विशेषांक: कैनेडा का हिंदी साहित्य

05 Feb, 2022

दो बिस्तर अस्पताल में

कहानी | डॉ. शैलजा सक्सेना

’बिना किसी सरनामें यानी भूमिका के मैं अपनी बात आप जैसे समझदारों के सामने रखना चाहती हूँ। आजकल मैं एक कहानी में हूँ। मैं नहीं जानती कि मैं कहानी लिख रही हूँ या यह कहानी मुझे पढ़ रही है। मेरे ज़ेहन पर यह एक साथ अनेक पायदानों पर चल रही है। यह ज़रूरी नहीं कि पहले ऐसा नहीं हुआ था पर इस समय यह अहसास एक ज़िंदा इंसान की तरह मेरे साथ चल रहा है कि मैं एक साथ अनेक जगहों पर हूँ। टूटी हुई नहीं, पूरी-पूरी!! एक ही इंसान पूरा-पूरा हर जगह कैसे हो सकता है? आप सोच सकते हैं, पर इस बात का जबाब मेरे पास नहीं है। कुछ लोग मिल जाएँगे कहने वाले कि यह नामुमकिन है, वो जो चाहें जो कहें पर मेरे पास वाक़ई इस बात की समझ नहीं है कि मैं एक साथ कई जगहों पर कैसे हूँ। 

मैं, जैसे अपना बीते हुए कल, आज और आने वाले कल, सब देख पा रही हूँ। मैं अस्पताल के इस बिस्तर पर भी हूँ और साथ ही टँगे पर्दे के पार, उस बिस्तर पर लेटी बूढ़ी औरत की कराह में भी हूँ जो रात भर अपनी टूटती आवाज़ में दर्द से रह-रह कर रोती रही है। छह बजे नर्सों की शिफ़्ट बदलने से पहले जब दो नर्सें उसकी बैंडेज और कपड़े बदलने आईं तो उस की कमज़ोर आवाज़ कुछ ऊँची हो गई। वे उसके घाव पर पट्टी बदल रहीं हैं। उसके रोने की आवाज़ जब मेरे भीतर चुभने लगी तो मैंने चादर से अपने कान ढँक लिये। शाल कस के सिर पर लपेट लिया ताकि मैं उस आवाज़ से बह न जाऊँ पर दिमाग़ की जाने किन आँखों से मैं देख रही हूँ कि उसका कमज़ोर बदन दर्द से हिल रहा है। नर्सों का अफ़सोस उनके हाथों को धीरे नहीं होने देता। वे मशीन की तरह उसके कमर के निचले हिस्से के गहरे घाव को साफ़ कर रही हैं। ये उन्हीं की आवाज़ें आ रही हैं। उसका डायपर बदल कर नर्स धीरे से कहती है, “डोन्ट क्राई, वी आर हेयर टू टेक केयर ऑफ़ यू (मत रो, हम तुम्हारा ध्यान रखने के लिये हैं यहाँ पर)!” 

“मेरा कोई नहीं है,” उसका रोना जारी है। 

“कल तुम्हारे बेटे आएँगे, तुम्हारे दो बेटे, वे तो रोज़ ही आते हैं।” 

“नहीं . . . वे मेरा ध्यान कहाँ रखते हैं, वे तो अपना काम, अपना लैपटॉप लिए आते हैं। मेरा दर्द कोई नहीं समझता,” उसकी सिसकियाँ तेज़ हो गईं। 

नर्सें उसे विश्वास दिलाने के लिये फिर कहती हैं, “वी केयर फॉर यू (हम तुम्हारा ध्यान रखते हैं)।” 

एक बूढ़ी, रोती हुई आवाज़ आई, “नो यू डोन्ट (नहीं, तुम नहीं रखतीं)।” 

मैं साफ़ महसूस कर रही हूँ कि एक नर्स यह सब सुनकर कुढ़ रही है। वह बूढ़ी के नीचे से ख़ून सनी चादर समेट रही है। नीले ग्लव्स में सुरक्षित हाथ वो चादर नहीं उठाना चाहते। गंदगी साफ़ करना उसकी नौकरी है, इच्छा नहीं। वह इस जबाब से भन्ना सी गई, सुबह छह बजे, जब इस औरत के अपने घर के लोग मीठी नींद ले रहे हैं, जब यह मरने के कगार पर इस बुरी हालत में है, तब भी वह इस मदद के लिये शुक्रगुज़ार होने के बजाय ऐसा रूख़ा जबाब दे रही है। उसने पलट के कुछ सख़्त आवाज़ में कहा, “व्हाट एल्स यू वांट फ्रॉम अस? (तुम हम से और क्या चाहती हो?)” 

कुछ सैकेंड की ख़ामोशी, फिर एक महीन, दर्द से कराहती आवाज़ में रोना . . . मैं अपने दिमाग़ की नज़रों से देख रही हूँ। बूढ़ी अचानक ज़ोर से सिसकी भरती है। शायद सख़्त बात कहती नर्स के हाथ सख़्त हो गये थे, शायद बूढ़े शरीर के झुर्रीदार सूखॆपन में वे हाथ चोट के जैसे लगे होंगे, वह मिमियाती सी बोलने लगी, “आई वांट टू डाइ, आई वांट टू डाइ (मैं मरना चाहती हूँ, मैं मरना चाहती हूँ)।” 

शायद उस नर्स ने महसूस किया होगा कुछ, वह नरम पड़ गई। बोली कुछ नहीं . . . बोले तो भी क्या? 

♦ ♦ ♦

जर्जर देह दर्द, बुखार और घाव से काँप रही है . . .मिट्टी, आसमान, पानी, हवा-सब मिल कर बदन को वापस अपने में खींच लेना चाहते हैं, वह सोचती है कि बदन का हर हिस्सा इन सब के पास वापस चला जाएगा, वो तो ठीक! पर दर्द कहाँ जायेगा? दर्द का तो कोई घर नहीं होता। वह हमारे तन में, हड्डियों और मन की तहों में बैठ जाता है। मरने पर क्या इस दर्द से छुट्टी मिलती है? हड्डियों और देह के साथ क्या यह दर्द भी दफ़न हो जाता है? वह बूढ़ी औरत इसी दर्द से छुटकारा पाना चाहती है, चाहें मर कर ही सही। नर्सें जानती हैं कि यह बूढ़ी दर्द से छुटकारा नहीं पा सकती। वे मौरफ़ीन से दर्द को जितनी देर रोकने की चेष्टा कर सकती हैं, करती हैं। वे यह जानती हैं कि दर्द नहीं जाएगा पर उन्हें तसल्ली के लिए कुछ तो बोलना ही होता है और वे करें तो भी क्या! तरस खा कर उस औरत को मार तो नहीं सकतीं। 

अचानक कान पर लिपटे शाल की तहों को चीरता हुआ, तेज़ रोना तेज़ाब सा मेरे कानों में पड़ा, शायद दवाई लगाई जा रही थी उसके घावों पर। नर्सें उसे शान्त करने की कोशिश करने लगीं, “कुछ मिनट और, बस, सब काम ख़त्म हो गया है।”

शायद उस औरत की दुख झेलने की सारी ताक़त समाप्त हो रही थी, वह रोये जा रही थी। पतली कमज़ोर महीन आवाज़ में रोती हुई, “आई वांट टू डाइ (मैं मरना चाहती हूँ), लेट मी जस्ट डाई (मुझे मरने दो)।” 

नर्सें शायद यह सब सुनने की अभ्यस्त थीं सो कुछ नहीं बोलीं। धीरे-धीरे उसका रोना सिसकियों में और फिर सुबकने में बदल रहा है। शायद सब काम हो गया। नर्सें उसे दवाई खिला कर, बाक़ी का सामान उठा, उस के बिस्तर वाले केबिन से निकल मेरे बिस्तर के सामने से होती हुई कमरे से बाहर निकल गईं। मैं उसकी सुबकियों को सुनते और अपने दर्द को समेटॆ चुपचाप लेटी रही। दर्द शायद दिमाग़ के पायदान पर हमारी समझ को बड़ा बना देता है लेकिन बदन के पायदान पर कहीं ख़ुदगर्ज़ भी बनाता है तभी तो एक के कहते ही सबको अपने-अपने दर्दों के सारे क़िस्से याद आने लगते हैं। 

♦ ♦ ♦

मैं उसके दर्द को समझ रही हूँ। मेरे दर्द का इलाज डॉक्टर के पास है। कल रात से डॉक्टरों ने आई.वी. की सूई हाथ में घुसा कर दवाई देना शुरू कर दिया है। हाथ में सूई घुसा कर और शंट डाल कर छोड़ दिया गया है। सुबह, दोपहर शाम उस से दवाई चढ़ रही है। 

मैं अपनी उस छोटी चुभन को चादर में लपेटे पड़ी हुई हूँ। मेरा ध्यान अपने दर्द से हट कर उस अनदेखी बूढ़ी औरत की ओर है। कैसी रही होगी उसकी ज़िन्दगी? हो सकता है बहुत क़ामयाब या हो सकता है बहुत ज़द्दोजहद भरी! हो सकता है वह बहुत घमंडी औरत हो या हो सकता है बहुत नज़ाकत वाली! बहुत मेहनती या आलसी! 

इंसान कैसा भी रहा हो ज़िन्दगी में पर दर्द के झकोरे, उम्र की डोलती नाव में मौत की ख़्वाहिश के सूराख़ पैदा कर देते हैं ताकि समय का पानी उस नाव में भरे और नाव डूब जाए और डूब जाए उसके साथ ही यह दर्द भी। 

मैं यानी सफ़ीना मुमताज़ आलम, इस औरत में अपना आने वाला कल देख रही हूँ। शायद अभी ३० साल छोटी हूँ इस से। पर एक दिन मैं भी ऐसे ही, ’मैं मरना चाहती हूँ . . . मैं मरना चाहती हूँ’ का रोना रोऊँगी!

चादर कानों पर लपेटे लेटी सफ़ीना यह ख़्याल आते ही बुत बन गई। वह अपने फ़ोन के वॉयस रिकॉर्डर पर, चादर में छिपे-छिपे, धीमी आवाज़ में यह सब रिकॉर्ड कर रही थी। ख़्याल जब बहुत ज़ोर मारते हैं तो सफ़ीना यही करती है। किसी और से नहीं, किसी और के लिए नहीं, अपने से, अपने लिए, वह अपनी बातें रिकॉर्ड कर लेती है। कोई उसके पास है नहीं, जिस से दिल की कहे। इस वॉयस रिकॉर्डर के बटन का पता जब से पाया तब से अपने मन की, देखी, सुनी, कही, गाई सब बातें इस से कह कर हल्का हो जाने की आदत डाल ली। 

♦ ♦ ♦

सफ़ीना की अंगुलियों ने रिकॉर्डिंग का बटन बंद कर दिया। दिमाग़ अपनी ज़िन्दगी की सड़क पर दौड़ने लगा . . . इसके लड़के तो सुबह आ जाएँगे पर उसे देखने कौन आएगा? बेटा जेल में है और शबनम? वो कहाँ रह रही है, सफ़ीना को भी नहीं मालूम। सबसे छोटे रायन को सलीम अपने साथ साउदी ले गया एक महीने पहले . . . 
इस बूढ़ी औरत की रोती हुई फ़रियाद उसका दिल चीर रही थी पर पिछले कितने ही समय से क्या वह ज़िन्दगी माँगती रही है? जब हर तरफ़ अँधेरा हो तो मौत रौशनी सी दिखाई देती। 

ज़िन्दगी की थपेड़ों में वह कब तक इधर-उधर एक बेबस कश़्ती सी डोलती रहे? सलीम मियाँ का क्या है, उनके तो साउदी में तीन बेग़में और बैठी हैं, उन्हें कहाँ सफ़ीना की कमी खलेगी। इस समय तो वैसे भी वो बेहद ख़फ़ा बैठे हैं। उनके हिसाब से सफ़ीना की परवरिश में ही कुछ कमी रह गई वरना उनकी बेटी शबनम की मजाल थी जो अपने अब्बा के हुक्म के खि़लाफ़ जाए! इधर शब्बीर अपने बाप के तेवर अपना कर, अपनी ही माँ के साथ बदसलूक़ हो गया है। दो दिन पहले तो बात इतनी बढ़ गई थी कि जब सफ़ीना ने उसे अपने ग़लत दोस्तों के साथ मिलने जाने से रोकने की कोशिश की तो वह उसे धक्का देकर निकल गया था। सफ़ीना ने दरवाज़ा पकड़ने की कोशिश की पर वह ख़ुद को सँभाल नहीं पाई थी, गिरी और गिरते हुए पास रखे ’शू रैक’ से उसका सिर टकराया था। 

शब्बीर तो चला गया था और वह चोट खा कर बेहोश हो गई थी। जाने कब तक पड़ी रही होगी। पड़ोस के किसी ने उसका घर खुला हुआ देखा और उसे बेहोश देख कर ’एम्बुलेंस’ को फ़ोन कर दिया। बाद में उसने अपनी दोस्त राबिया और गुलनार को फ़ोन कर के बुलाया और अपने यहाँ होने की ख़बर दी। उन्होंने ही कल बताया था कि पुलिस ने शब्बीर को गिरफ़्तार किया है और उससे पूछताछ कर रहे हैं। उस पर अपने दोस्तों के साथ मिलकर गुंडागर्दी करने का आरोप लगाया गया है। 

सफ़ीना के दिल में आँसुओं की हूक़ सी उठी और उबकाई आने को हुई। चेहरे पर लिपटी चादर को तेज़ी से उतार, वह उठ कर बैठने की कोशिश करने लगी। हाथ में लगी सूई और ब्लड प्रेशर नापने के यंत्र तेज़ी से हिले। नर्स शायद उधर से गुज़र रही थी, भागती हुई उसके पास आई, “डू यू वांट समथिंग (क्या तुम्हें कुछ चाहिए)?” 

उसका चेहरा देख कर, उसने बिस्तर के नीचे रखे पैन को उसके मुँह के आगे अड़ा दिया और सफ़ीना ने मुश्किल से रोकी हुई उल्टी पैन में कर दी। गोरा चेहरा लाल हो गया। नर्स ने कुल्ला करने को पानी दिया। चेहरा पोंछ कर वह तकिये पर गिर सी पड़ी। कमज़ोरी से आँखें झिपने लगीं। वह होंठों में ’थैंक्स’ बुदबुदा दी। नर्स के पूछने पर कि “क्या और कुछ चाहिए?” उसने सिर हिला दिया। 

उसकी ज़िन्दगी इतनी ख़्वार हुई पड़ी है कि उसे नहीं लगता कि किसी के कुछ देने या करने से कुछ होगा। माँगने को तो वो थोड़ा सा सुकून ही माँगती रही है पर वह मिला कहाँ उसे? केवल शुरू का ही एक साल अच्छा था उसका इस देश में, उसके बाद तो सलीम उसे यहाँ दो साल की शबनम के साथ अकेला छोड़ कर चला गया था। शादी के समय सलीम ने जब उस से पूछा था कि तुम किसी बाहरी मुल़्क में रहना पसंद करोगी? तब ’हाँ’ बोलती हुई सफ़ीना को क्या पता था कि यह रहना अकेले होगा। जब साउदी से यहाँ आने के मनसूबे बन रहे थे तब भी उसने कुछ नहीं कहा था। यहाँ आकर दो कमरों का एक अपार्टमेंट किराए पर लिया उन्होंने, तब भी उसे सलीम के इरादों का कुछ पता नहीं था। उस बिल्डिंग में यमन से आए उन जैसे कई लोग रहते थे, कुछ लोग सलीम के जान-पहचान के भी थे। बहुत सी औरतें अपने बच्चे सँभाले, शाम को बिल्डिंग के नीचे बने पार्क में उतर आतीं, सलीम उसे भी जाने को कहता, मगर बुर्क़े में। वह इस नई आज़ादी को पसंद कर रही थी, घर के लिए सामान लेना, आसपास की दुकानों में जाना, सही दुकानों का पता करना, बसों के नम्बर और क्लिनिक में डॉक्टरों के पर्चे, सोशल इंश्योरेंस नम्बर बनवाना, इन सब कामों में ही शुरू के तीन-चार महीने निकल गए। फिर एक दिन सलीम कुछ काग़ज़ों पर उस से साइन करवाने ले आया। उसने पूछा तो बोला, “मैं तुम्हें तलाक़ दे रहा हूँ!” 

स़फ़ीना के पैरों तले की ज़मीन निकल गई थी। कुछ देर तो पागल सी हक्का-बक्का मुँह खोले ही खड़ी रह गई थी।”क्या? क्यों?” जैसा भी मुँह से कुछ नहीं निकला था। 

सलीम उसकी तरफ़ एक मिनट चुपचाप देखता रहा, फिर ठहाका मार कर हँस दिया था। 

“डर गईं?” 

“हँ?” उसके गले में शब्द तो क्या थूक तक फ़ँस गया था। 

“अरे पागल हो क्या? यह सचमुच का तलाक़ नहीं है! मैं आता-जाता रहूँगा, तुम्हारा शौहर भी रहूँगा! यह सिर्फ़ काग़ज़ी कार्यवाही है। मैं सब कारोबार छोड़ कर यहाँ तो बैठा नहीं रह सकता? समझ रही हो न तुम?” 

“क्या मतलब?” उसकी कुछ साँस में साँस आई पर बात अभी भी समझ नहीं आई थी। 

सलीम कुछ चिडचिड़ा आया, “तुम औरतें कुछ समझती तो हो नहीं, अपनी टाँग फ़ालतू में अड़ाती हो। “

“पर हम यहाँ अकेले, आपके बिना रहेंगे कैसे? खाना-पीना, रहना . . . सब? मैं तो . . .” उसका वाक्य आधा रह गया था। 

सलीम ने कुछ ऊँची आवाज़ में कहा, “अब वो सब क्या तुम सोचोगी? सबका पक्का इंतज़ाम कर के जा रहा हूँ। सरकार की तरफ़ से तुम्हें बराबर, हर महीने पैसे मिलेंगे। अपने लिए भी और शबनम के लिए भी! आगे जो बच्चे होंगे, उनके लिए भी। बस तुम्हें हर महीने उस सरकारी दफ़्तर जाना होगा, जो तुम्हें पहले दिखाया था। सरकारी इंतज़ाम रहते हैं यहाँ सब बातों के, घबराने की कोई बात नहीं है।”

“हाय, लेकिन घर पर लोग क्या कहेंगे? तलाक़ के बाद आप चले जायेंगे? मैं अकेली कैसे रहूँगी? हमें नहीं चाहिए ऐसे पैसे,” वो रुँआसी होकर लगभग ठुनकते हुए बोली। 

सलीम का चेहरा कड़ा हो आया, थोड़ा भौंह चढ़ा कर वो कुछ कड़ी आवाज़ में बोला, “बेवकूफ़ मत बनो। मेरा प्लान मत बिगाड़ो। असली में तलाक़ नहीं दे रहा हूँ। घर पर किसी को बताने की कोई ज़रूरत ही नहीं है, हाँ, मुझे जाना होगा। मैं तो वैसे भी यहाँ का बाशिंदा हो चुका हूँ पर तुम को और शबनम को यहीं रहना होगा,” फिर सोचते हुए समझाने के स्वर में बोला, “और तुम्हीं अकेली नहीं हो ऐसे रहने वाली। बहुत से देशों की औरतें यहाँ ऐसे रहती हैं। उनके पति आते-जाते रहते हैं। और हाँ, तलाक़ काग़ज़ पर है सो उस बात को दिल से निकाल दो।”

सलीम उसे बहुत-कुछ समझाता रहा। 

पहले-पहल तो उसे समझ ही नहीं आया था फिर बाद में उसने भी देखा कि सच, बहुत सी औरतें इस तरह काग़ज़ पर ख़ाविंद के दिए गए तलाक़ के बाद यहाँ रहती हैं। मियाँ साल में एकाध बार चक्कर लगाते हैं, महीना भर मज़ा रहता है, बाक़ी समय बच्चे और खा़तून! हर एक बच्चे की परवरिश के लिए सरकार से पैसा, रहने के लिए सस्ते दर के मकान! उसने भी सोचा कि यह देश बच्चों को बड़ा करने के हिसाब से सही है। सही पढ़-लिख जाएँगे तो अच्छी नौकरियों पर लग जाएँगे। वह मन को किसी तरह समझाने लगी पर अकेलापन था कि काटने को दौड़ता। 
कुछ महीनों के बाद जब कई औरतों से उसकी दोस्ती हो गई तो उन में से कुछ ने तो यहाँ तक कहा कि उन्हें इस मुल़्क में मिली आज़ादी अपने देश में रहने से ज़्यादा अच्छी लगती है! 

वो तो यह सुन कर बस तौबा कर के रह गई थी। 

सलीम ने जो सोचा, वो किया। जाने से पहले उसने एक मौलवी साहब के परिवार से उसको मिलवा दिया। वे ही उसके सर-परस्त बने। उसे यह भी हिदायत मिली कि उनकी बीबी नफ़ीसा के पास हफ़्ते में एक बार इस्लाम की मजलिस में उसे जाना होगा। वो जाने लगी। उसे भी अच्छा लगता, बहुत सी औरतें वहाँ इकट्ठी होतीं, भीड़ . . . भाड़ . . खाना . . . गप्पबाज़ी . . . बातें . . .!! 

♦ ♦ ♦

सफ़ीना का दर्द बढ़ गया था। वह एक नीम बेहोशी में थी जहाँ उसे नए-पुराने के भेद करने की सुध नहीं थी पर वह लोगों की आवाज़ सुन सकती थी। साथ वाली बुढ़िया के दो बेटे शायद आ गए थे। वे उस से ’पिछली रात कैसी रही?’ पूछ रहे थे। बुढ़िया अपनी चुप्पी के बीच शायद धीरे-धीरे सुबक जाती थी जैसे वो आवाज़ करके रोने से डर रही हो। जैसे वो शर्मिन्दा हो अपनी बीमारी से, अपने बच्चों के जीवन में इस तरह अस्पताल में पड़ जाने के ख़लल से। वो शर्म में, अपनी छाती में ही अपना रोना दबा कर रो रही थी। 

उसकी आवाज़ के पनाले सफ़ीना के सीने में बह रहे थे। उस औरत के आँसुओं से भीगे झुर्रीदार चेहरे में सफ़ीना अपना चेहरा देख रही थी और अपनी इस हालत पर आँसू बहा रही थी। 

चार बच्चों की माँ है सफ़ीना, पर वो यहाँ अकेली पड़ी रो रही है। अख़्तर यूनिवर्सिटी हॉस्टेल में है, कल शाम उस से भी बात की। उसे आने से मना कर दिया। क्या करेगा वो आकर? हो सकता है कि सलीम नाराज़ हो जाएँ कि उसकी पढ़ाई ज़ाया करवा दी। या वो भी इस बूढ़ी के लड़कों की तरह लैपटॉप लेकर ही आएगा तो भी क्या फ़ायदा? माँ के बीमार पड़ जाने से बच्चों की ज़िन्दगी थोड़े ही रुक जाएगी? बच्चे जब छोटे होते हैं बस तब तक ही उनकी ज़िन्दगी माँ के आसपास घूमती है बाद में तो सबकी अपनी दुनिया . . . उसका छोटा . . .!! दिल में हूक सी उठी! उसका सबसे प्यारा . . . छोटा बेटा, पिश्ता, यानी रायन को सलीम अपने साथ यमन ले गए हैं। 8 साल का लड़का है, माँ का लाड़ला, कहीं माँ के दुपट्टे से ही बँधा न रह जाए, इसलिए बड़े होने की तालीम देने के लिए सफ़ीना को अपने प्यारे पिश्ता से अलग कर दिया गया। 

रह-रह के सफ़ीना के दिल में टीस उठती है। उसका सिर फिर चकराया। वह शायद एक तीखी आवाज़ करती बिस्तर से उठने को हुई। साथ वाले हिस्से से किसी ने उसका यों उठना देखा, नर्स को ज़ोर से आवाज़ लगाई पर जब तक नर्स आती सफ़ीना फिर बिस्तर पर बेहोश हो कर गिर पड़ी थी। 

♦ ♦ ♦

जब उसे होश आया तो राबिया उसके पास बैठी थी। उसे जागता देख कर बोली, “अल्लाह का शुक्र है कि तुम उठ तो गईं। डॉक्टर आया था, ग्लूकोस और चढ़ाने को कह गया है . . . रोज़ की तीन बोतल चढ़ा रहे हैं पर तुम तो अब भी बेहाल ही हो।” 

फिर कुछ आवाज़ धीरे कर के बोली, “यह तो कहो कैनेडा है जो मुफ़्त इलाज हो रहा है तुम्हारा सफ़ीना, वरना पिछले तीन दिन का ख़र्चा तुम जानती हो कि कितना होता। अब, बस जल्दी ठीक हो जाओ और इस बिस्तर को छोड़ कर, अपने घर के बिस्तर पर चलकर सोओ।”

राबिया हर समय पैसे का हिसाब लगाती रहती है। सलीम को यह बात अच्छी लगती है। कहता है, “बीबी में शऊर हो तो आदमी बहुत पैसा जोड़ सकता है।” 

वो यह बात सफ़ीना को ज़्यादा ख़र्च करने पर ताने की तरह सुनाता है। सफ़ीना का मन आया राबिया को जाने को कह दे पर उसमें न पहले इतनी हिम्मत थी और न अब। वह कुछ देर चुपचाप ऐसे ही पड़ी रही। फिर धीरे से बोली, “शब्बीर?” 

“उसके लिए वक़ील से बात कर रहे हैं मौलवी साहब। वो सब क़िस्सा जानते हैं। “

जानती तो सफ़ीना भी है, तभी तो उसे रोकती है . . . वह मन मसोस कर, मुँह मोड़ कर पड़ गई। 

“इज़ शी अप (क्या यह उठ गई है)?” एक नर्स ने शायद राबिया को बोलते देख लिया था। राबिया ने ’हाँ’ में गर्दन हिला दी। 

नर्स थर्मामीटर और दवाई ले कर आ गई और फिर राबिया को समझा कर बोली, “डोन्ट गिव हर एनी स्ट्रैस (उनको परेशान मत करें)।” 

राबिया ने गर्दन तो हिला दी पर उसके मुड़ते ही मुँह बनाया। 

“स्ट्रैस मत दो, इन लोगों का क्या? मुँह उठाया, कह दिया। इनको तो कोई स्ट्रैस है नहीं लाइफ़ में, बच्चे निकल जाते हैं घर से अठ्ठारह की उम्र में, . . . करते रहें कुछ भी, इन्हें क्या! इनकी पार्टियाँ, रंगरलियाँ चलती रहेंगी। यहाँ तो सब को सीने से लगा के चलने के बाद भी लड़का बैठा है जेल में और बेटी का कुछ पता नहीं . . . बताओ, स्ट्रैस कैसे नहीं होगा . . . अरे, क्या नहीं किया तुमने बच्चों के लिए . . .” 

♦ ♦ ♦

अभी राबिया और बोलती जाती शायद पर सफ़ीना यह सब बर्दाश्त नहीं कर पाई। उसका पेट मरोड़ खा गया और वह फिर झटके से उल्टी करने को उठी। ख़ुद ही झपट कर चिलमची उठाई और . . .

राबिया अचानक हुए इस हादसे से कुछ रुक गई। उसके मन में साफ़िया के लिए दुख भी हुआ। 

“बेचारी,” मुँह में बुदबुदाते हुए उसने पानी का गिलास उठा कर साफ़िया को कुल्ला करवाया और मुँह पोंछने को तौलिया दे दिया। 

“कुछ खाओगी क्या? घर से कुछ भिजवा दूँ? दो दिन से ढंग से खाना नहीं खाया तुमने, बहुत ख़ून बहा चुकी हो . . . ख़ाली पेट तो उबकाई आएगी ही।”

साफ़िया ने हाथ से मना कर दिया। सिर फट रहा था। गोली का असर भी होने लगा था। आँखें झिपने लगीं। वह कब सोई और कब राबिया चली गई, उसे पता नहीं चला। आँख खुली तो शायद शाम हो गई थी। पास की मेज़ पर कुछ खाना ढका रखा था। अस्पताल वाले ही कुछ रख गए थे। कराहते हुए वह उठ बैठी, भूख़ लग आई थी। प्लेट में रखे टोस्ट वह कुतरने लगी। चाय का पानी ठंडा हो गया था। वह सोच ही रही थी कि काश उसे गरम चाय मिल जाती कि तभी नर्स भीतर आई। वह साथ वाले बिस्तर की बूढ़ी औरत को दवा खिलाने आई थी। सफ़ीना को बैठे देखा तो हल्के से मुस्कुरा कर कहा, “आख़िर तुम खाना खाने उठीं तो। कुछ चाहिए क्या?” 

सफ़ीना ने संकोच से कहा, “गर्म चाय मिल सकती है क्या?” 

“ज़रूर, मैं यह इंजेक्शन लगा लूँ, तो लाती हूँ।” 

कुछ देर में वह चाय, क्रीम की डिब्बियाँ और चीनी के छोटे पैकेट उठाए लौटी थी। 

“लो, कैसा लग रहा है अब?” 

 “सिर बहुत भारी हो रहा है” 

“हाँ, घाव गहरा है और ख़ून भी बह गया है पर बेहतर हो रही हो। मैं रात की नर्स हूँ, एलियट नाम है, कुछ भी चाहिए तो बैल बजाना,” कहते हुए वह जाने को हुई, फिर एकाएक कुछ याद आने से दरवाज़े के पास रुक कर बोली, “शाम की नर्स का एक संदेश था तुम्हारे लिए। किसी सलीम का फ़ोन आया था तुम्हारे लिए, तुम सो रही थीं तो उसने तुम्हें उठाया नहीं,” कहते हुए वह बाहर निकल गई। 

चाय की गर्मी से जो शान्ति उसके सिर को अभी मिलना ही शुरू हुई थी, वह पल भर में ग़ायब हो गई। पहले घबराहट आई, फिर उलझन, फिर चिड़चिड़ाहट और फिर ग़ुस्सा। 

सलीम को ज़रूर राबिया के ख़ाविंद ने ख़बर दी होगी। पर क्या ख़बर आज ही दी या ख़बर तीन दिन पहले दी गई और आज उसे फ़ोन करने का होश आया? पिछले एक महीने से, जब से वह रायन को लेकर गया है, उसने केवल एक पहुँचने का फ़ोन किया है। रायन से भी बात नहीं करवाई। साफ़िया ने दिन में तीन-तीन बार फ़ोन किए पर हर बार फ़ोन घनघना कर उसे ही मुँह चिढ़ाता रहा। इतना सख़्त दिल हो गया है सलीम? एक माँ से उसका बच्चा छीन कर ले जाने की ज़ालिम हरकत की है उसने। उसे ग़ुस्सा यह है कि शबनम को क्यों जाने दिया? पर साफ़िया ने कहाँ जाने दिया उसे? वह तो हर काम सलीम के हिसाब से ही कर रही थी। कहा, मौलवी साहब के यहाँ बच्चों को लेकर जाओ, लेकर गई। फिर भी इल्ज़ाम है कि तुमने बच्चों को सही तालीम नहीं दी। कहा ख़ुद क्लास में बैठ कर मज़हब की बात सीखो, तो पिछले २० साल से वह यही कर रही है। कहा गया, सरकारी दफ़्तर से हर महीने पैसे लेकर आओ और एक-एक पैसे का हिसाब-किताब रखो . . . उसने रखा पर सलीम को लगता है कि वह शाह ख़र्च है। वह जब से आई है, केवल एक बार अपनी अम्मी-अब्बू से मिलने गई, दूसरे जापे के बाद। 

जैसा उठाया, वैसे उठी! जैसा बैठाया, वैसे बैठी! पर इंसान का दिमाग़ तो बंद नहीं हो जाता बिल्कुल? उसकी भी आँखें हैं, उसे भी दिखाई देता है। यहाँ की औरतें किस तरह रहती हैं और वो कैसे रहती है! सफ़ीना को महीने भर पहले के पीठ पर पड़े नील के निशान टीसने लगे। मन उमड़ने लगा। आँखों से आँसू बह चले। 

“अम्माँ!” गले में अवाज़ घुट रही थी। आँखें डबडबा कर उबलता पानी बहाने लगीं। 

साथ वाले बिस्तर से कराहने की आवाज़ आई। साफ़िया सावधान हुई, हाथ में पकड़े टोस्ट पर ध्यान गया। खाने की इच्छा मर गई थी, वह उसे प्लेट पर रख, धीरे से नीचे सरक गई और शाल से सिर लपेट कर आँखों पर भी डाल लिया। अभी कोई न कोई नर्स आएगी, साफ़िया नहीं चाहती कि कोई उसके आँसू देखे। 

’औरत की ज़िन्दगी ऐसी ही क्यों होती है? क्यों मुझे ही सब सहना पड़ता है? घर सँभालना मेरा काम है पर मुझे इस काम के बदले क्या मिलता है?” मन अब भी बुड़बुड़ा रहा था। मैं कब तक सहूँगी? सब अपनी-अपनी राह निकले, मेरा क्या होगा? शबनम गई, अख़्तर भी गया ही समझो, शब्बीर का कोई भरोसा नहीं, मेरा प्यारा रायन भी . . .! आह . . .! कोई अपना नहीं! पर क्या करूँ अब? दर्द शरीर से ज़्यादा मन को कुचलने लगा। 

पास वाले बिस्तर पर बूढ़ी की कराहें ऊँचीं हो गईं। क्या जाने कि वह भी अपनी आज की बेबसी पर रो रही है या पुराने दर्दों पर . . . कोई उसके दर्द को कम नहीं कर सकता पर क्या कोई सफ़ीना के दर्द को कम कर सकता है? कौन करेगा? 

आँखों से आँसुओं का दरिया बह रहा था। बदन की हड्डी-हड्डी दुखने लगी। पुरानी पड़ी मारें भीतर से उभर कर सतह पर आ गई। हर काम सलीम की मर्ज़ी से . . . पर आख़िर में क्या? हथेली से उसने आँसू पोंछे, जैसे ख़ुद को हिम्मत बँधा रही हो। वह ख़ुद को समझाने लगी, ’यह नहीं कि वह ख़ुद से कुछ नहीं करती। पिछले इतने सालों से वही तो घर चला रही है। जो पैसा आता है, उसी में चला रही है। सलीम अपने से कुछ ले आए तो ठीक, वह तो माँगने की बजाए डॉलर देती आई है उसको। डॉलर के बदल साढ़े तीन गुना मिलता है यमनी रिआल . . . फ़ायदा डॉलर को रिआल में बदलने में है, रिआल को डॉलर में नहीं। सलीम ने ही उसे समझाया था यह सब। वह सब करती है पर सलीम की पकड़ के भीतर। उसके बाद भी सलीम कह चुका है कि सफ़ीना की कमअक़्ल है। उसके हिसाब से सभी औरतें ऐसी ही होती हैं, यमन में रहने वाली उसकी दो बीबियाँ भी. . .! सलीम की सोच क्या केवल सलीम की है, ऐसा तो बहुत सारे मर्द सोचते है . . .।’ 

♦ ♦ ♦

सफ़ीना का रोना थम रहा था। अपने को समझाना कारग़र साबित हो रहा था। 

बूढ़ी शायद थक कर झपकी ले रही थी। दो बिस्तरों पर दो उम्रों की औरतें! अपने-अपने दर्द से कराह रही थीं, रो रहीं थीं। कौन है यह बूढ़ी? उसका नाम और तकलीफ़ कुछ नहीं जानती सफ़ीना पर उसके दर्द की कराहों को पहचान रही है, उसके रोने को महसूस कर रही है। कौन है सफ़ीना? . . . इस बड़े अस्पताल के दो बिस्तरों वाले इस एक कमरे में पड़ी, अकेली और लाचार औरत। चार बच्चों की माँ . . . पर एक भी पास नहीं। कैसी माँ है सफ़ीना? यह बूढ़ी भी माँ है . . . इसके बेटे . . . पर वे तो आए थे। इसने अपने हिस्से का सब कुछ देख लिया है . . .। क्या पता वह सब कुछ क्या था . . . पर जो था वो लगभग जी ही चुकी है, मर जाना चाहती है पर मरना क्या अपने हाथ में है? सफ़ीना को वो सुबह याद आई जब वो अपने हाथों . . .! 

बेवक़ूफ़ सफ़ीना!! 

क्या सफ़ीना ने जी लिया अपने हिस्से का सब कुछ? क्या यही सब आना था उसके पल्ले? ऐसा नहीं हो सकता। सब कुछ तो नहीं ही जिया . . . सुख के शबनमी पल . . . सुकून की हवाओं से भरा समय . . .!! 

ओह!! उसने कराह कर करवट बदल ली। 

उसका बदन और दिमाग़ बिल्कुल ख़ाली हो चुके थे। बिस्तर पर उसका सिकुड़ा बदन पड़ा था। सामने ख़ाली कुर्सी जैसे उसकी ज़िदगी के ख़ालीपन को बता रही थी। उसकी सूखी आँखें बहुत देर तक ख़ाली कुर्सी के ख़ालीपन को घूरती रहीं। उसके अपने ख़ालीपन में, कमरे का ख़ालीपन अपनी पूरी सच्चाई के साथ उतर रहा था। अस्पताल का यह बिस्तर उसके दिमाग़ में, जैसे समझ के नए रौशनदान खोल रहा था . . .। 

’अगर वो न गिरती, यहाँ दर्द और कमज़ोरी से लड़ती, अकेले पड़ी आँसू न बहाती . . . इस बूढ़ी की कराहों में अपना आख़िरी वक़्त न देखती तो? . . . तो क्या वह अपनी ज़िन्दगी को इस तरह साफ़-साफ़ देख पाती? अकेले होने की कड़वी सच्चाई को जी पाती? . . . इस कमरे के ये दो बिस्तर दो अलग हालातों को बयान करते हुए भी एक से दर्द से लबरेज़ . . .।” 

वो सोचती चली जा रही थी कि नर्स की आवाज़ से उसका ध्यान टूटा, “मिस सफ़ीना, आपके लिए फ़ोन है!” 

उसने सवालिया निगाहें ऊपर उठाईं। 

“योर हज़बैंड, मिस्टर सलीम इज़ ऑन द लाइन (आपके पति, सलीम लाइन पर हैं)।” 

वो उन्हीं ख़ाली निग़ाहों से नर्स को देखती रही। 

नर्स ने दोबारा उसे आवाज़ दी, “मिस सफ़ीना?” 

“ओह, सॉरी!” वह कुछ अपने आप में स्थिर हुई, फिर साँस ले कर बोली, “पर मेरा तो कोई पति नहीं, मैं तलाक़शुदा हूँ।” 

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  • बेहद मार्मिक कहानी! नायिका का नाम कहीं सफ़ीना, कहीं साफिया हो गया है, शेष सब बहुत संतुलित, भावपूर्ण, कलात्मक और लीक से हटकर कथा प्रवाह पाठक को बाँधे रखता है. शैलजा जी को हार्दिक बधाई!

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