कल सुबह मैं स्कूल-ट्रिप पर पैरिस जा रही हूँ; मुझे चिंता है कि मेरी अनुपस्थिति में पापा-मम्मी एक दूसरे से कैसे बात करेंगे? एक महीने से अधिक हो चुका है कि पापा-मम्मी को जो एक दूसरे से कहना होता है, वे मेरे माध्यम से कहते-सुनते हैं। शुरू-शुरू में तो मुझे यह खेल अच्छा लगा था क्योंकि उनके बीच संवाद का ज़रिया मैं थी और इसीलिए वे दोनों मेरी ख़ूब आवाभगत कर रहे थे और मेरी हर बात पर तवज्जो दे रहे थे, चाहे वह कितनी भी बेवुक़ूफ़ी भरी क्यों न हो। किन्तु कुछ ही दिनों के बाद मैं इस खेल से बोर हो गयी क्योंकि अपने अपने छोटे-छोटे पैग़ामों के लिए भी वे मुझे परेशान करते रहते हैं।  कल रात की ही तो बात है; मैं फोन पर अपनी सहेली एप्रिल से गृहकार्य के विषय में बात कर रही थी और मम्मी बार-बार मुझे परेशान कर रही… आगे पढ़ें
  “अक्षत बीच मत्थे पर लगाइव,” ठकुराइन चिल्लाईं। छोटी बहू काँप उठी। उसने सिन्दूर, तेल, हल्दी, कुँए की दूब आदि को थाली में सजाया तथा भोलेनाथ का सुमिरन किया और आँगन में जाकर कलुआ को पतला-सा मगर लम्बा टीका लगाया। तब तक दनदनाती हुई ठकुराइन पहुँची और घुड़कते हुये छोटी बहू के हाथ से थाली छीन ली। ठकुराइन ने एक लम्बा और चटख टीका कलुआ के माथे पर लगाया और ‘‘हर-हर महादेव” का उदघोष किया। हर्ष से पुलकते हुये ठकुराइन ने कहा, ‘‘जा बेटवा!” उनका रोम-रोम अपने बेटे को ‘‘विजयी भव’ का आशीर्वाद दे रहा था। उनका ये बेटा मुल्क की सरहद पर लड़ने नहीं जा रहा था और न ही किसी नौकरी के साक्षात्कार पर जा रहा था। उनका ये बेटा आज गाँव की सबसे प्रतिष्ठित जंग लड़ने जा रहा था। शाम को शंकरजी के थान पर उनके बेटे की क़िस्मत का फ़ैसला जो होना था। दरअसल… आगे पढ़ें
  अचानक चीं ईं . . . ईं करके किसी छोटे स्टेशन पर ट्रेन रुक गई थी। यूँ छोटे स्टेशनों पर इस ट्रेन का स्टॉपेज नहीं था, पर लोग अक़्सर यहाँ उतरने के लिये चेन-पुल कर देते हैं। ट्रेन खड़ी होते ही चाय-चाय की आवाज़ें आने लगीं। मैंने अलसाए भाव से खिड़की से बाहर झाँका, एक चाय वाले को देखकर चौंक गया। उससे नज़रें मिलीं तो उसके चेहरे पर एक परिचित सी मुस्कान दिखी, ‘अरे! . . . ये तो बंसी है शायद,’ मैंने उसे पुकारना चाहा तब तक ट्रेन आगे बढ़ चुकी थी; चाय वाला भी कुछ अचकचाई मुद्रा से मुझे देखता रह गया। मैंने देखा वह वहीं खड़ा लगातार मेरी ओर देखे जा रहा था . . . ट्रेन की गति पकड़ते ही वह एक धब्बे के रूप में तब्दील होते-होते विलुप्त हो गया, मन उलझ-सा गया क्या यह बंसी ही था? अगर बंसी ही था… आगे पढ़ें
  घर में प्रवेश करते ही नज़र अलमारी पर जा रुकी—शर्बत सेट, किताबें, कैसेट्स और न जाने क्या-क्या अबाड़-कबाड़। मन में आया अभी उठाकर सबसे पहले इन्हें बाहर फेंक दूँ। मात्र 5-6 वर्षों में क्या कुछ नहीं बदल गया। कभी ये अलमारी मेरी अमानत हुआ करती थी। क़रीने से रखी किताबें, कार्ड-बोर्ड, स्केच पेन, पेंट की शीशियाँ, ख़ूबसूरत तसवीरें, डायरी, मेरा मनी बैग, शो पीस और ढेर सारी लुभावनी चीज़ें। किसी की हिम्मत नहीं होती मेरी अलमारी छूने की। हमेशा ताला बंद रहता और चाभी मेरे हाथ में होती। ससुराल जाते वक़्त सख़्त हिदायत देकर गई थी, “मेरी अलमारी के सामानों को इधर-उधर नहीं करना।” आज वही अलमारी अपने बदले रंग-रूप में मुँह चिढ़ा रही थी मुझे। चाय पीकर घर का कोना-कोना देखने की तीव्र लालसा रोक नहीं पाई। पापा के कमरे में जाले लगे थे। उनका स्टडी-टेबल धूल-गर्द से मढ़ा हुआ था। परदे के गाढ़े रंग भी… आगे पढ़ें
  “बाबूजीऽऽऽऽऽ . . .”  उसकी आवाज़ में तल्ख़ी थी। वह चीखकर बोला था। बोलते समय उसके ओंठ काँपे थे। चेहरे पर तनाव की परछाइयाँ साफ़ देखी जा सकती थीं। वह तमतमाया हुआ था। उसकी तर्जनी बाबूजी के तरफ़ तनी हुई थी। “बाबूजी . . . बस! बस बहुत हो चुका। जितना कहना था . . . कह चुके। हमें अब समझाने की ज़रूरत नहीं। बहुत समझा चुके आप। अब हम बच्चे नहीं रहे . . . हमें अपनी ज़िन्दगी अपने हिसाब से जीने दें . . .” रामप्रसाद का चेहरा फक पड़ गया था। आवाज़ गले में फँसकर रह गयी थी। मुँह खुला रह गया था। वे अवाक्‌ थे। अजय के चेहरे पर क्रोध की परतों को कुरेदकर देखने लगे थे। मन में विचारों का तूफ़ान उठ खड़ा हुआ था। अंदर सब क्षत-विक्षत था। नज़ारा देखते हुए वे सोचने लगे थे। अजय में इतनी हिम्मत कहाँ से… आगे पढ़ें
  ख़ून को जला देने वाली जून की तपती दुपहरी। लोगों के शरीर से पसीना चूह रहा था। दिल्ली रेलवे स्टेशन पर बैठी लाजो अपने गाँव जाने वाली गाड़ी की प्रतीक्षा कर रही थी। उसके मुर्झाए हुए चेहरे को देखकर कोई भी कह सकता था कि वह बहुत परेशान है। वह किसी गहरी सोच में डूबी हुई थी। उसके कानों से किसी की थकी हुई आवाज़ टकराई।  “भई, अपने बीबी-बच्चों के लिए पसीना नहीं बहाएँगे, तो किसके लिए बहाएँगे?”  सोच की गहरी खाई से निकलकर लाजो ने आवाज़ की तरफ़ देखा। दो पतले-दुबले अधेड़ आदमी लकड़ी के बड़े ठेलों पर लदे भारी सामान को कंधे से खींचकर माल गोदाम की तरफ़ ले जा रहे थे। गर्मी में भारी ठेलों को खींचना मुश्किल हो रहा था फिर भी दोनों पूरी ताक़त से ठेलों को खींच रहे थे। एक तो चिलचिलाती धूप ऊपर से गर्मी का मौसम। दोनों पसीने से… आगे पढ़ें
  जैसै–जैसे दिन चढ़ता जा रहा था, चौधरी दीनबंधु की ऊबन बढ़ती जा रही थी। वे कभी बाहर निकलकर टोह ले रहे थे, तो कभी मन बहलाने के लिए छत पर चले जा रहे थे। कभी मन ही मन नौकर सोमारू को कोस रहे थे कि अभी तक वह कोई ख़बर क्यों नहीं लाया। वे पिछले दो दिनों से ज़नानी बखरी में पड़े हुए थे क्योंकि उनकी बैठक में रुस्तम मियाँ की बेटी नफ़ीसा की बारात रुकी हुई थी। वे बार–बार बाहर आकर पता लगाने की कोशिश कर रहे थे कि उनके मवेशी कैसे हैं। वे अपने मवेशियों से बहुत लगाव रखते थे। उनके पास एक जर्सी और दो साहिवाल गाएँ थीं। चार बैल और दो बछड़े थे। एक भैंस भी थी। एक साहिवाल और भैंस दुधारू थीं। चौधरी साहब को घोड़ा पालने और घुड़सवारी का भी शौक़ था। उन्होंने दो काठियावाड़ी घोड़े भी पाल रखे थे। उनके… आगे पढ़ें
  “मैम, क्या करूँ? मेरा बच्चा छह महीने का है, कमज़ोर है, अब तक न बोतल से दूध पीना सीखा है न किसी और के पास रहता है।” उस तरफ़ से फोन पर रुआँसी आवाज़ थी। “छुट्टी लेकर घर बैठो, परेशान मत हो,” इधर से सलाह मिली।  “हाय मैम। छुट्टी कैसे लूँ? छुट्टी के नाम से डिपार्टमेंट में सबकी भौंहें टेढ़ी हो जाती हैं,” उधर से डरी हिचकिचाती आवाज़ आई।  “मेरा भी बेबी छोटा है, मैंने ली है न,” आत्मविश्वास से भरपूर आवाज़ में जवाब आया।  “मैम, मेरे यहाँ नेफ़्रोलॉजी (किडनी रोग) में अधिकांश सहयोगी डॉक्टर पुरुष हैं। छुट्टी की बात पर सब ऐसे घूरते हैं जैसे कोई भयानक अपराध कर दिया हो। कमेंट करते हैं ‘काम नहीं करना होता है इन डॉक्टरों को, छुट्टियाँ लेकर बैठ जाती हैं, ये महिलाएँ भी क्या रिसर्च करेंगीं’। “मैम, करियर, प्रमोशन, सुख-चैन सब कुछ दाँव पर लगा रहता है। आप का… आगे पढ़ें
  प्रोन्नति की ख़ुशी में मैं और मेरा परिवार मगन ही था तभी विभाग द्वारा स्थानान्तरण की सूची जारी कर दी गई। उस सूची के अनुसार मेरा स्थानान्तरण बड़ोदरा प्रधान कार्यालय हो गया था और मुझे एक सप्ताह के अन्दर नई नियुक्ति पर पहुँचना था। इसकी जानकारी होते ही हम लोगों की प्रसन्नता धूमिल हो गई थी। ख़ैर! नौकरी की है तो आदेश का अनुपालन तो करना ही पड़ेगा, यही सोच कर भोपाल प्रधान कार्यालय से कार्य मुक्त होने पर मैं सपरिवार बड़ोदरा पहुँच गया। बड़ोदरा प्रधान कार्यालय में रिपोर्ट करने पर मुझे भरूच ज़िले की जंबूसर शाखा में नियुक्ति का आदेश पकड़ा दिया गया। विवश मुझे सपरिवार जंबूसर क़स्बे के लिए प्रस्थान करना पड़ा। जंबूसर क़स्बे में एक दिन बाज़ार में सब्ज़ी ख़रीदते समय मुझे घनश्याम दिखाई पड़ा। मैं जब इन्टरमीडिएट की परीक्षा पास करने के बाद जहानाबाद में रह रही अपनी मौसी के घर पर रह… आगे पढ़ें
    इस आवाज़ के कई तरह से मायने लगाए जा सकते थे। मानों कोई अँधेरी, गहरी खाई से आवाज़ दे रहा हो। हल्की, कातर और सुन लिए जाने की उम्मीद से भरी हुई। मुझे यक़ीन नहीं हो रहा था। उसने फोन करके इतना कातरता से बुलाया था कि मुझे लगा कोई इमरजेंसी हो गई हो। मैं अपने स्टुडियो में बैठ कर पेंट कर रही थी। किसी अनजान स्त्री का बदहवास पोट्रेट बना रही थी। उसकी आखों के पास स्याह डोरे डाल ही रही थी कि मोबाइल घनघना उठा था। मैंने ब्रश वहीं छोड़ा, एप्रिन उतारा और दौड़ती हुई उसके घर की तरफ़ जा रही थी। वो मेरे अपार्टमेंट के पीछे एक बड़ी-सी कोठी में रहती थी। वो अमीरों की नयी-नयी बसी हुई कॉलोनी थी। पैदल का रास्ता मैंने लगभग दौड़ते हुए तय किया था। मेरे लिए ये हैरानी की बात थी। इतनी चंचल, बिंदास, हँसोड़ स्त्री का… आगे पढ़ें
  हर साल की तरह इस साल भी 19 मई को रोशनी की बेटी कलि ने अपनी माँ को नैनीताल की फ़्लाइट टिकट ईमेल पर भेज दिया। 21 तारीख़ सुबह की फ़्लाइट थी। पिछले पाच सालों से रोशनी ने मई महीने का यह आख़िरी हफ़्ता कहीं एकांत में बिताने का निर्णय लिया है। वह कहाँ जाती है, क्यों जाती है वह एक रहस्य है। उसके जीवन का एकमात्र हमराज़ सिर्फ़ उसकी बेटी कलि है। अपनी माँ के साथ उसका एक अलग प्रकार का लगाव है। वे दोनों माँ-बेटी कम और सहेली ज़्यादा थीं।  रोशनी किसी को इस एकांतवास का हिस्सा नहीं बनने देना चाहती थी क्योंकि तमाम टुकड़ों में बँटते-बँटते, उसने अपना एक हिस्सा कहीं पर सुरक्षित रख दिया था। यह उसकी ज़िंदगी का वह हिस्सा था जिस पर केवल उसका अपना अधिकार था। एक समझदार पत्नी, माँ, बहन, बेटी, बुआ और अनंत रिश्तों को बख़ूबी निभाने वाली… आगे पढ़ें
  गायत्री का मन तो जैसे बल्लियों उछल रहा था। यह सोच-सोचकर फूली नहीं समा रही थी कि “एक ही बेटा है लेकिन है लाख़ों में एक! ऐसा आस-पास कहाँ किसी का बेटा दिखता है जिसकी माँ उसपर इस तरह नाज़ कर पाए, किसी का बेटा ऐसा नहीं है जो इतना श्रवण हो और जो अपनी माँ का इतना ख़्याल रखता हो! आज अयान के पापा होते तो देखते अपने बेटे को कि शादी हो जाने के बाद भी एक बेटा अपनी माँ का किस तरह ख़्याल रखता है। उनका सारा सिद्धांत धरा-का-धरा रह जाता। हमेशा बेटी के नहीं होने का मातम करते रहते थे। गायत्री को याद आ रहा था कि किस तरह वे हज़ारों बार यह जुमला बोलते रहते थे, “बेटा तभी तक बेटा होता है जब तक कि उसकी शादी नहीं हो जाती, लेकिन एक बेटी जीवन-भर बेटी रहती है,” और इसीलिए वे एक बेटी… आगे पढ़ें
  सुजाता और मनोज में आज दो-तीन दिनों से झिकझिक हो रही है। ये दोनों अपने शहर से बहुत दूर हैदराबाद में रहते हैं, अपने छोटे से फ़्लैट में। फ़्लैट अपना है। दोनों ही नौकरी में हैं। मनोज यहीं किसी सॉफ़्टवेयर कंपनी में इंजीनियर है, और सुजाता भी इसी कंपनी में डेटा ऑपरेटर है। तीन साल पहले दोनों की शादी हुई है – लव मैरिज। दोनों विवाह से पहले ही नौकरी पर हैं। यह फ़्लैट विवाह के बाद लिया गया है। इसका किश्त अभी भी चल रहा है। मनोज के पिता जी आने वाले हैं। मनोज की माँ नहीं हैं, कोई दस वर्ष पहले गुज़र गईं। पिताजी कॉलेज में प्रोफ़ेसर थे, पिछले साल ही रिटायर हुए हैं। बेटे के यहाँ पहली बार आ रहे हैं। पिताजी ने कोई आठ दिन पहले ही अपने आने की सूचना मनोज को दे दी थी। मनोज ख़ुश है कि पिताजी आ रहे… आगे पढ़ें
  जीवन भर जिन बच्चों के लिए नमिता संघर्ष करती रही, उन बच्चों के व्यवहार से इतनी उपेक्षा मिली कि नमिता ने अपनी ममता के ख़िलाफ़ जाकर उन्हें त्याग दिया और आहत होकर एक कठोर फ़ैसला ले लिया।  नमिता ने काँपते हाथों से घर का ताला खोला और अंदर गई। भँवर में फँसी नाव की तरह विचारों की नाव में डोलती वह कुर्सी पर बैठ गई। आज उसका शरीर और मन थक कर चूर हो चुका था। बरामदे की मुँडेर पर जाती हुई धूप की किरणें मस्त हवा के साथ गुफ़्तुगू कर रही थीं। प्रकृति की रम्यता नमिता को हमेशा ही सुकून देती रही है। पर आज नमिता का मन और शरीर मानव विडम्बनाओं के झंझावात पर उलझ गया था।  आज वह सोचती है कि मनुष्य जीवन भर किस तरह झूठे रिश्ते-नातों, मान–अपमान के बीच झूलता रहता है। वह क्यों नहीं समय रहते इस संसार की नश्वरता को… आगे पढ़ें
  लंबी धूसर दाढ़ी, मेंहदी से रँगे लाल बाल, चौड़ी पेशानी पर उतरती कुछ घुँघराली लटें, बड़ी-बड़ी आँखें और नीचे को झुकी तोतई नाक। उजला रंग और उजले ही कपड़े पहने यही थे रहमान कबाड़ीवाले। ठीक नौ बजे वे घर से हाथठेला लेकर निकल जाते और ‘कबाड़ दे दो, कबाड़’ की आवाज़ लगाते हुए गलियों में चल पड़ते। गर्मी हो, सर्दी हो या बरसात, रहमान का यह रोज़ का नियम बन चुका था। पूरा शहर तो नापा नहीं जाता था, पर रोज़ तीन-चार कॉलोनियों में फेरी लगा ही लेते थे। आसपास के बच्चे नौ बजे घर से बाहर निकलकर रहमान के ठेले का इंतज़ार करते थे। इसलिए नहीं कि वे कबाड़ बेचना चाहते थे, वरन फेमू को देखना चाहते थे, उससे दुआ-सलाम करना चाहते थे। ‘फेमू’ भी बच्चों की चंचलता देखकर फुदकने लगता। बच्चे उसे गली के आखिरी छोर तक छोड़ते, फिर वह रहमान के साथ निकल पड़ता।… आगे पढ़ें
  किसी भी देश के सरहदी इलाक़ों का वातावरण उसके बाक़ी इलाक़ों से एकदम अलग होता है। सीमा दर्शाने वाले चिह्न, दोनों तरफ़ सैनिकों की तैनाती, दिन-रात लगातार चलने वाली गश्त, सैनिकों के तंबू, जहाँ-तहाँ खड़े सशस्त्र सैनिक, पल-पल की चौकसी, इसे यक़ीनन अलग ही रूप प्रदान करती है। थोड़ा सा भय भी इन सब में शामिल हो जाता है।  सीमा का यह क्षेत्र बाक़ी सीमावर्ती क्षेत्र के मुक़ाबले कुछ शांत समझा जाता था। यहाँ घुसपैठ की घटना ना के बराबर थी। सीमा पार से गोलीबारी कभी नहीं होती थी। हथियारों व नशा तस्करी की समस्या भी नहीं थी, इसलिए यहाँ काँटेदार तारों की बाड़ भी नहीं लगाई गई थी।  दूसरे सीमावर्ती क्षेत्रों से यदा-कदा गोलीबारी, घुसपैठ के समाचार आते रहते थे। सैनिकों व संतरियों की मौत होने की सूचना होने के बावजूद यह इलाक़ा किसी तरह भी अशांत नहीं था।  छह साल दूसरे स्थान पर तैनात रहने… आगे पढ़ें
  प्रातः सैर से वापस आने के बाद पापा ने चाय पीते हुए डाइनिंग टेबल पर पड़े, आज के अख़बार को बेटी मालविका के सामने खिसका दिया। मालविका की नज़र हेड लाइन पर गई “रिटायर्ड अधिकारी को किया साइबर अरेस्ट, साइबर पुलिस की तत्परता से बाल-बाल बचे, हड़पे गए 10 लाख रुपये भी बरामद।” उसने पढ़ते ही पापा की ओर देखा, वे उसे देख मुस्कुरा रहे थे। मालविका देर रात तक काम करने में लगभग अभ्यस्त थी। रात 12 की सूई क्रॉस कर गई, ऑफ़िस को लॉग आउट कर थकी-सी अपने रूम से बाहर निकली, सोचने लगी, किचन में जाकर कुछ पेट-पूजा कर ली जाय, ‘मिल्क, कुछ बिस्किट या नट्स’ ले लिए जाएँ। मोबाइल ईयर बड पर अपने पसंद का म्यूज़िक सुनते हुए, मालविका ने किचन से कप में मिल्क लिया तथा दूसरे हाथ में नट्स की प्लेट थामे, किचन के बाहर निकली। उसने डाइनिंग टेबल पर यह… आगे पढ़ें
  चैटर्जी लेन का यह सबसे पुराना, दो तल्ला मकान होगा जिसे समय के साथ नया नहीं कराया गया। नीचे-ऊपर मिलाकर लगभग दर्जन भर कमरे। रसोई, बरामदा अलग। और सबसे बड़ी तो यह पिछवाड़े की बाड़ी . . . मेरे होंठों पर हल्की मुस्कान उभर आई। हाँ, ये लोग इसे बाड़ी ही कहते हैं। जब नई-नई ब्याह कर आई थी और पहली बार ये शब्द सुना तो बहुत अचरज हुआ। “बाड़ी? ये क्या होता है?” तब राघव मुझे पीछे वाली सीढ़ियों से नीचे ले गए, “ये है बाड़ी।” “अरे बाप रे, ये जंगल?” “कम-से-कम जंगल तो मत कहो!” राघव ने आपत्ति जताई थी। अच्छी-ख़ासी जगह थी, पाँच-छह कमरों लायक़। बहुत तरह की लताएँ एक-दूसरे से लिपटी पड़ी थीं। एक तरफ़ आम तो दूसरी तरफ़ अमरूद के पेड़ लगे थे। पेड़ पर लटकता हुआ कटहल तो मैंने पहली बार ही देखा था। “जंगल शब्द से आपत्ति है, तो सघन… आगे पढ़ें
  इतने वर्षों बाद आज उनकी ख़ुशी का ठिकाना नहीं था। इसी समय की तो प्रतीक्षा थी उन्हें कि वे अपने बचपन और जवानी के चिर-परिचित शहर में लौटें जो न जाने कब से उनका इंतज़ार कर रहा होगा। वहाँ की सड़कें, घुमावदार गलियाँ, भीड़ भरे इलाक़े, टमटम, इक्के, रिक्शे, साइकिल की घंटियाँ और जगह-जगह लोगों के जमावड़े। शाम को होने वाली गोष्ठियाँ, क़हक़हे, बिंदास असहमतियाँ और निरंतर कुछ सुनने-सुनाने की एक परम्परा। एक छोटा-सा शहर जहाँ लोग प्रायः पैदल चलना पसंद करते हैं। बस थोड़ी-सी सड़कें, बाज़ार, कुछ मंदिर, कुछ पुराने अवशेष, एक गिरिजाघर, कुछ कोठियाँ और बस। उन्हें याद है कि बचपन में इन्हीं सड़कों पर गर्मी के दिनों में पानी के फव्वारे छोड़े जाते थे या भिश्ती अपनी मशकों से पानी गिराता हुआ चला करता था। इससे सड़कें एकदम धुलकर साफ़ हो जाती थीं। तब जगह-जगह सरकारी लैम्प-पोस्ट लगे होते थे जिन्हें हर शाम रोशन… आगे पढ़ें
  आज बाज़ार से घर जाने के लिए रिक्शे में बैठी तो अनजाने नंबर से एक फोन आया। न चाहते हुए भी उठा लिया। उधर से इंतिखाब सर बोल रहे थे। “मैडम कहाँ हो आजकल?” सर का फोन आता है तो स्वतः ही सकारात्मकता रक्त में प्रवाहित होने लगती है। बाज़ार की भीड़भाड़ से जितना परेशान हो गई थी। रिक्शे वाले पर भी झुँझलाहट सी हो रही थी, वो सब ग़ायब हो गई।  “घर आई हुई हूँ, सर। छुट्टियाँ चल रही हैं ना। फिर पूरे साल निकलना हो नहीं पाता है। आप बताएँ, क्या सहायता कर सकती हूँ?”  सर से जब भी कभी बात होती तो पहला सवाल और पहला जवाब यही होता था। सर किसी और से भी बात कर रहे थे शायद, थोड़ी देर जवाब नहीं आया। मैं फोन कान से लगाए हुए ही रिक्शे से उतर गई। दूसरे हाथ से पर्स में हाथ डालकर रिक्शे… आगे पढ़ें
  सुबह की चाय पीते हुए मीठी आवाज़ में संध्या ने बेटे से पूछा, “ऑफ़िस कितने बजे जाना है?”  उत्तर मिला, “वही 9:00 बजे माँ!”  “ऑफ़िस में सब ठीक चल रहा है ना?” माँ ने बात आगे बढ़ाते हुए पूछा।  “सब बढ़िया है माँ!” यह कहते हुए बेटे ने संवाद को विराम देने की कोशिश की। इससे पहले कि माँ कुछ और पूछती, बेटे के चेहरे के भाव ने उसे संदेश दे ही दिया, “बस . . . माँ और प्रश्न नहीं।” उस दिन शायद माँ का बात करने का ज़्यादा ही मन था, तभी तो बेटे के चेहरे के भाव को अनदेखा करते हुए वह बोली पड़ी, “अपना ध्यान रखना बेटा, गर्म कपड़े पहन कर बाहर निकलना, और हाँ . . .”  तभी बेटा भड़क कर उठ खड़ा हुआ। झल्ला कर बोल पड़ा, “अब बोलोगी यह करना . . . वह मत करना . . . तंग… आगे पढ़ें
  तूने आज फिर मुझे रुला दिया कल्ली। अपनी पच्चीस बरस की नौकरी में तेरी जैसी न जाने कितनी छोरियाँ इस बाल सुधार गृह में आईं  और चली गईं । लेकिन तूने तो पहले दिन से ही . . . ऐसा किया जिसे कोई नहीं भूल सकता। चोरी-चकारी, मारपीट, हुल्लड़बाजी, गाली-गलौच और फिर तो जेब-कतरी, भीड़-भाड़ में सामान चुराने वाली तू न जाने कितने अपराधों में लिप्त जब इस सुधार केंद्र में लाई गई तो वही हँगामा, खाने की थाली फेंक देना, साथी छोरियों से मारपीट करना। ऐसा कोई नहीं जिसकी नाक में तूने दम ना किया हो। पहले ही दिन तूने सारी हदों को पार कर दिया। जब  समझाने पर मेरी बाजू को काट लिया—पूरे के पूरे दाँत उभर आए थे और ख़ून बहने लगा। मैं दर्द के मारे चीख उठी और रोने लगी।  सारे बच्चे जो मेरी आँख के इशारे से डरते थे और मेरी एक… आगे पढ़ें
   “मम्मी, पापा और भैया छुट्टी के दिन भी सुबह-सुबह तैयार होकर कहाँ गये हैं?” नेहा पूछ बैठी। माँ ने सरलता से उत्तर दिया, “तेरे विवाह के लिए लड़का देखने गये हैं।”  “माँ मुझे आगे पढ़ाई करनी है। मैं अभी विवाह नहीं करूँगी,” दुःखी स्वर में नेहा बोली।  माँ ने प्यार से कहा, “बेटा, हम जो भी कर रहे हैं, तेरी भलाई के लिए ही कर रहे हैं। आ जा! अब नाश्ता कर लें।” “बस, आज से मेरी भूख हड़ताल है। मैं कुछ भी नहीं खाऊँगी,” यह कहकर खीजते हुए नेहा अपना कमरा बन्द करके पड़ गई।  नेहा के पापा और भाई रवि बहुत ख़ुशी-ख़ुशी घर आये क्योंकि नेहा के लिए यह लड़का उन्हें बहुत पसन्द आया। रवि ने पूछा, “माँ नेहा कहाँ है?”  माँ द्वारा नेहा का हाल बताने पर रवि कमरे में जाकर नेहा को समझाने लगा, ”नेहा, लड़का बहुत अच्छा है देखने में और व्यवहार… आगे पढ़ें
    पूजा की छुट्टियों में घर लौटा हूँ और आज वह अपने सवालों के लिए चली आ रही है। मैंने उसे दूर से ही आते देख लिया है। हाथ में ठिगनी लाठी के सहारे झुकी हुई कमर को खड़ी होकर कभी सीधी करती है और फिर झुककर चल देती है। वही पैवंद लगी मैली-कुचैली धोती, बिना तेल के उलझे उजले बालों के बीच ग़मगीन झुर्रिदार चेहरा। यह काकी माँ है। आते ही वही पुराना सवाल जड़ देगी . . . क्या, हरिया अब नहीं लौटेगा अमर? कैसे बदल गया है कि अपने गाँव-गिरन की भी याद नहीं आती है उसे? मैं बूढ़ी हो चली, आँखों से दिखाई नहीं पड़ता। किसी तरह काम-काज कर लेती हूँ। न जाने भगवान के यहाँ से कब बुलावा आ जाए और हरिया है कि घर आने का नाम ही नहीं ले रहा है। नाती-पोते तो क्या, बहू को भी देखने के लिए… आगे पढ़ें
  सुबह का सूरज बाँस भर चढ़ आया था। शरद की गुनगुनी धूप थी। पूस मास चल रहा था। सप्ताह भर से ठंड का ऐसा क़हर था कि कंबल-रजाई से बाहर निकलने का मन नहीं होता। देर से निकला था सूरज। बच्चे बाहर खेल रहे थे। गाँव में घर से सटे बाहर खलिहान होता है। उसी खलिहान पर बच्चे धूप का आनन्द ले रहे थे। अभी-अभी बस चार दिन पहले लाय-मूढ़ी का पर्व मकर संक्रांति बीता था, इसीलिए बच्चे तिल और मूढ़ी का लाय भी खा रहे थे। इस पर्व में गुड़ से बना यह लाय ग़रीबों की मिठाई के रूप में प्रसिद्ध है। तभी एक छोटे से बच्चे का रोना सुनकर दादी बाहर आई। किसी ने उसके हाथ से लाय छीन लिया था। दादी ने बच्चे से पूछा, “काहे को रो रहे हो तुम संटू बेटा?”  “दादी मेला लाय . . .” वह पूरा बोल नहीं सका।… आगे पढ़ें
जन्मोत्सव  दीवार पर टँगी ढोलकी को उतार उसकी रस्सियाँ कसने में निमग्न चंपा बहुत हड़बड़ाहट में थी। दोनों पैर फैलाकर बैठी चंपा उसकी रस्सियाँ कसती जाती, दो-चार हाथ ढोलकी पर मार आवाज़ पर ग़ौर करती जाती। जब वह ठीक हो गई, उस पर थाप मार उसे एक किनारे रख दिया।  “हूँ! अब ठीक है।” बुदबुदाकर वह अपने सिंगार-पटार में व्यस्त हो गई।  गुलाबी साड़ी को अपने पैबंद लगे हरे साये के ऊपर लपेटा, छोटे बालों में नक़ली चोटियाँ लगाकर लाल फुँदने लगाए। चोटियों को झुलाती हुई आईने के सामने जा खड़ी हुई। आईने के ऊपर रात को उतारकर चिपकाई गई रमोला बिंदी खिलखिला रही थी।  उसे उखाड़कर अपने भवों के बीच चिपका दिया। अब चूड़ियों की बारी थी। उसे नित नई चूड़ियाँ बदलना अच्छा लगता है।  अपने मर्दाने हाथों में हरी-गुलाबी चूड़ियाँ डालने की कोशिश की तो दो-चार टूट कर बिखर गई . . . छुन . .… आगे पढ़ें
  आधुनिक संचार व्यवस्था के समय में हस्तलिखित पत्र तो पुरातत्त्व विभाग में सुरक्षित रखे जा रहे, महत्त्वपूर्ण दस्तावेज़ों का एक अंग बनकर रह गए हैं। जब विज्ञान ने सुविधाएँ उपलब्ध करवाई हैं तो उसका लाभ क्यों न लिया जाए। ऐसे में हस्तलिखित पत्र देखकर आश्चर्य और जिज्ञासा हुई। आगे-पीछे पलटने के बाद पता चला कि यह तो मेरे बचपन के मित्र का पत्र है! कभी-कभी हम लोग दूरभाष के माध्यम से एक-दूसरे के समाचार जान लेते हैं पर यह लंबा-सा व्यक्तिगत पत्र देखकर मैं मन में उफनती जिज्ञासा को रोक नहीं पा रहा था। आख़िर इसमें ऐसा क्या है जो हम फोन पर बात करते समय एक-दूसरे को नहीं बता सकते थे।  पत्नी चाय लिए बैठी थी कि पहले चाय पी लो, पत्र कहीं भागा नहीं जा रहा। पर मैं उसकी बात अनसुनी करके पत्र पढ़ने में मगन था। अब पत्र में लिखी मित्र की उलझन मन-मस्तिष्क… आगे पढ़ें
प्रकाशन वर्ष 2012, (हरिगंधा, पंचकूला)   ‘छोटी-सी सरकारी नौकरी में क्या होता है? दो बच्चों को पालने की ज़िम्मेदारी के बोझ तले दबा आदमी मेट्रो सिटी में रहते हुए ऊँचे ख़्वाब देख सकता है भला? पर चलो, मेरे सिर पर छत तो है। साठ का होने तक मुझे कौन हिला सकता है? रिटायरमेंट के बाद ही सोचूँगा।’ “साब! उतरना नहीं क्या आज? आपका स्टॉप आ गया है।” कंडक्टर ने उसे झंझोड़ा तो उसके विचारों की गाड़ी को ब्रेक लगी। वह सीट से उठा और बस से नीचे उतर गया। मरे क़दमों से घर की ओर चल पड़ा। विचारों की रेल पुनः गति पकड़ने लगी।  ‘आज फिर सुननी पड़ेगी उसकी चपर-चपर। पता नहीं क्या हो गया है उसे? अच्छी भली दाल-रोटी खा रहे थे। भौतिक सुखों की चाहना करके आदमी कहाँ ख़ुश रह सकता है? इस चाहना का पेट बहुत बड़ा है, जितना भरो, उतना ख़ाली का ख़ाली। सब-कुछ… आगे पढ़ें
मेघना शंकर के घर आज बहुत चहल-पहल थी। आज ही आईआईटी-जेईई के नतीजे आए थे। मेघना शंकर ने पूरे भारत में शीर्ष स्थान प्राप्त किया था। बधाई देने वालों का ताँता लगा था। ईमेल, व्हाट्सएप, फ़ेसबुक, टि्वटर इत्यादि सोशल साइटों से भी बधाइयाँ और शुभकामनाओं की बौछार लगी थी। टीवी पर सभी न्यूज़ चैनल दिखा रहे थे: “बिहार की बेटी ने किया कमाल”, “बेटियाँ किसी से कम नहीं”, “अंबेडकर की संतान ने बढ़ाया मान”, “बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ।”  मेघना शंकर आज बहुत ख़ुश थी। आख़िर आज उसे ख़ुद को साबित करने का मौक़ा जो मिला था। बचपन से ही लड़की और दलित होने की जो हीन भावना उसके अंदर भरने की कोशिश की थी समाज ने, उसका करारा जवाब दिया था मेघना ने। स्कूल, कॉलेज, बस स्टॉप, कैंटीन, जहाँ कहीं भी जैसे ही बातों-बातों में सामने वाले को पता चलता कि मेघना दलित है, तुरंत ही व्यंग्य, तिरस्कार… आगे पढ़ें
अपने देश की सेवा में अपना सब कुछ न्योछावर करने वाले जाँबाज़ जगरूप सहगल को बचपन से ही जासूसी कहानियाँ पढ़ने का बड़ा शौक़ था। बड़ा हुआ तो उसे भारतीय सेना में जाने का अवसर मिल गया। जगरूप अब किसी बड़े ओहदे पर पहुँच चुका था और उसकी शादी बहुत सौम्य लड़की से हो चुकी थी। एक सुन्दर पुत्री फिर एक सुन्दर पुत्र का जन्म हुआ।  जगरूप को जासूस के रूप में कार्य करने का भी अवसर मिल गया जिसे उसने सहर्ष स्वीकार कर लिया। उसे पड़ोसी देश में भेजा गया जहाँ उसने कुछ वर्षों तक काम किया परन्तु अचानक उसकी कोई ख़बर आनी बन्द हो गयी। शायद वो पकड़ा गया और उसे लापता घोषित कर दिया गया।  चन्द्रमुखी, एक जवाँ पत्नी और ऊपर से दो छोटे बच्चे फिर कोई आमदनी का साधन नहीं। मजबूर हो चन्द्रमुखी ने बैठक किराए पे चढ़ा दी जिससे कुछ सहायता मिली। बच्चे… आगे पढ़ें
एक लम्बे अरसे के बाद विदेश से रघुबीर अपने शहर वापिस लौटा। बहुत उत्सुक था अपनी भूली-बिसरी यादों को फिर से जीने के लिए। जब वो अपने शहर टैक्सी द्वारा अपने घर पहुँचा तो रात बहुत हो चुकी थी। माता–पिता का स्वर्गवास हुए तो एक अरसा हो चुका था और अब घर में बड़ी बहन रहती थी। दरवाज़ा खटखटाया, बड़ी बहन ने दरवाज़ा खोला और रघुबीर को घर के अन्दर ले गई । रघुबीर को उसके पुराने कमरे में ठहराया गया जहाँ उसने अपना सारा सामान टिका दिया। लम्बा हवाई सफ़र फिर रेलगाड़ी से रेलवे स्टेशन और फिर टैक्सी से घर तक का सफ़र, रघुबीर बहुत थक चुका था। हाथ-मुँह धो के थोड़ी देर आराम करने के लिए रघुबीर बिस्तर पे लेट गया। आँखें आधी सी बन्द हुईं ही थी, उसे आभास हुआ जैसे किसी ने पुकारा हो, धीरे से सर के बालों को सहलाते पूछा, “सफ़र कैसा… आगे पढ़ें
“ड्यूमारिए लाईट देना,” स्वर में अपरिपक्वता का आभास होते ही मैंने सर उठाया तो सामने मेकअप की पर्तों की असफलता के पीछे से झाँकता बचपन दिखाई दिया। कोई पंद्रह-सोलह बरस की लड़की अपनी उम्र से बड़ी लगने का भरपूर प्रयास कर रही थी।  “तुम्हारे पास कोई प्रूफ़ ऑफ़ एज है?”  “क्या मतलब?” उसकी अनभिज्ञता भी उसके प्रयास की तरह ही झूठी थी। मैं जानता था कि वह यही प्रश्न न जाने कितनी बार सुन चुकी होगी।  “मतलब क्या? ड्राईवर लाईसेंस, बर्थ सर्टीफिकेट . . . कुछ भी . . . तुम जानती तो होगी?”  मैंने उसके चेहरे को टटोला।  उसने कन्धे से लटके बड़े पर्स में ढूँढ़ने का बहाना किया और फिर से मेरे चेहरे पर नज़रें टिका कर भोलेपन से बोली,” मिल नहीं रहा, मेरा विश्वास करो . . . कोई समस्या नहीं होगी, सब ठीक है।” उसने मुझे झूठा आश्वासन दिया।  “कुछ भी ठीक नहीं, जानती… आगे पढ़ें
सात दिन बहुत ज़्यादा थे . . . शायद नहीं, बहुत कम। लिखने के लिए क्या था उसके पास? अभी कल ही सम्पादक का फ़ोन आया था। पिछले सप्ताह उसके उपन्यास की अगली कड़ी नहीं छप पाई थी। एक साप्ताहिक पत्रिका से उसने मेहनताना तो ले लिया था, मगर समय से यह कड़ी लिखने मेंं उसे देर हो गयी। सम्पादक ने एक छोटे से नोट मेंं पत्रिका मेंं पाठकों से क्षमा माँग ली थी। पर अब ऐसा न हो, यह भी चेता दिया था उसे कल फ़ोन पर।  पतझड़ के रंग-बिरंगे झरते पत्तों को देख कर उसे हमेशा ही अपने जीवन की कहानी याद आती है। चाहे कितनी भी कोशिश कर ले, कहीं न कहीं किसी न किसी तरह उसके उपन्यासों मेंं उसे अपनी कहानी छिपी मिलती है। पाठक क्यों न पसंद करें, पुरुष वर्ग ख़ासकर? उसकी कहानी में एक माँ, एक आदर्श पत्नी, एक प्रेमिका, एक सुन्दर… आगे पढ़ें
’बिना किसी सरनामें यानी भूमिका के मैं अपनी बात आप जैसे समझदारों के सामने रखना चाहती हूँ। आजकल मैं एक कहानी में हूँ। मैं नहीं जानती कि मैं कहानी लिख रही हूँ या यह कहानी मुझे पढ़ रही है। मेरे ज़ेहन पर यह एक साथ अनेक पायदानों पर चल रही है। यह ज़रूरी नहीं कि पहले ऐसा नहीं हुआ था पर इस समय यह अहसास एक ज़िंदा इंसान की तरह मेरे साथ चल रहा है कि मैं एक साथ अनेक जगहों पर हूँ। टूटी हुई नहीं, पूरी-पूरी!! एक ही इंसान पूरा-पूरा हर जगह कैसे हो सकता है? आप सोच सकते हैं, पर इस बात का जबाब मेरे पास नहीं है। कुछ लोग मिल जाएँगे कहने वाले कि यह नामुमकिन है, वो जो चाहें जो कहें पर मेरे पास वाक़ई इस बात की समझ नहीं है कि मैं एक साथ कई जगहों पर कैसे हूँ।  मैं, जैसे अपना बीते… आगे पढ़ें
विमला आठ भाई बहनों में सबसे छोटी थी। माता पिता के पास धन का अभाव होने के कारण चाहते हुए भी विमला को बारह कक्षा पूरी होने के बाद पढ़ाई करने का कोई साधन नहीं मिल पाया। वह घर के काम-काज में ही लग गयी। चाहते हुए भी विमला को वह सब नहीं मिल सका जो हर युवती अपनी अट्ठारह वर्ष की उम्र में पहनना ओढ़ना चाहती है। एक डेढ़ वर्ष निकल गया। विमला के पिता, स्वरूप को अपनी बेटी की शादी की चिंता होने लगी। पैसा पास नहीं था इसलिए अच्छे घर वालों की माँगें पूरी नहीं कर सकते थे। माँ, पारो को एक दिन कोई पड़ोसिन मिली और उसने पारो से उसकी बेटी विमला के लिए एक रिश्ता बताया। लड़का अच्छे घर का था, अमरीका में था। उम्र ज़्यादा थी। वह चालीस वर्ष का था। पारो ने अपने पति से बात की। पिता ने भी सोचा,… आगे पढ़ें
वह औरत भी उसी अपार्टमेंट का हिस्सा है। कभी-कभार दोपहर के बाद यहाँ गोल घेरे के चक्कर लगाती, बेंच पर बैठ फोटो खींचती मुस्कुराती रहती है। चुस्त-दुरुस्त पेंट, जैकेट और स्नोबूट पहने पैरों को सँभलकर आहिस्ता-आहिस्ता रखती सैर करती है। यहाँ की नहीं लगती वह।  कॉफ़ी हाउस में ऊँची टेबल-कुर्सी पर बैठी पारदर्शी शीशे में से आती-जाती कारों को देखती कॉफ़ी के घूँट भरती है। बाहर कार में से उतर एक गोरी लड़की अपनी गोद में बच्चे को उठाये अंदर प्रवेश करती है। क़रीब चार साल का बच्चा उछल-उछलकर चीज़ों की माँग करता है। कॉफ़ी सर्व करने वाली लड़की जिसके ब्लोंड सुनहरी बाल हैं, बच्चे की ओर हो जाती है।  एक लंबा गोरा बूढ़ा, लंबी सी मोटी जैकेट पहने अंदर प्रवेश करता है। घुसते ही जैकेट को उतार कुर्सी पर रखकर ऑर्डर देता है, “वन मीडियम एक्सप्रैसो कॉफ़ी एंड गिव स्पेस फ़ॉर क्रीम।”  “विल यू लाइक अमेरिकन कॉफ़ी?”… आगे पढ़ें
वह रोज़ सुबह काम पर जाती थी। कभी आठ बजे तो कभी आठ बजकर पाँच मिनट पर। शाम चार से सवा चार बजे के बीच बिल्डिंग में उसकी वापसी हो ही जाती थी। समय की इतनी पाबंद कि चाहो तो उसके आने-जाने से अपनी घड़ी का समय मिला लो। सुबह-सवेरे टिक-टिक करता घड़ी का काँटा इधर आठ के आसपास पहुँचा नहीं कि उधर घड़ी के काँटों से क़दम मिलाती उसकी हड़बड़ाती चाल पट-पट करती दरवाज़े से बाहर। पिछले दस सालों से यही है उसकी दिनचर्या। उसकी ढलती उम्र को देखकर तो लगता है जैसे रिटायर हुए दस-पंद्रह साल तो हो ही गए होंगे, लेकिन नहीं वह काम कर रही है अभी, बेहद चुस्ती से, पाबंदी से कर रही है। जिस तरह से वह दरवाज़े से बाहर निकलती है लगता है एक पल की भी देर हो गयी तो उसे उसके काम वालों द्वारा फाँसी पर लटका दिया जाएगा। … आगे पढ़ें
सब लोग मुझे ‘स्पॉइल्ड चाइल्ड’ कहते हैं पर मेरा दावा है कि मैं नहीं, मेरी नानी ‘स्पॉइल्ड नानी’ हैं, ‘प्राब्लम नानी’ हैं। कोई भी मेरी आपबीती सुने तो उसे पता चले कि सचमुच मेरी हालत कितनी ख़राब है। सबको तरस आएगा, मुझ पर भी और मेरी परेशानियों पर भी। कोई एक बात हो तो बताऊँ, सुबह से शाम तक ऐसी हज़ारों बातें हैं जहाँ पर नानी मेरे लिये परेशानियाँ खड़ी करती रहती हैं। नानी के इमोशनल अत्याचार की मैं आदी हूँ वह मुझ पर काम नहीं करता पर उनके जो भाषण के अत्याचार लगातार कानों में कीले ठोकते हैं वे मेरी उम्र लगातार कम करके मुझे बच्ची बना देते हैं।  कभी-कभी मुझे लगता है कि किसी ने उनके अंदर एक कैसेट डाल दी है जो मुझे देखते ही बजने लगती है। रोज़ एक जैसी हिदायतें, एक जैसी बातें, एक जैसे सवाल। सवालों के जवाब नहीं मिलने पर रिकॉर्डेड… आगे पढ़ें
अभी भी हाथ से कुछ नहीं फिसला! ज्यों का त्यों सब धरा है तेरी हथेली पे।  "ज़िद से नहीं बिटिया विवेक से काम ले, ज़िद से तो पछतावे ही हाथ आते हैं। समझ क्यों नहीं रही ऐसा निर्णय लेने का मतलब है जान-बूझकर ख़ुद को अँधेरों में ढकेलना। अपना नहीं तो इसका ही सोच ले। होते-सोते क्यों इसे पिता के प्यार से वंचित करना चाहती है। कहीं तेरी अक़्ल कोमा में तो नहीं चली गई? बोलती क्यों नहीं? ना बोलने की क़सम खाई है क्या? मेरा फ़र्ज़ था समझाना, समझ में आई हो तो ठीक वरना जो जी में आए कर!"  ना हूँ, ना हाँ, बस बुत बनी बैठी मैं सुनती रही थी माँ की बातें। कितना रोई थी माँ उस दिन। भाभी ने भी कितना समझाया था—जल्दबाज़ी ना करो विशाखा, समय के साथ-साथ सब ठीक हो जाएगा। कुछ समय तो दो रिश्ते को पकने का। एक बार… आगे पढ़ें
दो बेटियों के बाद जब दिवाकर के यहाँ बेटा पैदा हुआ तो उसकी ख़ुशियों का अन्दाज़ा लगाना बहुत मुश्किल था। ’दो बेटियाँ और एक बेटा, चलो अब अपना परिवार पूरा हुआ’ यह सोच कर दिवाकर और उसकी पत्नि सुनीती बहुत प्रसन्न हुए।  बच्चे के जन्म के सात दिन बाद दिवाकर जन्मकुण्डली बनवाने के लिये पण्डित बैजनाथ से मिलने गये। पण्डित जी ने नक्षत्रों को देख कर प्रदीप नाम सुझाया। फिर बोले, “सेठजी, और सब तो ठीक है, बच्चा बहुत होनहार होगा परन्तु इस बालक का आपको कोई सुख नहीं मिलेगा।”  यह सुनकर दिवाकर विचलित तो बहुत हुआ परन्तु अपने मन के भावों को पण्डित जी पर भी प्रकट नहीं होने दिया। बात ऐसी थी कि इस बालक के जन्म से पहले उसके एक पुत्र और एक पुत्री की बाल्य अवस्था में मृत्यु हो गई थी। अब तो दिवाकर के दिमाग़ में यह बात घर कर गई कि ये… आगे पढ़ें
रचना समीक्षा: पगड़ी का दार्शनिक चिंतन – डॉ. पद्मावती रचना समीक्षा: धीमे स्वर में गहराई से बोलती कहानी – अंजना वर्मा   हरभजन सिंह बेचैन थे। उनकी बेचैनी उनके कमरे की दीवारों को भेदती हुई पूरे घर में पसर रही थी। यहाँ तक नीचे रसोई में काम कर रही उनकी बहू गुरप्रीत भी उसे महसूस कर सकती थी। गुरप्रीत भी सुबह से सोच रही थी कि ऐसी कौन सी बात है जो कि दारजी को इतना परेशान कर रही है और वह उसे कह नहीं पा रहे हैं। घर में भी तो कुछ ऐसा नहीं घटा जो दारजी को बुरा लगा हो। वैसे भी उनकी आदत तो इतनी अच्छी है कि कोई भी ऊँची-नीची बात हो जाए तो वह बड़ी सहजता से उसे एक तरफ़ कर देते हैं और अपने परिवार की शान्ति में कोई अन्तर नहीं आने देते। आज तो अभी तक नाश्ता करने के लिए भी नीचे… आगे पढ़ें
"अरे, बकरिया कहाँ गइल रे?" सरस्वती ने आवाज़ दी। सूरज ढलने लगा था। सभी पशु-पक्षी अपने बसेरों में लौटने लगे थे। उसकी गाय भी चंवर से चरकर आ गयी थी। बकरी का कहीं पता नहीं था, सो उसकी चिंता लाज़मी थी। सरस्वती के पास एक गाय व एक बकरी थी। बकरी ने कुछ महीनों पहले ही दो नन्हें, प्यारे बच्चों को जन्म दिया था। दोनों बच्चे एकदम उजले और मुलायम थे। मानों सेमल की सफ़ेद रूई की ढेरी हो। अपने नाती-पोतों जैसे ही इन्हें प्यार करती थी सरस्वती। अपनी एकमात्र बेटी अनीता से वह चिल्लाते हुए कह रही थी कि "बकरिया कहाँ गइल? अनीता आंगन में चूल्हा-चौका कर रही थी। वहीं से बोली, "तू ही त ले गइल रहलू हा बाँधे, हम का जानी?" सुबह ही तो बकरी को पोखरी के किनारे खूँटे से बाँध कर आई थी वह! वहाँ जाकर देखा तो बकरी नदारद!! खूँटा और रस्सी… आगे पढ़ें
हँसुआ चलाए के मौसम फिर से आए गए। जिधर देखो उधर सब खेत में हरियर और पीयर रंग देखाए लगा। कड़ा घाम और हवा के बहाव में तो इतना सुन्दर दिखाए जैसे कोई हरियर और पीयर मक्मल के चद्दर बिछाए दीस सब तरफ। जिधर देखो बस उधर सब खेत में धान पक गए। झुण्ड के झुण्ड चिड़िया आए के वही चद्दर पे बैठे और सब तरफ खाली चिड़ियन के चहचाहट सुनाए दे लगा। मौसम ठीक होए के कारण ई साल सब के खेत में बहुत अच्छा फसल भये। अब तो सब के मन में बस यही बात रहा कि अगर टेम पे सब धान कटाए, दवांए और ओसाये लिया जाये तो मेहनत असूल होए जाई।  अबकी साल केसो भी आपन काका से अधिया पे खेत लई के काफी धान बोये लीस रहा। लान्गालांगा, लम्बासा में बुधई काका के पास सब से जादा जमीन रहा लेकिन बिमारी के कारण… आगे पढ़ें
परिचय करवाया किस्कू जी ने, "दुमका में हिंदी अफसर हैं मैडम शालू।"  उसमें से कुछ लोग पढ़े-लिखे थे, कुछ कम पढ़े-लिखे, कुछ अनपढ़। औरतें एकदम अनपढ़। अपनी आदिवासी भाषा में बातें कर रही थीं। शालू को किस्कू साहब की पत्नी सरल स्वभाव की लगीं। बेटे भी ढंग के लगे। परंतु बेटियाँ बातूनी एवं चंट स्वभाव की लगीं। तीन की पढ़ाई-लिखाई कम हो पाई थी। जल्दी शादी करके उनकी पत्नी आश्वस्त होना चाहती थीं।  बेटियों से परिचय उनकी पत्नी ने करवाया, “ये बड़ी कनक, इसके तीन बच्चे हैं। ये मँझली बिजली, इसके चार बच्चे हैं। इसका पति बेरोज़गार है। यहीं रहती है। बाक़ी तीन छोटी हैं। अभी पढ़ रही हैं। बेटे भी पढ़ रहे हैं। भई, खाना खिलाओ। थकी-माँदी आई हैं। खाना खा कर आराम भी करेंगी।”  पत्नी खाना लाने गई। किस्कू जी बैठकर त्यौहार के बारे में बताने लगे, “सरहुल पर्व धान कटने के बाद ख़ुशी से मनाया… आगे पढ़ें
मैं जानता हूँ, मुझे बराबर उलाहना-परतरा लोग देते रहे हैं, गोया कि आदमी न होकर अन्य जीव हूँ। फिर भी मैं हार नहीं माना हूँ, नहीं मान रहा हूँ क्योंकि मुझे मालूम है तनिक सा परिश्रम मुझे अभी नहीं करना है। अभी तो ढेर सारे संघर्ष मुझे करने हैं। मुझे क़तई दुख नहीं कि पीएचडी-रिसर्च मुझे करने नहीं दिया गया। मुझे बराबर जाति-पांति के पचड़े के कारण टकराना पड़ा है। अच्छा भी है। एक दूसरे को जब तक नहीं जानते तब तक ख़ूब गोल-गोल बातें होती हैं लेकिन ज्यों ही जाति की गंध लोगों को मिलती है लोग मुँह सूअर जैसा निपोरने लगते हैं। जाति की गंध टाइटिल से मिलती है। यदि टाइटिल नहीं है तो रंग, पहनावा पर धावा बोलते हैं। मेरे शरीर में ज़हर फैल जाता है जाति के ठेकेदारों द्वारा जाति पूछे जाने पर। इस समय मैं अपने को अकेला समझ रहा हूँ, फिर भी… आगे पढ़ें
कुछ वर्ष पहले बीती हुई यह बात सोचने पर ऐसी लगती है ऋण मानों बस कल ही घटित हुई हो, यूनेस्को की टीम का एक व्यक्ति उस साल मात्र इसी काम के लिए आया था कि चेक देने के पहले वह औरईआ गाँव की उस लड़की से स्वयं मिलना चाहता था, उसकी स्थिति को अपनी आँखों से देखना चाहता था।  इसी सन्दर्भ में मिस्टर जोसफ से मीटिंग के दौरान पहली बार मिलना हुआ था। मीटिंग में इस सबसे ज़रूरी मुद्दे के अलावा और भी कई एजेंडे थे, उस दिन घंटों चलने वाली उस मीटिंग के दौरान न जाने कितने नए-पुराने केसेज़ को निपटाया गया था।  चिरैयाटांड पुल से एग्ज़ीबीशन रोड चैराहे तक जाने वाली सीधी सड़क पर बाईं ओर सातवीं बिल्डिंग की तीसरी मंज़िल पर स्थित था हमारा वह मीटिंग हाल। उसी हाल में सरकारी-ग़ैरसरकारी, सभी लोग घंटों बैठे रहे, बातें,  बहसें, मुद्दे, एजेंडे। अंत में जब मीटिंग… आगे पढ़ें
शहर में चारों ओर स्वामी स्वरूपानंद के पोस्टर लगे थे। सभी प्रमुख सड़क, रास्ते और स्थान स्वामी स्वरूपानंद के बड़े-बड़े होल्डिंग, बेनर और पोस्टरों से अटे पड़े थे। धार्मिक लोगों में स्वामी स्वरूपानंद की समरसतावादी कथा-वाचक और तत्व-मर्मज्ञ के रूप में बड़ी प्रसिद्धि थी। उनके बारे में विख्यात था कि वह न केवल बहुत रोचक ढंग से धर्म-कथा सुनाते थे अपितु धर्म की मानवीय व्याख्या करते थे। बड़ी संख्या में लोग उनके प्रवचन और धर्म कथाएँ सुनने के लिए आते थे, जिनमें समाज के सभी वर्गों, जातियों, सम्प्रदायों के लोग शामिल होते थे। उन्हें धर्म का साक्षात रूप समझा जाता था। देश के कई शहरों में उनके आश्रम थे, इसलिए किसी एक जगह पर नहीं रहकर वह कभी यहाँ और कभी वहाँ आते-जाते रहते थे। जिस शहर में भी वह जाते थे वहीं पर उनके दर्शन करने और प्रवचन सुनने वालों का ताँता लग जाता था। दिल्ली के… आगे पढ़ें
पन्द्रह दिनों की जी तोड़ मेहनत भागदौड़ और उससे पहले की भी ख़ूब सारी मीटिंग्स मेल मुलाक़ात। पूरे विभाग को ज़िम्मेदारी समझाते हुए विभाग के अध्यक्ष ने कहा, "अबकी बार कोई ग़लती नहीं होनी चाहिए! सब एकदम सटीक समय पर होगा! सबको शार्प टाइम पर पहुँचना होगा! ऐसा ना हो कि मुख्य अतिथि पहले आएँ और आप बाद में पहुँचे!" थोड़ा साँस लेकर सबकी तरफ़ निहारकर उन्होंने कहा, "और हाँ हमें अपनी संस्कृति का ख़्याल भी रखना होगा! भारतीय संस्कृति की पहचान उसका पहनावा खानपान और आदर सत्कार है इसलिए कपड़े एथनिक लुक में ही होने चाहिएँ! भारतीय परिधान ही सबसे सुंदर होते हैं!" "जी, जी हाँ सर भारतीयता दुनिया में विशिष्ट है हम इसका उदाहरण पेश करेंगे!" यह बात डॉक्टर दूबे ने कही जैसे उन्होंने विभाग अध्यक्ष का वाक्य हाथों हाथ लपक लिया।  उनके समर्थन में डॉ. मृदुला शर्मा ने कहा, "महिलाएँ साड़ी पहनेंगी, और पुरुष फ़ॉर्मल… आगे पढ़ें
“मैडम आ….प किस कॉलेज में हो?” पसीने से लथपथ उस लड़की ने हिन्दी के देहाती अंदाज़ में पूछा। मात्र 1.22 मिनट में दो सौ मीटर की रेस को पूरा कर स्पोर्टस् ट्रायल में नम्बर एक पर आई उस लड़की पर मैडम जी की नज़र भी टिकी थी। वे तभी से उसे बड़ी आत्मीयता से निहार रही थीं। लड़की का ऊँचा लंबा क़द, खिंची तराशी पिंडलियाँ उसके उज्ज्वल भविष्य की ओर इशारा कर रही थीं। उधर मेडम का बेबाक अंदाज़, सुनहरे फ़्रेम का काला चश्मा और पाँच फुट आठ इंच का लम्बा तराशा भव्य व्यक्तित्व उस सामान्य सी दिखने वाली कन्या को अपने विशेष होने की अनुभूति करा रहा था। पर मैडम थी कि उसके इस सवाल को बराबर मुस्कुराकर टाल रही थी। वे चाहती थी कि लड़की उनसे इतनी प्रभावित हो जाए कि ख़ुद ही पता करे कि वे किस कॉलेज में पढ़ाती हैं।  यह विश्वविद्यालय का स्पोर्टस्… आगे पढ़ें
पार्वती अम्मा के न आने पर उनके लिए पूरा दिन गुज़ारना बहुत कठिन हो उठता था। पैंसठ साल की पार्वती अम्मा, नाती- पोतों वाली पार्वती अम्मा, जब तब घर में ऐसा कुछ पा जाती कि भूल ही जाती कि उनके पीछे, उनके बिना कहीं ज़िन्दगी रुक ही गई होगी। इस रुकी हुई ज़िन्दगी को हर पल धक्का देकर चलाना जो पड़ता था। यह ज़िन्दगी अपने आप में बड़ी कठिन थी, उसके लिए सब कुछ बड़ा कठिन था। कभी यह सब कुछ बहुत सहज था, बहुत आसान, ठीक वैसे ही जैसे बहता है पानी, या बहती है हवा, या कि जैसे उगता है सूरज और छिप जाने पर चाँद आ जाता है बिना किसी के आवाज़ लगाए अपने आप। अभी पिछले लगभग एक घण्टे से सूखी ठूँठ-सी बेजान उँगलियाँ प्रयासरत थीं। एक आसान सा काम उन्हें बड़ा कठिन बना रहा था। चम्मच उँगलियों के बीच फँस ही नहीं रहा… आगे पढ़ें
इस तरफ़ से जहाँ वह बैठे थे, वहाँ से उस तरफ़ का दृश्य साफ़ ही दिखाई देता, पर दोनों छोरों के बीच कोहरे का एक झीना आवरण था, ठंडक थी और बर्फ़ के गले हुए टुकड़ों से बने पानी की नदी। पहाड़ी के बीचोंबीच यह नदी ख़ामोशी से बह रही थी, जाने कब से। स्थानीय लोगों ने उन्हें पहले ही मना कर दिया था कि नदी में ना उतरें, उस का पाट बेशक ज़्यादा चौड़ा नहीं है, बामुश्किल चालीस हाथ होगा, पर गहरी बहुत है नदी, शायद चार बाँस गहरी मतलब लगभग चार सौ फ़ीट से कुछ अधिक ही। सावधान रहिए।  इस पार से उस पार जाने के लिए लकड़ी का एक पुल वहाँ था, काफ़ी पुराना और थोड़ा जर्जर भी। कब और किस ने बनाया यह पुल यह बात बहुत से लोगों से पूछने पर पता चली कि बहुत पहले कभी अंग्रेज़ों के वक़्त में बनाया था… आगे पढ़ें
आज इतवार है। सप्ताह भर की दौड़-भाग को विश्राम। सभी काम सुस्त गति से निपटाये जा रहे हैं। ग्रुप हाउसिंग सोसायटी में आज चहल-पहल है। आज सबको फ़ुर्सत है। आज सभी कार्य अन्य दिनों की निर्धारित अवधि से ज़्यादा समय ले रहे थे। जैसा और दिन पृथ्वी का होता है छोटा सा, आज का दिन सूर्य का पृथ्वी से ज़्यादा दीर्घावधि का। सोसायटी के सातवें फ़्लोर के एम. आई. जी. फ़्लैट में निगम जी सोफ़े पर अधलेटे पसरे हुए हैं। टी.वी. पर हॉलीवुड की डब फ़िल्म चल रही है। पूरा साउंड सिस्टम एक्टिव है। जेम्स बांड की फ़िल्म। गोलियों और कारों की ऐसी आवाज़ें जैसे कानों के पास ही चल रही हों। बीच में ब्रेक आता तो न्यूज़ लगा लेते और मोबाइल तो लगातार सक्रिय था ही। निगम जी कई चाय पी चुके थे। "ज़रा आधा कप चाय तो बना दो! पहले वाली ठंडी हो गई थी..” "ठंडी… आगे पढ़ें
उसके  हाथ-पैर काँप रहे थे। हाथ-पैर ही नहीं, पूरा शरीर काँप रहा था...। स्वर तीव्र होते-होते गले में रुँध गये थे। तेज़ बोलना उसका स्वभाव नहीं था। आज सहसा चिल्लाने से उसका गला रुँध गया। वह इतनी दुर्बल कभी नहीं थी कि यह घटना उसके मन मस्तिष्क पर इतना दुष्प्रभाव डाल सके। वह तो साहसी थी।  विवाह के समय जब वह बल्यावस्था में थी, तब बहुत डरती थी। पिता व भाई के अतिरिक्त किसी भी परपुरुष से उसे भय लगता था। उसे स्मरण हैं अब भी, बचपन के वे दिन जब वह गाँव के सरकारी प्राथमिक विद्यालय में पढ़ती थी। उस दलित बस्ती से जहाँ वह रहती थी वहाँ से विद्यालय कुछ दूर मुख्य गाँव में था। घर से विद्यालय की दूरी तय करने में वह संकोच व शर्म से कंधे व आँखें झुकाये रहती थी। कभी भी सीधी हो कर, गर्दन उठा कर वह चल नहीं सकी।… आगे पढ़ें