नहीं पहन सकते थे  नहीं रह सकते थे अच्छे मकान में नहीं खा सकते थे  अच्छा, स्वादिष्ट, स्वच्छ, ताज़ा भोजन  अब सब कुछ नकारने के लिए  प्रमथ्यु जाग रहा है, जाग रहा है। 1. मिथकीय मनुवादी सवर्ण राजा 2. मिथकीय दलित श्रमिक, आगे पढ़ें
दूसरे का घर बनाने में  अपना ही घर नेस्तनाबूत कर देना कितना बेमानी है सच को सच नहीं कह  झूठ को चूमना है कसैले फल जैसा फल के कसैलेपन से  पिच सा थूक फेंकना  मगर फेंकते नहीं घोट लेते हैं  यही झूठ की मूठ से  पूरा घर मटमैला हुआ पड़ा है।   मैंने कई बार अपने अंतर्मन को  दबाकर  बिना दीवारों के घर को  घर बनाया है  सजाया है  लोगों को दिखाया है  अपना मन  मगर, विचित्र साथ है  अनमेल भाव का  बिना खेल का खेले ही हमसे  हमारे घर को  मिस1 देती भावना  भला इतिहास क्या माफ़ कर देगा  नहीं! नहीं!  मैं भीतर की घुटन को  लीलता हूँ  सूँघता हूँ अपने घर को  ताकि लोगों को लगे  मैंने घर की मटमैली दीवार को  ओढ़ लिया है  और ओढ़ता ही रहता हूँ हर क्षण  यद्यपि कई दाग़ हैं उनपर  बल्कि दाग़ ही दाग़ हैं  फिर भी अपना घर… आगे पढ़ें
इतिहास बदलने की बातें कर  कितनी बाह्य ख़ुशी मनाओ  भीतर के घाव को दबाओ  इतिहास ऐसे नहीं बदलता मेरे दोस्त  छल से बातें बना कर  इतिहास बदलने की बातें बेमानी है  भीतर में ज़हर है  बाहर निर्मल पानी है  मनुष्य में जन्म लेने की सार्थकता  तुमने जानी है?   इतिहास बदलते हैं  बेचारे परिश्रम कर श्रमिक लोग कभी भी समय का नहीं करते दुरुपयोग  समय के तक़ाज़े को महसूसते हैं  लोहा, हीरा, कोयला, चाँदी, अभ्रक कल कारखाने में  बोते हैं श्रम के बीज  इतिहास बदलते हैं  देश विदेश में जाता है उनका श्रम  श्रम का फल वे नहीं जानते कल छल बल  वे समय को पहचानते हैं  अपनी सीमा को शक्ति भर  इतिहास बनाते हैं  इतिहास उन्हें नहीं भूल सकता  क्यों श्रम से सींचा गया  सुस्वादु इतिहास अच्छा होता है  मोहनजोदड़ो, हड़प्पा की संस्कृति  इसीलिए थाती है  वहाँ श्रम-श्रमिक की दीया बाती है। आगे पढ़ें
पथरीली चट्टान पर हथौड़े की चोट  चिंगारी को जन्म देती है  जो जब तब आग बन जाती है  आग में तप कर लोहा नर्म पड़ जाता है  ढल जाता है  मन चाहे आकार में  हथौड़े की चोट से  एक तुम हो  जिस पर  किसी चोट का असर नहीं होता। आगे पढ़ें
शिखरों पर चढ़ने की लालसा  पैर फिसलने से नीचे खिसक आती है  अदम्य उत्साह  बुलंद हौसला  मैं सरपट दौड़ना चाहता हूँ  पहाड़ की चोटियों पर  दुख, पीड़ा, दर्द, यंत्रणा, यातना  मेरे सहयोगी हैं  सच कहता हूँ सहयोगी हैं  आज इतनी दूरी पर हूँ  तुम देख रहे हो  यही सहयोगियों की कृपा से  यातना की रपटीली आग  मुझे धू धू जलाती रही है  मैं रपटीली आग में भी  ठंड महसूस करता हूँ  आओ तुम भी साथ मेरे  नहीं आओगे तो  देखो उजली आग अब मत सोओ  खुल रहा राग। आगे पढ़ें
दुख और पीड़ा के अग्नि स्नान के बाद  गीले अनुभवों की तौलिया लिए पोंछता हूँ मानस पटल कंकड़नुमा चुभन  रेत भरे घाव टीसते हैं हाय! अपनी विवशता घिसती है कोई भी क्षण अंदर में आ कर फुंफकार दे  कोई भी क्षण। आगे पढ़ें
मैं जानता हूँ, मुझे बराबर उलाहना-परतरा लोग देते रहे हैं, गोया कि आदमी न होकर अन्य जीव हूँ। फिर भी मैं हार नहीं माना हूँ, नहीं मान रहा हूँ क्योंकि मुझे मालूम है तनिक सा परिश्रम मुझे अभी नहीं करना है। अभी तो ढेर सारे संघर्ष मुझे करने हैं। मुझे क़तई दुख नहीं कि पीएचडी-रिसर्च मुझे करने नहीं दिया गया। मुझे बराबर जाति-पांति के पचड़े के कारण टकराना पड़ा है। अच्छा भी है। एक दूसरे को जब तक नहीं जानते तब तक ख़ूब गोल-गोल बातें होती हैं लेकिन ज्यों ही जाति की गंध लोगों को मिलती है लोग मुँह सूअर जैसा निपोरने लगते हैं। जाति की गंध टाइटिल से मिलती है। यदि टाइटिल नहीं है तो रंग, पहनावा पर धावा बोलते हैं। मेरे शरीर में ज़हर फैल जाता है जाति के ठेकेदारों द्वारा जाति पूछे जाने पर। इस समय मैं अपने को अकेला समझ रहा हूँ, फिर भी… आगे पढ़ें
हिंदी में दलित साहित्य और दलित दर्शन की इधर खूब चर्चा हो रही है और राजनीति के समान ही साहित्य में भी दलित राजनीति उसके केंद्र में आ रहे हैं। दलितों के मसीहा डॉ. अंबेडकर ने अपने अनुयायियों के साथ ’मनु स्मृति’ को जलाकर तथा इधर ’भारतीय दलित साहित्य अकादमी’ ने प्रेमचंद के प्रसिद्ध उपन्यास ’रंगभू्मि’ का दहन करके दलित समाज की राजनीति तथा साहित्यिक मापदंडों के प्रश्नों को राष्ट्रीय चिंतन का विषय बना दिया। ऐसी स्थिति में बौद्धिक एवं साहित्य कला के क्षेत्र में डॉक्टर अंबेडकर के बाद लेखकों की एक ही सामने आए जिसमें कबीर को दलित धर्म का प्रणेता- प्रवर्तक घोषित किया, दलित संत कवियों में दलित जीवन के तत्व खोजे और आधुनिक दलित चेतना के लिए डॉक्टर अंबेडकर के साथ ज्योतिबा फुले, नारायण गुरु, पेरियार रामास्वामी नायकर, स्वामी अछूतानंद, चाँद गुरु एवं गुरु घासीदास आदि को श्रेय दिया, लेकिन डॉक्टर अंबेडकर के दलित चिंतन… आगे पढ़ें
समकालीन हिन्दी दलित साहित्य क्षेत्र में सुशीला टाकभौरे का अपना महत्वपूर्ण स्थान है। उन्होंने अपने जीवन के भोगे हुए यथार्थ को बड़ी ताज़गी के साथ रचनाओं में अंकित किया है। उन्होंने अपनी रचनाओं में दलित समाज के बच्चे, बूढ़े, युवा-युवतियों, सभी वर्ग का प्रतिनिधित्व बड़ी क्षमता के साथ किया है। उनकी कहानियाँ यथार्थ के धरातल पर समाज का प्रतिनिधित्व करने के साथ दलित चेतना के विकास में भी सक्षम है। उनकी रचनाएँ स्वानुभूतियों का जीवंत दस्तावेज़ है। उन्होंने स्वयं सामाजिक विषमता का ज़हर पिया है, परिमाणतः दलित यातना से रूबरू कराती उनकी रचनाएँ प्रबल आक्रोश के रूप में फूट पड़ती है। दबी-कुचली मानवीय संवेदना को आंदोलित करती है और उन्हें क्रान्ति की पहल द्वारा अपनी समस्याओं का समाधान तलाशने में प्रेरित करती है। उनकी प्रमुख रचानाएँ हैं :- कहानी संग्रह – ‘संघर्ष’ (2006), ‘अनुभूति के घेरे’ (2011), ‘टूटता वहम’ (2012) काव्य संग्रह – ‘स्वाति बून्द और खारे मोती’,… आगे पढ़ें
कुछ वर्ष पहले बीती हुई यह बात सोचने पर ऐसी लगती है ऋण मानों बस कल ही घटित हुई हो, यूनेस्को की टीम का एक व्यक्ति उस साल मात्र इसी काम के लिए आया था कि चेक देने के पहले वह औरईआ गाँव की उस लड़की से स्वयं मिलना चाहता था, उसकी स्थिति को अपनी आँखों से देखना चाहता था।  इसी सन्दर्भ में मिस्टर जोसफ से मीटिंग के दौरान पहली बार मिलना हुआ था। मीटिंग में इस सबसे ज़रूरी मुद्दे के अलावा और भी कई एजेंडे थे, उस दिन घंटों चलने वाली उस मीटिंग के दौरान न जाने कितने नए-पुराने केसेज़ को निपटाया गया था।  चिरैयाटांड पुल से एग्ज़ीबीशन रोड चैराहे तक जाने वाली सीधी सड़क पर बाईं ओर सातवीं बिल्डिंग की तीसरी मंज़िल पर स्थित था हमारा वह मीटिंग हाल। उसी हाल में सरकारी-ग़ैरसरकारी, सभी लोग घंटों बैठे रहे, बातें,  बहसें, मुद्दे, एजेंडे। अंत में जब मीटिंग… आगे पढ़ें
उपन्यास अंश- लट्ठे कपड़े जैसा घुटा मेघ, सेठजी की फिक्र का सबब था। मेघों की घुमड़ बिजली की कड़क, सेठजी का दिल धड़कने लगता। मेह बरस गया तो नींव में पानी भर जायेगा। ना साँप पकड़ा जाएगा, ना नींव रखी जाएगी। बादलों का कोई वजूद नहीं होता। वे तो हवा के रुख तितर-बितर, घुटते-छंटते हैं। हवा दो-चार झोंकें ऐसे आए, बादल तितर-बितर हो गये और आसमान मटमैली चादर-सा दिखने लगा था। सेठजी के फाख्ता हुए होश लौट आए थे। सेठजी गाड़ी से उतरे, आँखों पर चश्मा चढ़ाये, धोती के छोर अँगुलियों की चिकौटी से उठाये। लखीनाथ गाड़ी से उतरा, अपनी टोकरी लिये, बाँहें संगवाये। दोनों की आँखें एक साथ उधर गईं। नींव के बिल में घुसे नाग को देखने वालों का ठट्ठ का ठट्ठ जुड़ा था। चिहुंकें हुईं– "सपेरा आ गया। सपेरा आ गया। साँप पकड़ेगा। साँप पकड़ेगा। टोकरी साथ लाया है, ले जाएगा बंद करके।" आवाज़ें सपेरे… आगे पढ़ें
आजकल देश की सभी भाषाओं में दलित साहित्य लिखा जा रहा है। हिंदी में भी गंभीर दलित साहित्य लेखन हो रहा है। हिंदी में दलित साहित्य एक प्रकार का विरोध, आक्रोश और क्रोध का साहित्य है। इस में समाज से बहिष्कृत किये जाने का, समाज के द्वारा पीड़ित हो जाने का ज़िक्र है। सवर्ण समाज के द्वारा सदियों से उन्हें हाशिये पर रखे जाने के बाद दलित उस रूढ़ बंधन से निकलने की कोशिश में हैं। उस संघर्ष से हम दलित साहित्य में रूबरू होते है। उस संघर्ष में समानता, समरसता और सामाजिकता का आग्रह दिखाई देता है। कविता की विधा में भी गंभीर लेखन हो रहा है। दलित के शोषण के दो मुख्य कारण है; ग़रीबी और अशिक्षा। हीरा डोम अपनी कविता ’अछूत की शिकायत’ में भगवान से शिकायत करते हैं कि आप प्रहलाद, गजराज, विभीषण और द्रौपदी की रक्षा में तत्परता दिखाते है; हम ने ऐसा… आगे पढ़ें
कंधे पर लटके गमछे के एक छोर से पसीने से लथपथ शरीर को पोंछते दामू हेम्बरम, जून की उमस भरी दोपहर में, खेत किनारे स्थित बबूल के छाँव तले आकाश की ओर टकटकी लगाये कुछ यूँ बुदबुदाते हैं– "नेस हों ओकोय बड़ाय चो कम गेये दागा, नोवा सेरमा बोरसा चासोक् दो नित काते मुसकिल एना, (शायद, इस साल भी वर्षा कम होगी, आज के समय में मौनसून के भरोसे खेती करना मुश्किल हो गया है)  नोवा दिसाम रे संविधान बेनाव काते आयमा सेरमा पारोम एना, मेनखान ओकोयटाक् सोरकार हों आदिवासी लागित बेनाव कानून ऑटोनॉमस कॉन्सील अनुसूचित क्षेत्र रे बाङ को एहोप् लेदा  आर ओना रेयाक् दोसा गे नित नोंडे दाक्, सड़क, हाटिया, इसकुल, हासपाताल, रेयाक् चेत् बेबोसथा गे बानुक्आ  (इस देश के संविधान बने कई साल बीत गये, परन्तु, आदिवासियों के अनुसूचित क्षेत्र के लिए निर्मित कानून "ऑटोनॉमस कॉन्सील" देश के किसी भी सरकार ने लागू नहीं किया,… आगे पढ़ें
अमित जी को ग्रामीण अंचल के उस विद्यालय में स्थानांतरित हुए एक सप्ताह ही हुआ था। मध्यांतर में सभी शिक्षक "स्टाफ़ रूम"एकत्रित होकर चाय पिया करते थे। आज जब सभी शिक्षक आ गए तो अमित जी बोले, "मैं बहुत दिनों से देख रहा हूँ की अंतर सिंह जी का कप हम सबसे अलग रहता है... मुझे यह उचित नहीं लगता।" यह सुनकर कुछ शिक्षक उनसे बहस करने लगे। बात को गंभीर होता देख कर अंतर सिंह जी बोले, "अमित जी! आप मेरा पक्ष कहाँ कहाँ लेंगे? मैं शिक्षक हूँ, लेकिन कुएँ पर मुझे दूर से पानी दिया जाता है! आप ही बताइए, मैं आप लोगों के समान ऊँचे कुल में नहीं जन्मा, तो इसमें मेरा क्या दोष है..??" उनकी आवाज़ भारी हो गई। इतने में भृत्य चाय की केतली लेकर आ गया और टेबल पर कप जमाने लगा। अंतर सिंह जी अलमारी में रखा अपना कप उठाने को… आगे पढ़ें
भारतीय परिदृश्य में क्या बदलाव हुए हैं? कैसे बदलाव हुए हैं और कब से हुए हैं? उन बदलाव का समाज और साहित्य पर क्या प्रभाव पड़ा है? ख़ास कर दलितों, पिछड़ों, आदिवासियों और स्त्रियों के संबंध में। यूँ तो समाज में समय-समय पर बदलाव स्वाभाविक रूप से होते रहते हैं, जैसे– खान-पान, रहन-सहन, वेश-भूषा, मौसम, विचार इत्यादि के स्तर पर। इसके अनेक कारण हो सकते हैं जैसे– कुछ सामाजिक, कुछ आर्थिक, कुछ शैक्षिक, कुछ सांस्कृतिक कुछ राजनैतिक या कुछ प्राकृतिक हो सकते हैं। उन सबका मानव जीवन पर न्यूनाधिक प्रभाव पड़ता ही है क्योंकि मनुष्य सामाजिक प्राणी है। आज न सिर्फ़ भारत में बल्कि दुनिया के लगभग सभी देशों में कोविद-19 महामारी प्राकृतिक आपदा के कारण सबकी दिनचर्या बदल गयी है। मध्यम और उच्च वर्ग के लोगों के काम करने के तरीक़ों में सबसे बड़ा बदलाव यह आया है कि हम वर्क फ़्रॉम होम के धीरे-धीरे अभ्यस्त हो… आगे पढ़ें
जाति-व्यवस्था और जातीयता के संघर्ष वर्तमान भारत के लिए चुनौती है। इसे लेकर इतिहासकार चाहे पुराणों, स्मृतियों और महाकाव्यों के बारे में कोई भी राय रखें पर भारतीय जनमानस और सत्ता वर्ग आज भी उन्हीं के अनुसार व्यवहार करता दिखाई देता है। समाज में निरन्तर बढ़ती जातीय संघर्ष की घटनाएँ, जाति के आधार पर होने वाला उत्पीड़न इस बात का सबूत हैं। भारत में जाति-व्यवस्था के इतिहास और इसके विकास क्रम को समझना हमारे वर्तमान के लिए बहुत ज़रूरी है वरना हम अपने वर्तमान में बढ़ते इस जातीय संघर्ष को नहीं रोक पाएँगे। यह एक बड़ी चुनौती भी है। इतिहासकारों को इस मुद्दे को अपने हाथ में लेना ही होगा और जाति और वर्ण के वर्तमान और इतिहास को उसके वास्तविक रूप में ढूँढ़ कर निकालना ही होगा। जाति और वर्ण जो प्राय: एक ही अर्थ के द्योतक माने जाते हैं पर ये एक दूसरे के पर्याय नहीं… आगे पढ़ें
पितृसत्तात्मक ब्राह्मणवादी समाज में पढ़ना और लिखना, तथा लिख-पढ़ कर रचना (साहित्य-लेखन), इन क्षेत्रों में सवर्ण पुरुषों का ही घोषित विशेषाधिकार रहा है। जब इस आरक्षित क्षेत्र में दलितों और स्त्रियों ने प्रवेश करना चाहा तो स्थापित स्वनामधन्य साहित्यकारों की ओर से यह प्रश्न आया कि स्त्रियों और दलितों पर पहले ही से लिखा जाता रहा है और दूसरा कि इन नए-नए लेखनी चलाने वालों की लिखंत में ऐसी क्या ख़ास बात है कि उसे साहित्य और इन्हें साहित्यकार की संज्ञा दी जा सके? इस प्रश्न के जवाब में दलितों और स्त्री साहित्यकारों ने यह कहा कि हमारे द्वारा लिखा गया साहित्य स्वानुभूति का साहित्य है और आपके द्वारा लिखा गया साहित्य सहानूभूति का साहित्य है इसलिए हमारे द्वारा लिखा साहित्य आपके द्वारा लिखे साहित्य से भिन्न है और क्योंकि अनुभूति की प्रमाणिकता का परचम हिन्दी साहित्य के क्षेत्र में पहले ही फहराया जा चुका था इसलिए सीधे-सीधे… आगे पढ़ें
दलित लेखन एक एसा विषय है जिस पर बिना बात किये नहीं रहा जा सकता है। भारत में सबसे अधिक किसी वर्ग पर अत्याचार हो रहे हैं वह है – दलित और पिछड़ा समाज। दलित किसी धर्म का हो सकता है जिसके साथ अमानवीय व्यवहार किया जाता हो, जिसे न्याय पाने में कठिनाई आ रही हो। जब ऐसे समाज के रचनाकार अपनी क़लम से लिखेंगे तो जीवन की सच्चाई को लिखेंगे, न कि बनावटी और दिखावटी यथार्थ को प्रस्तुत करेंगे। वह जिए हुए सच को अपनी रचनाशीलता में नया आयाम देने का प्रयास करेंगे। ऐसे में उनका पूर्ववर्ती लेखन से भिन्न होगा। वह कल्पना की उड़ान की निजता नाम मात्र की होगी। दलित कथा लेखन की परंपरा प्रेमचंद से अवश्य प्रारंभ होती है लेकिन दलित लेखकों द्वारा यह विधिवत परंपरा महीप सिंह द्वारा संपादित पत्रिका सारिका के 1982 से प्रारंभ होता है। किंतु इसके पूर्व चाँद पत्रिका का… आगे पढ़ें
भारतीय साहित्य की सभी भाषाओं में लगभग एक ही समय पर दलित साहित्य का सूत्रपात हुआ। अस्मितामूलक विमर्शों के दौर में, दलित साहित्य अस्मिता और अस्तित्व दोनों के संकट को जीवित अनुभव के रूप में प्रस्तुत करता है। जाति के प्रश्न पर सदियों से चली आती असमानताएँ भारतीय जन समाज में इस तरह विन्यस्त हैं कि एक बड़ा वर्ग हाशियाकृत उपस्थिति में जीवन जीने को विवश है। जातिवाद का सबसे भीषण संकट स्पर्श-जनित है। अस्पृश्यता एक ऐसा अभिशाप है जिससे मुक्ति के लिए सामाजिक संरचनाओं में व्यापक परिवर्तन अपेक्षित है। संवैधानिक व्यवस्था हर नागरिक के लिए बराबरी के अधिकार को सुनिश्चित करती है लेकिन सामाजिक संरचनाएँ भेदभाव को ख़त्म नहीं होने देतीं। सशक्तिकरण की अनेक तदबीरों में साहित्य की महत्वपूर्ण भूमिका बनती है। दलित साहित्य इसी आकांक्षा का मूर्तिमान रूप है। आज़ादी  के बाद(भी) और आज़ादी के बावजूद दलित-जीवन के अंधकारमय पृष्ठों से यातना और संघर्ष की इबारत… आगे पढ़ें
दलित साहित्यकार ओमप्रकाश वाल्मीकि का जन्म 30 जून, सन् 1950 को उत्तर प्रदेश के मुजफ्फर नगर जनपद से जुड़े बरला नामक गाँव में हुआ। यह एक दलित परिवार था, जो कि अत्यंत निचले और निम्न पायदान पर था। इनका बचपन काफ़ी सामाजिक और आर्थिक कठिनाइयों में बीता। माता-पिता के स्नेह के अतिरिक्त सम्पूर्ण जीवन कष्टप्रद और संघर्षमय रहा। बचपन से ही लेखक ने दलित जीवन की पीड़ा को झेला। प्रारम्भिक शिक्षा बरला से विकट परिस्थितियों में प्राप्त करते हुए शिक्षा के क्रम को निरन्तर ज़िल्लत, शोषण तथा अर्थाभाव सहन करते हुए जारी रखा। इन्होंने तकनीकी शिक्षा जबलपुर, मुम्बई से ग्रहण की तथा विषम परिस्थितियों का सामना करते हुए एम.ए. हिन्दी की परीक्षा गढ़वाल विश्वविद्यालय, श्रीनगर से उत्तीर्ण की। ओमप्रकाश वाल्मीकि बचपन से ही अध्ययनशील और चिंतक व्यक्ति रहे। साहित्यिक क्षेत्र में इन्होंने अनेक महत्वपूर्ण कृतियों का सृजन किया। सन् 1997 में प्रकाशित ‘जूठन’ आत्मकथा के माध्यम से ये… आगे पढ़ें
डॉ. लक्ष्मीमल्ल सिंधवी ने अपनी पुस्तक ‘भारत और हमारा समय’ में इस बात का उल्लेख किया है कि ‘भारत से बाहर मैंने कई अप्रवासी भारतीय देखें है। उनकी भारतीयता से बहुत गहरे तक प्रभावित भी हुआ। किन्तु यहाँ आकार बहुत दु:खद और दयनीय त्रासदी मुझे दिखाई देती है कि भारतवर्ष में ही कई प्रवासी अभारतीय हैं।’ उनकी चिंता भारतीय भाषाओं, विशेषत: संस्कृत और संस्कृति को लेकर थी। किन्तु उनके शब्द ‘भारत में प्रवासी अभारतीय’ बहुत कुछ कहते हैं। यदि भारतीयता भारत भूमि पर रहने वाले सभी लोगों की भावनाओं को समावेशित करके बनती है तो केवल वेद, पुराण आदि की परंपरा के निर्वाह पर ही ज़ोर क्यों है? इसमें कुरान, बाइबिल और त्रिपिटक की उपेक्षा क्यों है? क्या वर्ण-जाति-व्यवस्था और तदजनित ऊँच-नीच, अस्पृश्यता के रहते भारतीयता की किसी अवधारणा की कल्पना की जा सकती है? शायद नहीं, शायद नहीं, कदापि नहीं। इसी तरह सामप्रदायिक भेदभाव और घृणा के… आगे पढ़ें
शहर में चारों ओर स्वामी स्वरूपानंद के पोस्टर लगे थे। सभी प्रमुख सड़क, रास्ते और स्थान स्वामी स्वरूपानंद के बड़े-बड़े होल्डिंग, बेनर और पोस्टरों से अटे पड़े थे। धार्मिक लोगों में स्वामी स्वरूपानंद की समरसतावादी कथा-वाचक और तत्व-मर्मज्ञ के रूप में बड़ी प्रसिद्धि थी। उनके बारे में विख्यात था कि वह न केवल बहुत रोचक ढंग से धर्म-कथा सुनाते थे अपितु धर्म की मानवीय व्याख्या करते थे। बड़ी संख्या में लोग उनके प्रवचन और धर्म कथाएँ सुनने के लिए आते थे, जिनमें समाज के सभी वर्गों, जातियों, सम्प्रदायों के लोग शामिल होते थे। उन्हें धर्म का साक्षात रूप समझा जाता था। देश के कई शहरों में उनके आश्रम थे, इसलिए किसी एक जगह पर नहीं रहकर वह कभी यहाँ और कभी वहाँ आते-जाते रहते थे। जिस शहर में भी वह जाते थे वहीं पर उनके दर्शन करने और प्रवचन सुनने वालों का ताँता लग जाता था। दिल्ली के… आगे पढ़ें
“शम्बूक मारा गया। उसकी हत्या हो गई। अपने समय की सर्वोच्च सत्ता से वो टकरा गया था।“ अख़बार वाला सड़कों पर ज़ोर-ज़ोर से चिल्ला चिल्लाकर अख़बार बेच रहा था। सहमी हुई आँखें, उफनती हुई साँसें, मुस्कुराते होंठ और फुसफुसाती आवाज़ें विभिन्न दिशाओं से आकर उन अख़बारों पर टूट पड़ी थीं। शम्बूक कब गया सर्वोच्च सत्ता को चुनौती देने? वह तो गया था... कार्ल सगान सा विज्ञान लेखक बनने। प्रकृति, सागर, धरती और आकाश से प्रेम करने, पता नहीं कब वह सागर की गहराई और आकाश की ऊँचाई नापता धरती पर आ पहुँचा और... और फिर उसे इंसानों से प्रेम हो गया। “इंसानों से प्रेम करना कोई अपराध तो नहीं।” उफनती हुई साँसों ने हवा में मुट्ठी हिलाते हुए कहा।   इंसान होकर इंसान से प्रेम करना, यह गुनाह ही तो है। केवल भगवान होकर ही इंसानों से प्रेम किया जा सकता है उनपर दया की जा सकती है… आगे पढ़ें
आज़ाद लबों से डर है उनको खुले ख़्यालों से डर है उनको रीत बदलने से डर है उनको बन्द दिमाग़ों से नहीं खुली किताबों से डर है उनको झुकी सहमीं नज़रें वो चाहते उठती नज़रों से डर है उनको सवालिया ज़ुबान से डर है उनको बस पोथी पतरे वो चाहते सोच समझ से डर है उनको बस रटा रटाया उगल दो उड़ता परिन्दा दौड़ता घोड़ा वो नहीं चाहते पिंजरे और कनटाप वो बेचते सेवा में बन गलीचा बिछ जाये ऐसी औरत उन्हें चाहिये जिसे रौंद उनमें ओज जगे बात काटने कहने वाली दृढ़ औरत से डर है उनको नये दौर से डर है उनको जनता नहीं वो प्रजा चाहते साधक नहीं वो भक्त चाहते मनुष्य नहीं वो जीव चाहते वो सवालों से डरते हैं शब्दकोश से विस्म्यादिबोधक व प्रश्नचिन्हों को हटा देना चाहते हैं भाषा के ज़िन्दापन से शब्दों की मारकता से डर है उनको जारी कर रहे… आगे पढ़ें
यूँ तो दोस्त सहेलियाँ घर कुनबे गाँव के सदा निशाने पर रहते आए हैं बिगाड़ने वाले  दिमाग़ ख़राब करने वाले माने जाते रहे हैं मगर प्रेम में घर से भागी लड़की की सहेली होना जैसे तलवार पर चलना जैसे तीर की नोक दिल के पार गाँव भर की नज़रों में जैसे तोप के मुँह पर अड़ा होना तमाम नैतिकताओं  मर्यादाओं रिवाज़ों के लिये ज़िम्मेदार होना और खोजा जाना अंग अंग में सुराग़ भेद राज़ मार मुलक के अते पते दब जाना सवालों तोहमतों हिदायतों के तले सबसे मुश्किल काम है प्रेम में घर से भागी लड़की की सहेली या दोस्त होना आगे पढ़ें
नदियों का देश हमारा सर्वाधिक बरसात का भी यूँ बाढ़ भी आई ही रहती है मगर औरतें रात भर जागती हैं मीलों चलती हैं  गहरे कुओं में उतरती हैं टैंकरों पर  जान की बाज़ी लगाती हैं  पानी के लिये... पानी मर गया है संसद की आँखों का आगे पढ़ें
सुख-दुख हर्ष विषाद  न्याय अन्याय वाद-विवाद। विचार संवेदना। सहते सब हैं, कहते सब हैं,  दर्द अपना-अपना, कितने हैं जो औरों का दर्द,   अपना बना कर रचते हैं?  अपना बनकर लिखते हैं? सब संघर्ष सब द्वन्द्व,  लिखते कहते जी गए प्रेमचंद! दुखियों के साथी को कम हैं,     हज़ार लाख शब्द! हम जियें आजकल, परसों,  या दिन और चंद! भूख और मेहनत है जब तक,  जगत में रहेंगे प्रेमचंद! रहेंगे प्रेमचंद आगे पढ़ें
सोसाइटी में मरम्मत कार्य चल रहा है  मिस्त्री मजदूर आ गए हैं  लग्ज़री कार से आया ठेकेदार आदेश दे रहा है    मसाला तैयार है  पैड भी बँध चुकी है थर्ड फोर्थ फ़्लोर की  जर्जर किनारियों को छूते तीस चालीस फुट के बाँसों से बनाई गई है पैड   मटमैले धूसर सूखे  बूढ़ी रीढ़ से टेढ़े मेढ़े बाँसों में  एक बाँस ताजा हरा कच्चा है सीधा तन कर खड़ा दृढ़  जैसे बाँस का अलवाया बच्चा है    ऊपर से क़लमदार कटा है जैसे आसमान छू लेता  नीचे मोटी गाँठें  झाँक रही हैं जड़ें जहाँ से अभी तो इसको और विकसना था जवान होकर बाँस-वन -बन घास वंश का नाम रोशन करना था    जाने बाँसों के किस हरे-भरे झुरमुट से  उखाड़ काटकर लाया गया है बालक सा काम पर  डाँटकर लगाया गया है  मगर काम पर लगा हुआ है हम सोए थे निंदड़क जब  यह मुस्तैदी से जगा… आगे पढ़ें
जनेऊ-तोड़ लेखक   लेखक महोदय बामन हैं और हो गये हैं बहत्तर के विप्र कुल में जन्म लेने में कोई कुसूर नहीं है उनका वे ख़ुद कहते हैं और हम भी लेखक ने अपने विप्रपना को इस बड़ी उम्र में आकर धोने की एक बड़ी कर्रवाई की है तोड़ दिया है अपने जनेऊ को और पोंछ डाला है अपने द्विजपन को अपने लेखे कहिये कि जग के लेखे  बल्कि जग के लेखे ही बावजूद लोग उन्हें मान बख़्शते हैं सतत विप्र का ही सतत घटती इस घटना में भी  उनका क्या रोल वे किसको किसको कहाँ कहाँ  अपने जनेऊ तोड़ लेने का वास्ता देते फिरे   हर एक्सक्ल्यूसिव सवर्ण मंच पर बदस्तूर अब भी मिल रहा है उन्हें बुलावा और उनके जनेऊ-तोड़  डी-कास्ट होने के करतब को रखते हैं ठेंगे पर सब अपने पराये सवर्ण-मान पर ही रखकर उन्हें हर हमेशा वे गुरेज़ करें भी तो करें कैसे… आगे पढ़ें
बहुत चली मुहब्बत की बातें उनकी ओर से  नफ़रतें उगाते रहे ज़मीं पर जबकि  वे भीतर बाहर लगातार   नफ़रतें पालीं उन ने एकतरफ़ा हमारी तो पहुँच ही नहीं रही उन तक कि उनके प्रति हम नफ़रत रखें अथवा प्रेम सब कुछ तय होता रहा उनकी तरफ़ से हमारी ओर से कुछ भी नहीं तो!  वे ही जज रहे हमारे मुजरिम भी जबकि वे ही हममें नफ़रत करने का माद्दा कहाँ हम तो बस, कर्तव्य भर  उनकी नफ़रतों के जवाब पर होते हैं!   अंग्रेज़ी अनुवाद में 'कर्तव्य भर नफरत' : Just a duty-bound Hatred (Translated by Mridula Nath Chakraborty)  Ran the gamut of love talk from their side Even as they kept sowing hatred in the soil Inside Outside Ceaseless They nurtured hatreds one-sidedly We could not reach them one bit Whether we extend love towards them or hate? It was all always already decided by them… आगे पढ़ें
कहते हो – बदल रहा है गाँव। तो बतलाओ तो – गाँवों में बदला कितना वर्ण-दबंग? कौन सुख-अघाया, कौन सामंत? कौन बलवाई, कौन बलवंत?   सेहत पाया पा हरियाया कौन हाशिया?  कौन हलंत? आगे पढ़ें
मैं गह्वर में उतरना चाहता हूँ  ब्राह्मणवाद की गहराई नापने  पाना चाहता हूँ उसकी विष-नाभि का पता  और तोड़ना चाहता हूँ  उसकी घृणा के आँत के मनु-दाँत तुम साथ हो तो सुझाओ मुझे  लक्ष्य संधान के सर्वोत्तम उपाय  बताओ क्या क्या हो  प्रत्याक्रमण में सुरक्षा के सरंजाम  लखाओ मुझे वह दृष्टि कि  गुप्त-सुप्त ब्रह्म-बिछुओं की शिनाख़्त कर सकूँ मेरा हाथ पूरते कोई मुझे अनंत डोर दो  जिसके नाप सकूँ नाथ सकूँ  इस शैतान की अंतहीन आँत को  बाँधो मेरी अंटी में अक्षय रेडीमेड ड्यूरेबल खाना दाना  दो ऐसी तेज़ शफ़्फ़ाफ़ रोशनी वाली टॉर्च मुझे  तहक़ीक़ात काल के अंत तलक निभा सके जो  मेरे अनथक अनंत हौसले का अविकल साथ! आगे पढ़ें
सुनो द्रोणाचार्य!   अब लदने को हैं दिन तुम्हारे छल के  बल के  छल बल के   लंगड़ा ही सही लोकतंत्र आ गया है अब जिसमें एकलव्यों के लिए भी पर्याप्त ‘स्पेस’ होगा  मिल सकेगा अब जैसा को तैसा अँगूठा के बदले अँगूठा और हनुमानकूद लगाना लगवाना अर्जुनों का न कदापि अब आसान होगा    तब के दैव राज में पाखंडी लंगड़ा था न्याय तुम्हारा जो बेशक तुम्हारे राग दरबारी से उपजा होगा  था छल स्वार्थ सना तुम्हरा गुरु धर्म पर अब गया लद दिन-दहाड़े हक़मारी का  वो पुरा ख़्याल वो पुराना ज़माना    अब के लोकतंत्र में तर्कयुग में उघड़ रहा है तेरा छलत्कारों हत्कर्मों हरमज़दगियों का  वो कच्चा चिट्ठा जो साफ़ शफ़्फ़ाफ़ बेदाग़ बनकर अब तक अक्षुण्ण खड़ा था  तुम्हारे द्वारा सताए गयों के अधिकार अचेतन होने की बावत   डरो चेतो या कुछ करो द्रोण कि बाबा साहेब के सूत्र संदेश- पढ़ो संगठित बनो संघर्ष… आगे पढ़ें
दलित रचनाकारों की कहानियों में चित्रित दलित स्त्री और उसके सामाजिक परिवेश पर मैंने अपनी दृष्टि केन्द्रित रखी है। अनेक रचनाकार लेखन के माध्यम से युग की धड़कनों को रेखांकित कर रहे हैं। स्त्री इनके लेखन में कहीं केन्द्र में है व कहीं हाशिए पर। वर्णवादी कुव्यवस्था के कारण समाज के सबसे निचले पायदान पर पड़ी दलित स्त्री की अति दयनीय यथार्थ स्थिति का चित्रण तो इन्होंने किया ही है पर इनकी दृष्टि केवल चित्रण तक ही सीमित नहीं रही है, इस विषमता मूलक स्थिति के लिए उत्तरदायी कारकों की भी इन्होंने अच्छी पड़ताल की है। विषमतामूलक स्थितियों के लिए उत्तरदायी शक्तियों को पहचान उनके विरुद्ध दलित जन में चेतना जागृत कर उन्हें संगठित हो कर समता के लिए संघर्ष करने का आह्वान इनकी रचनाओं में मिलता है। स्त्री समाज की मूलभूत ईकाई है, पर भारतीय परिप्रेक्ष्य में स्त्री विशेषकर दलित स्त्री जाति व पितृसत्ता रूपी दोहरे अभिशापों… आगे पढ़ें
दलित साहित्य वर्तमान का ऐसा विमर्श बन चुका है जिसका अध्ययन किए बिना सम्पूर्ण हिन्दी साहित्य को समझना ग़लत होगा। भारी संख्या में इस दिशा में लेखन के लिए प्रेरित होना यह बताता है कि यहाँ भी कम चेतना नहीं है बस बोलने का मौक़ा नहीं दिया गया। आज दलित विमर्श हिन्दी का ही नहीं, हिन्दी प्रदेश की सीमाओं से बाहर निकालकर बड़ा स्वरूप ले चुका है, जिसका मूल उद्देश्य है दलित जीवन की बुनियादी समस्याओं को जनता के सामने लाना। सम्पूर्ण भारतीय भाषा में दलित लेखन तेज़ी से हो रहा है। ‘दलित साहित्य’ के लेखन में किस-किस को शामिल किया जाए यह अभी तक स्पष्ट नहीं हो पाया है। दलित साहित्यकारों का मनाना है कि दलित की पीड़ाओं को वही समझ सकता है जिसने इसको भोगा है, यानि कि अनुभूति के आधार पर, जबकि दूसरा खेमा दलितों से इतर लिखे गए साहित्य को, जो दलित जीवन पर… आगे पढ़ें
बहुत अर्से पहले प्राइमरी कक्षा में मैंने लाइब्रेरी से ली हुई किताब गुमा दी फिर टीचर को डरते डरते बताया उन्होंने कहा, 'अब तुमको ही लाइब्रेरी में बंद कर दूँगी' मैं सोचती रही कैसी लगूँगी अलमारी में बंदी होकर सब खुली हवा में मुझे देखा करेंगे  और मैं बन्द पसीजी रहूँगी भीतर उमस से तब कहाँ जानती थी बंदी जीवन का इतिहास जहाँ गहरे साँस लेने पर भी साँस ठहरा दी जाती थी  और वर्तमान से भी कोई साबका नहीं था तब तो, साँसें अब भी नियंत्रित हैं, जल्द ही ज्ञात हुआ मुझको।   घर मे कॉमिक्स पढ़ने की मनाही थी सो मैंने संगी साथियों से माँग कर कभी छीन कर, छुप-छुप कर पढ़ीं चाचा चौधरी, मोटू पतलू की हरकतें तेनाली रामा और बीरबल के क़िस्से,   एक दिन घर में हाथ लग गई बुद्धचरित  जिसको पढ़ कर मन करुणा से भर गया मगर यशोधरा कहीं नहीं थी… आगे पढ़ें
स्त्रियाँ उलझनों में अपना सवेरा बुन रही हैं रुलाई की सिलाइयों को मज़बूती से पकड़े हुए चढ़ाती हैं संघर्ष के फन्दों को बड़ी तैयारी से  नाउम्मीदी के दौर में भी डालती हैं  उम्मीदों से भरा एक नया डिज़ाइन उनकी उँगलियों  पर कितने ही घाव हैं दुखते हाथों से वो कोई सपना बुन रही हैं पहनाकर किसी को तैयार स्वेटर  वो किसी का जाड़ा चुन रही हैं वो ख़ुश होती हैं देकर नींद  सुबह का उजाला बुन रही हैं।   उनके चारों तरफ़ गहराने लगी है रात  वो भरी आँखों से कोई आस बुन रही हैं आग पर पका रही हैं आदिम भूख वो डाल रही हैं उफनते दूध से पौरुष पर अपने सपनों का पानी चक्की में पीस देना चाहती हैं दुख सुख के आटे की रोटियाँ बेल रही हैं वो प्यासी ही कोसों चलकर ला रही हैं पानी और पानी है कि रिस रहा है उनके पैरों के… आगे पढ़ें
तुम मारी नहीं जा सकीं फूलन हत्यारों की तमाम कोशिशों के बावजूद   चंबल के उबड़ खाबड़ पठारों से लेकर  कठुआ के हरे भरे पहाड़ों तक मणिपुर के सघन गहन वनों से लेकर  मरूभूमि के तपते गाँव भटेरी तक असमानता की उर्वर भूमि खैरलांजी से लेकर  धान के कटोरे छत्तीसगढ़ तक तुम जीवित हो हर स्त्री के सम्मान में।   तुम्हारे मान-मर्दन की तमाम कोशिशों के बावजूद वह अट्टहासी क्रूर हिंसा तुम्हें तोड़ नहीं पाई तुम टूट भी नहीं सकती थीं फूलन तुमने जान लिया था स्त्री जीवन के डर का सच जान लिया था कि स्त्री का मान योनि में नहीं बसता वह बसता है स्त्री के जीवित रहने की उत्कट इच्छा में यह जान लेना ही तुम्हारा साहस था जिसे तुमने नहीं छोड़ा जीवन की आख़िरी साँस तक।   तुम एक भभके की तरह उठीं जंगलों की बीहड़ता को चीरती हुई भुरभुरे ढूहों को गिराती हुई तुम एक बवंडर की… आगे पढ़ें
एक स्त्री लगातार चल रही है,   अपने हिस्से की ज़मीन तलाशती बीहड़ के बीच ढूँढ़ते हुए पानी के स्रोत, रेत से पानी निचोड़ती समुद्र में मछलियाँ बचाती जोहड़ में घोंघे छोड़ती  रास्तों और जंगलों के बियाबान में जलावन चुनती आग को बचाने की जद्दोजेहद में लगातार जल रही है। एक स्त्री लगातार चल रही है   इतिहास और भविष्य के बीच होते हुए उसकी कमर पुल बनाते लगातार झुक रही है वो एक हाथ से बच्चों को थामे दूसरे से लगातार श्रम कर रही है, समय के चाक पर लगातार प्रहार करती दोनों पाटों पर अंकित हो रही है और पत्थरों के बीच आटे सी झर रही है।   एक स्त्री लगातार चल रही है   समय के दिए कितने ही खुदने शरीर पर लिए सभ्यता के खंडहरों को उलाँघती नदी सी एक स्त्री लगातार यात्रा कर रही है उसके मन में अब नहीं रही कोई गाँठ उसने खोल दी हैं गिरहें… आगे पढ़ें
माँ ने बड़े मन से मँगवाई थी खुर्जा से एक बड़ी और मज़बूत चूड़ीदार ढक्कन वाली बरनी जिसमें डाला करती थी वो ख़ूब सारा आम का अचार जबकि ख़ुद उसे पसन्द नहीं थीं खटास वाली चीज़ें खट्टा चूख कहते ही उसके दाँत खटास से भर जाते थे खट्टी छाछ तक नहीं पीती थी माँ तो खट्टी कढ़ी तो बन ही नहीं सकती थी क़लमी आमों की बनाती थी मीठी चटनी और आमों की हल्की खट्टी-मीठी रसेदार सब्ज़ी जिसमें रहता था सौंफ का सौंधियाता ज़ायका  जिसकी मिठियाती गुठली को ख़ूब देर तक चूसती रहती थी जैसे बूँद बूँद रस समेट लेना चाहती हो अपने भीतर।   आम के अचार के लिए आम आते दाब से कटते, मींग अलग, फाँक अलग फाँकों में लगता नमक रात भर  चारपाई पर बिछी चादर पर दिन की उजली धूप में  एक एक फाँक को पलट पलट कर धूप से भर दिया जाता  जैसे… आगे पढ़ें
1. बुद्ध अगर तुम औरत होते तो इतना आसान नहीं होता गृहत्याग शाम के ढलते ही तुम्हें हो जाना पड़ता नज़रबंद अपने ही घर और अपने ही भीतर हज़ारों की अवांछित नज़रों से बचने के लिए, और वैसे भी माँ होते अगर तुम   राहुल का मासूम चेहरा तुम्हें रोक लेता तुम्हारे स्तनों से चुआने लगता दूध फिर कैसे कर पाते तुम   पार कोई भी वीथी समाज की। 2. घने जंगलों में प्रवेश करने और तपस्या में तुम्हारे बैठने से पहले ही शीलवान तुम्हें देखते ही स्खलित होने लगते जंगली पशुओं से ज़्यादा सभ्यों से भय खाते तुम ब्राह्मण तुम्हारी ही योनि में करते अनुष्ठान और क्षत्रिय शस्त्रास्त्र को भी वहीं मिलता स्थान वैश्यों ने पण्य की तरह बेच कर बना दिया होता वेश्या तुम्हें और और ये कहने में कोई गुरेज़ नहीं है मुझे कि शूद्रों का भी होते तुम आसान शिकार औरत के मामले में… आगे पढ़ें
तुम्हारे कोट को छुआ तो यूँ लगा कि जैसे तुम हो उसके भीतर उसके रोम- रोम में समाये तुम्हारी ही गंध व्यापी थी उसमें जो उसे छूते ही समा गई मुझमें यूँ लगा कि जैसे तुमने छुआ हो मुझे अचानक कहीं से आकर।   मैं तो समझी थी कि तुम भूल गए हो मुझको दिखा जब अंदर की जेब में लगा हरा पेन एक मीठा सा अहसास हुआ ये वही हरा पेन था जो लिया था तुमने पहले मुझसे कभी   मगर अब वो पेन महज़ पेन नहीं था वहाँ उग आया था एक हरा पत्ता जो सीधे तुम्हारे दिल से जाके जुड़ता था तुम्हारा दिल अभी भी मुझसे जुड़ा है मैं अब भी हरे पत्ते सी हरियाती हूँ तुम्हारे मन में ये जानकर अच्छा लगा।   ये जानकर अच्छा लगा कि तुमने लगा के रखा है मुझको अभी भी सीने से मैं अब भी वहाँ बसती हूँ… आगे पढ़ें
तुम कविता पर होकर सवार लिखते हो कविता और हमारी कविता रोटी बनाते समय जल जाती है अक़्सर कपड़े धोते हुए  पानी में बह जाती है कितनी ही बार   झाड़ू लगाते हुए साफ़ हो जाती है मन से पौंछा लगाते हुए गँदले पानी में निचुड़ जाती है   साफ़ करते हुए घर के जाले कहीं उलझ जाती है अपने ही भीतर और जाले बना लेती है अनगिनत धूल झाड़ते हुए दीवार से सूखी पपड़ी सी उतर जाती है टॉवल टाँगते समय टँग जाती है खूँटी पर   सूई में धागा पिरोते-पिरोते हो जाती है आँख से ओझल   छेद- छेद हो जाती है तुम्हारी कमीज़ में बटन टाँकते बच्चों की चिल्ल-पों में खो जाती है मिट्टी हो जाती है गमलों में खाद देते हुए खाद   घर-बाहर सँभालते सहेजते तुम्हारे दंभ में दब जाती है और निकलती है किसी आह सी जैसे घरों की चिमनियों से निकलता… आगे पढ़ें
कुशल गृहणी  ताउम्र जोड़ती है  एक-एक पाई  गाँव की महिलाओं या पुरुषों द्वारा  चलाई जाने वाली  कमेटी सोसायटी में डालती है पैसा जोड़ तोड़ कर! संकट की घड़ी में  काम आ सके  उसकी छोटी-सी बचत    यह मड़ी-सी पूँजी  उसका आधार होती  जिससे वह घर बनाने के  सपने भी देखती... बच्चों का भविष्य  और हारी-बीमारी में  काम आने वाला साधन भी..    दूसरों के सामने  हाथ फैलाए...  उससे बढ़िया  अपना देखकर ख़र्चा करें! अपने पुराने कपड़ों को काँट छाँट कर बना देती थी बेटियों के लायक़.. गृहणी कुशल थी  इसलिए मेहनत और  उसकी क़ीमत को  बख़ूबी समझती थी...    पति की आदतों से परेशान,  कुशल ग्रहणी...  बेटा शायद समझे माँ को  उसकी मेहनत को  पिता की लत से  पूरा घर परेशान,  रात भर का जागना,  रोना- पीटना,  मारपीट से तंग सब  न तनखा का पता,  न ख़ुद का! बेटे को उम्मीद से  देखती माँ...  बड़ी दुवाओं, मन्नतों से,… आगे पढ़ें
पन्द्रह दिनों की जी तोड़ मेहनत भागदौड़ और उससे पहले की भी ख़ूब सारी मीटिंग्स मेल मुलाक़ात। पूरे विभाग को ज़िम्मेदारी समझाते हुए विभाग के अध्यक्ष ने कहा, "अबकी बार कोई ग़लती नहीं होनी चाहिए! सब एकदम सटीक समय पर होगा! सबको शार्प टाइम पर पहुँचना होगा! ऐसा ना हो कि मुख्य अतिथि पहले आएँ और आप बाद में पहुँचे!" थोड़ा साँस लेकर सबकी तरफ़ निहारकर उन्होंने कहा, "और हाँ हमें अपनी संस्कृति का ख़्याल भी रखना होगा! भारतीय संस्कृति की पहचान उसका पहनावा खानपान और आदर सत्कार है इसलिए कपड़े एथनिक लुक में ही होने चाहिएँ! भारतीय परिधान ही सबसे सुंदर होते हैं!" "जी, जी हाँ सर भारतीयता दुनिया में विशिष्ट है हम इसका उदाहरण पेश करेंगे!" यह बात डॉक्टर दूबे ने कही जैसे उन्होंने विभाग अध्यक्ष का वाक्य हाथों हाथ लपक लिया।  उनके समर्थन में डॉ. मृदुला शर्मा ने कहा, "महिलाएँ साड़ी पहनेंगी, और पुरुष फ़ॉर्मल… आगे पढ़ें
मैं स्त्री, तुम पुरुष तुम लड़के, मैं लड़की मैं पत्नी, तुम पति ज़रा बताओ तो तुम्हारे और मेरे बीच केवल 'इंसान' होने का भाव मौजूद क्यों नहीं?   मोर मुझे 'मोर' से ज़्यादा चिड़िया, कोयल कव्वे और कबूतर भाते हैं। इन्हें आप कहीं भी कभी भी, चलते फिरते डाल सकते हैं, दाना। 'मोर 'अभिजात्य हैं और मैं साधारण। ना  मँहगी पोशाक ना मँहगा खाना। आगे पढ़ें
प्रसव नहीं था, रण था क्या जानो तुम, कितना मुश्किल क्षण था। नहीं समझ पाएँगे वो जो मखमल पर सोते हैं। कैसे ज़िंदा रहते हैं वे शिशु जो पैदा सड़कों पर होते हैं। भूख, धूप से झुलसी देह मीलों सड़कों पर चलती जाती है। नहीं फ़र्क पड़ता उनको जिनके जुमलों की दिन दिन बढ़ती ख्याति है। यूँ तो हर स्त्री का प्रसव ही रण होता है। पर हम जैसी मज़दूर स्त्रियों का जीवन ही 'मरण' होता है। आगे पढ़ें
सभ्यताएँ मिटती नहीं मिटाई जाती हैं। इतिहास मिटता नहीं मिटाता जाता है। जनता डरती नहीं डराई जाती है । गोली चलती नहीं चलाई जाती है। जागो! और पहचानो वो कौन है? जो सब कुछ जानकर भी मौन है।   माँएँ अक़्सर कहा करती हैं। पुरानी कहावतें, परियों के क़िस्से और उनमें बसी चुड़ैलों की कथाएँ। माँएँ भी तो कभी बेटियाँ ही थीं। जब मान लिया था उसने ख़ुशी-ख़ुशी कि औरतें होती हैं परी और चुड़ैल भी माँएँ सवाल नहीं करती थीं। अगर कर सकतीं ..तो पूछतीं! ज़रूर अपनी माँ या सास या फिर, उसकी सास से सुलगती भट्टी की चिंगारी को क्यो ढाँप देना चाहती हो राख से? आख़िर! आँच पर राख कब तक डलती रहेगी? कभी तो टूटेगा  बाँध सब्र का और परंपरा,समझौते की । आगे पढ़ें
वामन और बलि की गाथा सुनी आपने बारम्बार उसी कथा को ज़रा समझकर आज सुनाऊँ पहली बार।   बलि था राजा असुर क्षेत्र का महिमा जिसकी अपरम्पार  बलिराजा का बलि हृदय था प्रेम, अहिंसा का आगार।   जहाँ तलक था उसका शासन न्याय वहाँ तक होता था ख़ुशहाली थी चारों ओर दुखी न कोई शोषित था।   राज्य में उसके सभी नागरिक ऊँचे और सुजान थे जाँत-पाँत का नाम नहीं था सारे एक समान थे।   नाम उसी का गूँज रहा था दूर-दूर तक दिक्‌-दिगन्त उसकी दिव्य कीर्ति ऐसी कहीं नहीं था जिसका अंत।   उत्तर में था ब्राह्मण क्षेत्र ब्राह्मण थे जिसमें भगवान मगर बलि की बली पताका करती थी उनको हैरान।   चाहते थे झुक जाए दक्षिण हों ख़त्म सभी उसके गुण-मूल्य डूब जाए ये आदि सभ्यता रह जाए बस ख़ाली शून्य।   मूल्य सभी जो पनप रहे थे बलि के काम-काज से बिल्कुल मेल न… आगे पढ़ें
(गुजराती साहित्य के संदर्भ में)   अस्पृश्यता (UNTOUCHABILITY)  को आज रोग बना दिया गया है। इसमें कोई अतिशयोक्ति नहीं कि भारत इस बात पर विकास के नाम पर पिछडेपन में जा रहा है। कहते हैं कि भारत इक्किसवीं सदी में पहुँच चुका है। ग़लत, भारत आज भी पुरानी सदी में ही है। विकास मात्र भौतिकता का हो लेकिन समाज के बाक़ी हिस्सों का न हो तो उसे विकास नहीं कहा जाता। समाज के सारे अंगों का जिस दिन विकास होगा तभी भारत का सच्चा विकास होगा।  गाँधीजी ने कहा था कि – "अस्पृश्यता का प्रचलन मेरे लिए असहनीय है। मैं इसे क़तई पसंद नहीं करता… अस्पृश्यता की प्रथा को जड़ से ख़त्म कर देना चाहिए।" अस्पृश्यता हिन्दु धर्म में ही वर्ग विभाजन का काम करती है। फिर भी जड़ बनी मानसिकता के चलते हिन्दु ही हिन्दु का दुश्मन हो, उस तरह का व्यवहार किया जाता है, निम्न वर्ण… आगे पढ़ें
साहित्य जगत के साहित्य के वर्गीकरण के अनेक स्वरूप हैं, समकालीन, प्रगतिवाद, नारीवाद, बाल साहित्य तथा दलित साहित्य। दलित साहित्य की दिशा में श्री रामगोपाल भारतीय के इस भागीरथ प्रयास में कुछ दलितों की दशा और दिशा से जुड़े अनेक यक्ष प्रश्नों के उत्तर देश के लगभग सभी प्रान्तों से दस्तावेज़ साहित्यकारों के विचार प्राप्त करने की एक सकारात्मक कोशिश की है। इस माध्यम से दलित समस्याओं के समाधानों तक पहुँचने की एक अर्थपूर्ण कोशिश में देश भर के प्रधान लेखकों ने अपने अपने विचारों को अभिव्यक्त किया। इस साधना रूपी प्रयास के एवज़ : “दलित साहित्य के यक्ष प्रश्न” नामक संग्रह 2009 में प्रथम संस्कारण के रूप में श्री नटराज प्रकाशन द्वारा मंज़रे-आम पर आ पाया। मैं श्री रामगोपाल भारतीय जी की तहे दिल से शुक्रगुज़ार हूँ जो मुझे भी देश के इस समस्या प्रधान विषय पर अपने विचार अभिव्यक्त करने का मौक़ा दिया...!   रामगोपाल भारतीय:… आगे पढ़ें
“मैडम आ….प किस कॉलेज में हो?” पसीने से लथपथ उस लड़की ने हिन्दी के देहाती अंदाज़ में पूछा। मात्र 1.22 मिनट में दो सौ मीटर की रेस को पूरा कर स्पोर्टस् ट्रायल में नम्बर एक पर आई उस लड़की पर मैडम जी की नज़र भी टिकी थी। वे तभी से उसे बड़ी आत्मीयता से निहार रही थीं। लड़की का ऊँचा लंबा क़द, खिंची तराशी पिंडलियाँ उसके उज्ज्वल भविष्य की ओर इशारा कर रही थीं। उधर मेडम का बेबाक अंदाज़, सुनहरे फ़्रेम का काला चश्मा और पाँच फुट आठ इंच का लम्बा तराशा भव्य व्यक्तित्व उस सामान्य सी दिखने वाली कन्या को अपने विशेष होने की अनुभूति करा रहा था। पर मैडम थी कि उसके इस सवाल को बराबर मुस्कुराकर टाल रही थी। वे चाहती थी कि लड़की उनसे इतनी प्रभावित हो जाए कि ख़ुद ही पता करे कि वे किस कॉलेज में पढ़ाती हैं।  यह विश्वविद्यालय का स्पोर्टस्… आगे पढ़ें
सदियों सदियों यही हुआ है मौन मुखर सबकुछ सहता हूँ आज भी प्रचलित यही प्रथा है दफ़्तर में दब कर रहता हूँ।   मुझसे ऊपर बैठा अफ़सर यत्न-प्रयत्न ही बाधा डालें आगे बढ़ने के अवसर पर मुझको सब के बाद पुकारें।   मेरे आगे बढ़ जाने से तुम कैसे पीछे हो जाओ बात समझ से परे है मेरी मुझको थोड़ा तुम बतलाओ।   जो भी लाभ हमें मिलता है आधा तो तुम खा जाते हो बचा कुछा जो मिलता है तो ताने देने लग जाते हो।   इंटरनेट की इस दुनिया में हमसे अब भी हेय धरे हो फ़ेसबुक और व्हाट्सप्प पर भी उलटे सीधे व्यंग्य कसे हो।   माना अब वो दौर नहीं हैं लेकिन फिर भी सत्य यही है बुद्धि अब भी विकृत कुंठित दिल में अब भी द्वेष वही है।   क्योंकि मैं अनुसूचित ठहरा! आगे पढ़ें
वह बहुत ख़ुश थी उसे यहाँ पहुँचने में कोई परेशानी नहीं हुई थी। उत्साह से वह बताने लगी, जब थी पाँच की तभी से  दादा ही सुनाते थे मानस बिठाकर पास प्यार से। और जब हुई दस की तो नानी ने ही कह सुनाई कथा कामायनी की, एक-एक पन्ना बाँचकर बताया था माँ ने जब वह हुई पन्द्रह की पिता के घर अलमारियाँ ही अलमारियाँ थीं अलमारियों में किताबें ही किताबें जो पकड़कर हाथ बिठा लेती थी उसे अपने पास खेल ही खेल में  किताबों की सीढ़ियाँ बनाकर जब वह  चढ़ बैठी उन अलमारियों के ऊपर तो सरक गई छत आप ही आप घर के ऊपर एक दूसरा घर था एक घर से दूसरे घर में आते-आते वह पच्चीस की हो गई थी।  यहाँ भी किताबों से भरी अलमारियाँ ही अलमारियाँ थीं जिन्हें सीढ़ियों सी लाँघती वह अचानक मेरे सामने थी, हँसती- खिलखिलाती मासूस सी बतियाती “अरे यहाँ… आगे पढ़ें
पार्वती अम्मा के न आने पर उनके लिए पूरा दिन गुज़ारना बहुत कठिन हो उठता था। पैंसठ साल की पार्वती अम्मा, नाती- पोतों वाली पार्वती अम्मा, जब तब घर में ऐसा कुछ पा जाती कि भूल ही जाती कि उनके पीछे, उनके बिना कहीं ज़िन्दगी रुक ही गई होगी। इस रुकी हुई ज़िन्दगी को हर पल धक्का देकर चलाना जो पड़ता था। यह ज़िन्दगी अपने आप में बड़ी कठिन थी, उसके लिए सब कुछ बड़ा कठिन था। कभी यह सब कुछ बहुत सहज था, बहुत आसान, ठीक वैसे ही जैसे बहता है पानी, या बहती है हवा, या कि जैसे उगता है सूरज और छिप जाने पर चाँद आ जाता है बिना किसी के आवाज़ लगाए अपने आप। अभी पिछले लगभग एक घण्टे से सूखी ठूँठ-सी बेजान उँगलियाँ प्रयासरत थीं। एक आसान सा काम उन्हें बड़ा कठिन बना रहा था। चम्मच उँगलियों के बीच फँस ही नहीं रहा… आगे पढ़ें
इस तरफ़ से जहाँ वह बैठे थे, वहाँ से उस तरफ़ का दृश्य साफ़ ही दिखाई देता, पर दोनों छोरों के बीच कोहरे का एक झीना आवरण था, ठंडक थी और बर्फ़ के गले हुए टुकड़ों से बने पानी की नदी। पहाड़ी के बीचोंबीच यह नदी ख़ामोशी से बह रही थी, जाने कब से। स्थानीय लोगों ने उन्हें पहले ही मना कर दिया था कि नदी में ना उतरें, उस का पाट बेशक ज़्यादा चौड़ा नहीं है, बामुश्किल चालीस हाथ होगा, पर गहरी बहुत है नदी, शायद चार बाँस गहरी मतलब लगभग चार सौ फ़ीट से कुछ अधिक ही। सावधान रहिए।  इस पार से उस पार जाने के लिए लकड़ी का एक पुल वहाँ था, काफ़ी पुराना और थोड़ा जर्जर भी। कब और किस ने बनाया यह पुल यह बात बहुत से लोगों से पूछने पर पता चली कि बहुत पहले कभी अंग्रेज़ों के वक़्त में बनाया था… आगे पढ़ें
गाँव में क़स्बे वही थे, पृथक स्कूल नये थे ठाकुर, पंडित के हम पर प्रभाव बड़े थे, उनकी घृणित अधिकार दृष्टि से झुलस कर उनके खेत में श्रम दे, भिक्षा भर खाते थे। मैं उन अनपढ़ आँखों का अक्षर बन अपने वर्ग के आत्मसम्मान के लिए सरकारी विद्यालय में तत्पर व आशान्वित ज्ञान का स्वप्न, पीयूष-पौध मन में लिए! शिक्षा-दीप हाथ में, मशाल मन में दौड़ से पहले चलना सीखना था, संस्कार में थीं, दासता की बेड़ियाँ सदियों का अदृश्य मूक भेद था। अध्यापक ने कक्षा में साथ दिया अवर्ण-सवर्ण का नया मेल दिखाया, मैं तुम्हारे पास ही बैठ, बंधु बना तुम संग, संशय अपना पिघलता पाया। मैं दीर्घ यात्रा का पूर्वाभास लेकर लिख रहा था नव-कथा धाराओं पर सौम्य, अडिग, बिना हताशा के धैर्य नदी बन कठोर चट्टानों पर! शिक्षा मुकुट शीश पर सजा एक दिन लगन, नगर तक ले चला नयी थी आबो-हवा, बहने लगा उचित,… आगे पढ़ें
आज इतवार है। सप्ताह भर की दौड़-भाग को विश्राम। सभी काम सुस्त गति से निपटाये जा रहे हैं। ग्रुप हाउसिंग सोसायटी में आज चहल-पहल है। आज सबको फ़ुर्सत है। आज सभी कार्य अन्य दिनों की निर्धारित अवधि से ज़्यादा समय ले रहे थे। जैसा और दिन पृथ्वी का होता है छोटा सा, आज का दिन सूर्य का पृथ्वी से ज़्यादा दीर्घावधि का। सोसायटी के सातवें फ़्लोर के एम. आई. जी. फ़्लैट में निगम जी सोफ़े पर अधलेटे पसरे हुए हैं। टी.वी. पर हॉलीवुड की डब फ़िल्म चल रही है। पूरा साउंड सिस्टम एक्टिव है। जेम्स बांड की फ़िल्म। गोलियों और कारों की ऐसी आवाज़ें जैसे कानों के पास ही चल रही हों। बीच में ब्रेक आता तो न्यूज़ लगा लेते और मोबाइल तो लगातार सक्रिय था ही। निगम जी कई चाय पी चुके थे। "ज़रा आधा कप चाय तो बना दो! पहले वाली ठंडी हो गई थी..” "ठंडी… आगे पढ़ें
दलित साहित्य!!!  क्या है दलित साहित्य? ... सबसे पहले, बहुत पहले; जब मैंने यह शब्द-युग्म पहली बार सुना था तब मन में यह विचार कौंधा था कि "दलित साहित्य" नामकरण कहीं ऐसे साहित्य के लिए तो नहीं है कि जिसे साहित्य-जगत में कुछ कमतर माना गया हो या कि फिर जैसे प्राचीन साहित्याचार्यों ने साहित्य के जो विभिन्न भेद किये थे– उत्तम (ध्वनि काव्य), मध्यम (गुणीभूत व्यंग्य काव्य) और अधम (चित्र काव्य); तो आज के युग में कहीं ऐसा कोई भेद तो नहीं है यह दलित साहित्य। (क्योंकि तब साहित्य के किसी भाग के किसी जाति-समुदाय आधारित नामकरण की स्थिति मेरे मस्तिष्क में किंचित में भी नहीं आई थी। ) ...ख़ैर! थोड़ा अध्ययन करने पर यह भाव निर्मूल हो गया, संदेह तिरोहित हो गया।  क्या है दलित साहित्य? क्या वह साहित्य दलित साहित्य है जो तथाकथित रूप से दलित कहे जाने वाले समुदाय के किसी व्यक्ति/किन्हीं व्यक्तियों द्वारा… आगे पढ़ें
उसके  हाथ-पैर काँप रहे थे। हाथ-पैर ही नहीं, पूरा शरीर काँप रहा था...। स्वर तीव्र होते-होते गले में रुँध गये थे। तेज़ बोलना उसका स्वभाव नहीं था। आज सहसा चिल्लाने से उसका गला रुँध गया। वह इतनी दुर्बल कभी नहीं थी कि यह घटना उसके मन मस्तिष्क पर इतना दुष्प्रभाव डाल सके। वह तो साहसी थी।  विवाह के समय जब वह बल्यावस्था में थी, तब बहुत डरती थी। पिता व भाई के अतिरिक्त किसी भी परपुरुष से उसे भय लगता था। उसे स्मरण हैं अब भी, बचपन के वे दिन जब वह गाँव के सरकारी प्राथमिक विद्यालय में पढ़ती थी। उस दलित बस्ती से जहाँ वह रहती थी वहाँ से विद्यालय कुछ दूर मुख्य गाँव में था। घर से विद्यालय की दूरी तय करने में वह संकोच व शर्म से कंधे व आँखें झुकाये रहती थी। कभी भी सीधी हो कर, गर्दन उठा कर वह चल नहीं सकी।… आगे पढ़ें
प्रभु ने कहा- तुम नीच हो, अछूत हो, जन्मे हो, मेरे पैरों से; सबकी सेवा, तुम्हारा धर्म है। मैं तुम्हें दासत्व देता हूँ, सिर्फ़ कर्म होंगे तुम्हारे, तुम्हारे अधिकारों का भोग, कदाचित ऊँचे लोग करेंगे। प्रभु ने कहा- तुम्हारी परछाई भी अभिशाप है, तुम थूक नहीं सकते ज़मीन पर, तुम्हारी स्त्री ढँक नहीं सकती स्तन अपने, तुम्हारे पद चिह्न, अपवित्र करते धरती को, तुम्हारा कुँआ; पोखर, घाट भिन्न होंगे, तुम्हारे मार्ग और घर परे रहेंगे गाँवों से, तुम रहोगे अलग-थलग।  प्रभु ने कहा- तुम्हें वही करना है, जो मैंने निर्धारित किया, अपने-अपने कर्म में लगे रहो, किसी दूसरे के कर्मों का अतिक्रमण नहीं, जन्मजात कर्मों को त्यागने की अनुमति नहीं तुम्हें। प्रभु ने कहा- सेवा करो, उच्च तीन वर्णों की, उनकी आज्ञा को ढोना नियति है, वे स्वामी हैं तुम्हारे, उनके ज़मीन जोतो पालकी उठाओ, चरण रज पियो, यही धर्म हैं, तुम्हारे। प्रभु! आप इतने निष्ठुर नहीं हो… आगे पढ़ें
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